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संकट में अर्थव्यवस्था या बदलाव का दौर?

अशोक लाहिड़ी /  November 08, 2017

भारतीय अर्थव्यवस्था संकट में है या इसमें सुधार का दौर चल रहा है, इस बारे में आपकी राय इस बात पर निर्भर करती है कि इन दिनों आप क्या पढ़ रहे हैं या किसे सुन रहे हैं? विस्तार से बता रहे हैं अशोक लाहिड़ी 

 
जाहिर तौर पर माक्र्सवादी विचारधारा को मानने वाले बीती एक सदी से ज्यादा वक्त से हर पूंजीवादी व्यवस्था में 'संकट' ही देखते हैं। परंतु हमारे देश में 'संकट' की बात करने वाले केवल माक्र्सवादियों तक सीमित नहीं हैं। बल्कि मुख्य धारा के समाचार पत्रों में भी 'देश पर आसन्न आर्थिक संकट' जैसे शीर्षक देखने को मिल जाते हैं। एक माह पहले सत्ताधारी दल के ही पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने कहा था कि अर्थव्यवस्था गिरावट के भंवर में उलझी है। 
 
निराशावादी कहते हैं कि अर्थव्यवस्था वर्ष 2016 की पहली तिमाही से ही अपनी गति खो चुकी है। तब से वर्ष 2017 की दूसरी तिमाही तक वृद्घि दर 8.7 फीसदी से गिरकर 5.7 फीसदी पर आ चुकी है। श्रम ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि बेरोजगारी वर्ष 2011-12 के 3.8 फीसदी से उछलकर वर्ष 2015-16 तक 5.0 फीसदी पर आ गई। सन 2015-16 और 2016-17 में विनिर्मित वस्तु क्षेत्र की वृद्घि में गिरावट आई और वह 10.8 फीसदी से गिरकर 7.9 फीसदी रह गई। वहीं विनिर्माण वृद्घि 5.0 फीसदी से गिरकर 1.7 फीसदी हो गई। बुनियादी क्षेत्र की कई परियोजनाएं लंबित हैं। सितंबर 2016 में इनकी लागत 10.7 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान लगाया गया था जो इस साल सितंबर तक बढ़कर 13.2 लाख करोड़ रुपये हो गई। 
 
वर्ष 2011-12 और 2016-17 के दरमियान सकल घरेलू उत्पाद में सकल जमा पूंजी निर्माण की हिस्सेदारी 42 फीसदी से गिरकर 38.4 फीसदी रह गई। बैंक ऋण में होने वाली वृद्घि भी 2015-16 के 10.9 फीसदी से गिरकर 2016-17 में 8.1 फीसदी हो गई। मार्च 2011 से मार्च 2017 के बीच बैंकों का कुल फंसा हुआ कर्ज उनके सकल अग्रिम के 2.5 फीसदी से बढ़कर 9.6 फीसदी हो गया। 
 
नोटबंदी ने असंगठित क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों को खासतौर पर प्रभावित किया है। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) ने इन विसंगतियों को और बढ़ाया। खासतौर पर छोटे और मझोले उद्यमों को इससे बहुत परेशानी हुई। निराशावादियों का तर्क रहा है कि सरकार राजकोषीय जवाबदेही एवं बजट प्रबंधन अधिनियम (एफआरबीएमए) से परे जाकर राजकोषीय प्रोत्साहन नहीं देना चाह रही और रिजर्व बैंक की नीतिगत दरों में कमी न करने की नीति के चलते पहले से कठिन बने हालात और मुश्किल होते जा रहे हैं।  
 
आशावादियों का मानना है कि हालात सुधर रहे हैं। उनके मुताबिक आरबीआई ही नहीं बल्कि आईएमएफ और एडीबी जैसे बाहरी संस्थान भी अर्थव्यवस्था के अगले वर्ष 6.7-7.4 फीसदी की दर से विकसित होने की बात कर रहे हैं।  एफआरबीएमए को लेकर दृढ़ता और आरबीआई की मुद्रास्फीति को लक्षित करने की नीति के चलते अगस्त 2015 से ही वृहद आर्थिक स्थिरता देखने को मिली है। मुद्रास्फीति भी नवंबर 2013 के 11.5 फीसदी के उच्च स्तर से गिरकर सितंबर 2017 में 3.3 फीसदी हो चुकी है। चालू खाते का घाटा भी 2012-13 के 5.2 फीसदी से 2016-17 में 0.8 फीसदी रह गया। सितंबर 2017 में डॉलर के हिसाब से निर्यात 25.7 फीसदी बढ़ा। अगस्त 2017 में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक में सुधार आया बल्कि यह नवंबर 2016 के बाद सबसे बेहतर स्थिति में पहुंच गया। इस दौरान पूंजीगत वस्तुओं के निर्माण में 5.9 फीसदी का सुधार हुआ। 
 
