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स्टार्टअप में निवेश

संपादकीय /  November 09, 2017

देश में स्टार्टअप के फंड जुटाने में तेज उछाल देखने को मिली है। सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग की संस्था नैसकॉम की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2017 की पहली छमाही में स्टार्टअप की फंडिंग 167 फीसदी बढ़कर 640 करोड़ डॉलर हो गई। पिछले साल इसी अवधि में यह 240 करोड़ डॉलर थी। चाहे जो भी हो लेकिन 5,000 कंपनियों का स्टार्टअप जगत कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। वित्तीय सेवा एवं प्रौद्योगिकी तथा स्वास्थ्य और प्रौद्योगिकी क्षेत्र की कंपनियों ने इस वर्ष क्रमश: 31 और 28 फीसदी की अच्छी बढ़त दर्ज की है। ई-कॉमर्स कंपनियों और एग्रीगेटर का क्षेत्र जिसमें भारत की अच्छी पहचान है, उसमें 100 करोड़ डॉलर से अधिक मूल्यांकन वाली प्रौद्योगिकी स्टार्टअप (इन्हें यूनिकॉर्न कहा जाता है) 13 फीसदी की दर से बढ़ीं। नैसकॉम की रिपोर्ट के मुताबिक देश में इस समय 10 यूनिकॉर्न हैं जबकि ब्रिटेन में इनकी संख्या 11 और इजरायल में 3 है। इनके औसत मूल्यांकन के हिसाब से भारत अन्य दोनों देशों से आगे है। भारत में इनका औसत मूल्यांकन 320 करोड़ डॉलर है जबकि ब्रिटेन में 160 अरब डॉलर तथा इजरायल में 120 अरब डॉलर। 

 
ये आंकड़े उत्साहित करते हैं लेकिन अधूरी कहानी कहते हैं। यह बात चिंतित करने वाली है कि स्टार्टअप में शुरुआती निवेश कम हो रहा है। उदाहरण के लिए बीते पांच सालों में शुरू हुईं स्टार्टअप में शुरुआती निवेश एक साल में 14 फीसदी कम हुआ। यह गत वर्ष के 210 करोड़ डॉलर से कम होकर 180 करोड़ डॉलर रह गया है। नैसकॉम की रिपोर्ट बताती है कि यूनिकॉर्न कंपनियां दुनिया भर के फंडों से लगातार पैसे जुटाने में कामयाब हैं और प्रतिस्पर्धा का तगड़ा मुकाबला कर रही हैं। आंकड़े बताते हैं कि निवेशक जोखिम से बच रहे हैं और वे हाल में शुरू हुईं स्टार्टअप में पैसे लगाना नहीं चाहते।
 
उद्यमियों की जोखिम उठाने की क्षमता काफी हद तक शुरुआती निवेश पर निर्भर करती है जिसे सीड मनी भी कहा जाता है। बीते दशक के दौरान यह धन कंपनियों को आसानी से मिल रहा था और भारत दुनिया का शीर्ष स्टार्टअप केंद्र बना हुआ था।  चूंकि कारोबार शुरू करने के लिए अभी भी लालफीताशाही से गुजरना होता है (भले ही विश्व बैंक की कारोबारी सुगमता सूची में हमने 30 स्थान की उछाल ली) इसलिए शुरुआती निवेश की कमी इस उद्योग के लिए झटका साबित हो सकती है। स्टार्टअप के लिए शुरुआती पूंजी की कमी से कुछ सवाल उठने लाजिमी हैं। 
 
मसलन, क्या स्टार्टअप में नए विचारों का अभाव है? स्टार्ट अप योजना में नवाचार की क्या भूमिका रह गई है? क्या निवेशक बाजार में स्टार्टअप के आने और सफल होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं? शायद इन तीनों कारकों के मिलेजुले रूप ने स्टार्टअप  के लिए शुरुआती फंडिंग की राह मुश्किल कर दी है।  हां हमारे यहां ऐपल, गूगल, एमेजॉन और डिज्नी जैसे उदाहरण नहीं हैं जिन्होंने बहुत छोटी शुरुआत के बाद इतना बड़ा नाम कमाया। मौजूदा सरकार स्टार्टअप को लेकर शुरू से बहुत सकारात्मक रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस क्षेत्र के वैश्विक दिग्गजों से बड़े मंच पर मेल-मुलाकात की है। राजग सरकार ने इन कंपनियों के लिए बाकायदा स्टार्ट अप इंडिया फंड बनाया। इसके पीछे विचार था फंडों के एक फंड की मदद से देश में स्टार्टअप को बढ़ावा देना और उनके लिए माहौल तैयार करना। परंतु सरकार 10,000 करोड़ रुपये के फंड का बहुत मामूली हिस्सा ही वितरित कर सकी है। जाहिर सी बात है स्टार्टअप में शुरुआती निवेश को बढ़ावा देने के लिए काफी कुछ किया जाना शेष है।
Keyword: startup, company, policy, invest,,
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