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रेटिंग में अपग्रेड कम, डाउनग्रेड ज्यादा

पवन बुरुगुला / मुंबई 11 09, 2017

भारतीय कंपनी जगत पर असर

पहली छमाही में क्रेडिट अनुपात 0.97 फीसदी रहा, 2.57 लाख करोड़ रुपये कर्ज डाउनग्रेड
वित्त वर्ष की पहली छमाही में रेटिंग एजेंसियों ने 189 ऋण प्रतिभूतियों को अपग्रेड किया जबकि 195 को डाउनग्रेड
विशेषज्ञों ने कहा कि सुस्त आय और नोटबंदी व जीएसटी जैसे कदमों ने भारतीय कंपनी जगत के नकदी प्रवाह पर विपरीत असर डाला है
डाउनग्रेड में इजाफे की अन्य प्रमुख वजह क्षमता का कम इस्तेमाल है
डाउनग्रेड के मौजूदा चक्र की शुरुआत वित्त वर्ष 2016 में हुई, लेकिन क्षेत्र के हिसाब से बदलाव पिछले दो साल में ज्यादा हुए

अगर रेटिंग को पैमाना मानें तो भारतीय कंपनी जगत की सेहत और खराब हुई है। क्रेडिट अनुपात (ऋण प्रतिभूतियों के अपग्रेड व डाउनग्रेड की संख्या) पांच साल के निचले स्तर 0.97 फीसदी पर आ गया है। मौजूदा वित्त वर्ष की पहली छमाही में रेटिंग एजेंंसियों ने 189 ऋण प्रतिभूतियों को अपग्रेड किया जबकि 195 को डाउनग्रेड। इस वित्त वर्ष में करीब 2.57 लाख करोड़ रुपये के कर्ज की डाउनग्रेडिंग की गई है, जो पिछले वित्त वर्ष के मुकाबले 1.5 गुना है। यह जानकारी बाजार नियामक सेबी के आंकड़ों से मिली। कीमत के लिहाज से मौजूदा वित्त वर्ष 2015-16 के बाद दूसरा सबसे खराब साल रहा है।

विशेषज्ञों ने कहा कि सुस्त आय और नोटबंदी व जीएसटी जैसे कदमों ने भारतीय कंपनी जगत के नकदी प्रवाह पर विपरीत असर डाला है। पिछले तीन सालों में आय में बढ़त की रफ्तार मोटे तौर पर स्थिर बनी हुई है। हाल में समाप्त सितंबर तिमाही में कंपनियों ने लाभ में औसतन 8 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की है। विश्लेषकों का अनुमान है कि  आय के चक्र में सुधार कम से कम दो तिमाही दूर है।

डाउनग्रेड में इजाफे की अन्य प्रमुख वजह क्षमता का कम इस्तेमाल है। 2010-2013 के बीच विनिर्माण कंपनियों ने मांग में अच्छी खासी बढ़ोतरी की उम्मीद में क्षमता बनाने पर भारी निवेश किया क्योंकि अर्थव्यवस्था उच्च विकास के पथ पर जाने की संभावना थी। हालांकि वैश्विक जिंसों की कीमतों में गिरावट के अलावा आर्थिक बढ़त की रफ्तार अनुमान से कम रहने के चलते भारतीय कंपनी जगत की योजना चौपट हो गई।

इक्विनॉमिक्स रिसर्च ऐंड एडवाइजरी के संस्थापक और प्रबंध निदेशक जी चोकालिंगम ने कहा, कंपनी की तरफ से क्षमता इस्तेमाल में बढ़ोतरी अभी तक नहीं हुई है और अर्थव्यवस्था के कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्र मसलन बुनियादी ढांचा व सीमेंट बेहतर प्रदर्शन नहीं कर रहे हैं। यहां तक कि दूरसंचार और संबंधित क्षेत्रों का परिदृश्य भी रिलायंस जियो की तरफ से अवरोध पैदा करने के बाद बेहतर नजर नहीं आ रहा है। जीएसटी लागू होने से छोटी व मध्यम आकार की कंपनियों की आय प्रभावित हुई है। संक्षेप में कहें तो मांगव नकदी प्रवाह कुछ चुनिंदा क्षेत्रों में ही अच्छा नजर आ रहा है।

डाउनग्रेड के मौजूदा चक्र की शुरुआत वित्त वर्ष 2016 में हुई, लेकिन क्षेत्र के हिसाब से बदलाव पिछले दो साल में ज्यादा हुए। शुरुआत में इस चक्र की अगुआई धातु व जिंस से जुड़ी कंपनियों ने की क्योंकि वैश्विक स्तर पर जिंसों की कीमतों में भारी गिरावट से इन क्षेत्रों पर दबाव पड़ा। हालांकि अब बैंक डाउनग्रेड की अगली पंक्ति में हैं। पिछले कुछ सालों मेंं बैंकिंग क्षेत्र गैर-निष्पादित आस्तियों में भारी बढ़ोतरी से उलझ गया है। लेनदार सतर्क हो गए हैं, जिससे सरकारी बैंकों की उधारी की रफ्तार घटी है।

विश्लेषकों ने कहा, डाउनग्रेड का मौजूदा चक्र उतार के करीब है। जीएसटी व नोटबंदी जैसे कदमों से पडऩे वाला एकबारगी का असर अब कम हो रहा है और आर्थिक संकेतकों में सुधार इनकी सेहत में मजबूती ला सकता है। रेटिंग एजेंंसियों ने कहा कि कम ब्याज दर और स्थिर परिचालन के चक्र के अलावा देसी मांग में सुधार से क्रेडिट की सेहत पर दबाव नरम पडऩे की संभावना है। क्रिसिल के चीफ एनालिटिकल ऑफिसर पवन अग्रवाल ने कहा, सामान्य मॉनसून, ब्याज दर में नरमी और महंगाई आदि के चलते हमें उपभोक्ता क्षेत्र की अगुआई में बढ़त की उम्मीद है। राज्यों में सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के क्रियान्वयन, नोटबंदी के चलते टली हुई मांग के फिर सामने आने से स्थिति अनुकूल हो सकती है।

साथ ही अगली तिमाहियों में आर्थिक रफ्तार सुधर सकती है क्योंकि सरकार ने खर्च में बढ़ोतरी के लिए कदम उठाए हैं। निर्यात के मौजूदा आंकड़े बताते हैं कि खास तौर से विकसित बाजारों में वैश्विक मांग सुधरी है।
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