बीएसई-सीएमआईई के सर्वेक्षणों के मुताबिक बेरोजगारी घटी है और यह अगस्त 2016 के 9.82 फीसदी से कम होकर सितंबर 2017 में 4.47 फीसदी रह गई है। आशावादियों की मानें तो लंबित परियोजनाएं चिंता का विषय अवश्य हैं लेकिन सरकारी परियोजनाओं के लंबित होने की दर में कमी आई है और दिसंबर 2015 के 9.0 फीसदी से कम होकर यह अब 7.3 फीसदी रह गई है। केंद्र सरकार की बुनियादी ढांचागत परियोजनाओं की बढऩे वाली लागत और उसमें लगने वाला समय भी तेजी से कम हुआ है। इससे बेहतर क्रियान्वयन और बेहतर सार्वजनिक व्यय प्रबंधन का संकेत मिलता है। 
 
बैंक ऋण में धीमी वृद्घि की एक वजह सूचीबद्घ कंपनियों द्वारा गैर बैंकिंग ऋण की शरण में जाना भी है। इसमें विदेशी फंड, बाह्यï वाणिज्यिक कर, संस्थागत ऋण और म्युचुअल फंड आदि शामिल हैं। सरकार ने 24 अक्टूबर, 2017 को 2.11 लाख करोड़ रुपये का जो पुनर्पूंजीकरण बॉन्ड सरकारी बैंकों के लिए घोषित किया है। आशावादी कहते हैं कि यह बॉन्ड और नया बना दिवालिया कानून तथा वृद्घि सब मिलकर फंसे हुए कर्ज में उलझे बैंकों की दोहरे घाटे की समस्या को हल कर देंगे। मुझ समेत तमाम आशावादी यही कहेंगे कि नीतिगत स्तर पर भी बदलाव देखने को मिला है। अगस्त 2014 में योजना आयोग को भंग करने के साथ ही यह संकेत मिल गया था कि समाजवादी नियोजन व्यवस्था का अंत हो रहा है। बदलाव ऐसी नीतियों की दिशा में है जो स्थायी विकास की दिशा में हैं। मजबूत सुधारों की मदद से यथास्थिति को भंग करने के बाद अनिवार्य तौर पर उभरे दर्द के बाद लाभांश मिलना तय है।
 
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली राजग सरकार ने वृहद आर्थिक स्थिरता के मोर्चे पर भी बदलाव की पहल की है। लंबे समय से प्रतीक्षित जीएसटी को आखिरकार गत 1 जुलाई को शुरू कर दिया गया। जीएसटी ने वस्तुओं और सेवाओं को कर दर में एक निश्चित दायरा प्रदान किया। 17 केंद्रीय और राज्य स्तरीय दरें इसमें शामिल की गई हैं। इससे देश एक बाजार में तब्दील हुआ है और कई तरह की दिक्कतें दूर हुई हैं। दूसरा बेनामी लेनदेन निरोधक संशोधन अधिनियम 2016 और अघोषित विदेशी आय एवं परसंपत्ति (कर आरोपण) अधिनियम 2015 के जरिये भ्रष्टïाचार उन्मूलन की दिशा में गंभीरतापूर्वक काम हो रहा है। नोटबंदी ने गत नवंबर में काफी दिक्कतें पैदा की थीं लेकिन अभी यह कहना जल्दबाजी होगा कि सरकार नोटबंदी में पैसा जमा करने वालों की जानकारी का क्या करेगी और यह भविष्य में कालेधन की समस्या से कैसे जुड़ा है? 
 
तीसरा, वाजपेयी की राजग सरकार की तरह ही मौजूदा सरकार ने भी बुनियादी ढांचे को बढ़ावा दिया है। गत सप्ताह 6.92 लाख करोड़ रुपये मंजूर किए गए। इनकी मदद से पांच साल में 83,677 किलोमीटर सड़क बनाई जाएगी। चौथी बात, उदारीकरण के साथ खासतौर पर मेक इन इंडिया पहल के बाद प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में इजाफा हुआ है और यह 2013 के 28.2 अरब डॉलर से बढ़कर 2015 और 2016 में क्रमश: 44 अरब डॉलर रहा। पांचवां, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण योजना संप्रग सरकार के कार्यकाल में शुरू हो गई थी लेकिन इसका दायरा बहुत सीमित था। जनधन खातों, आधार और मोबाइल फोन को जोड़कर राजग सरकार ने इसे काफी मजबूती प्रदान की है। कल्याण योजनाओं के किफायती अंतरण से राशि सीधे लाभार्थियों के खाते में जाती है और लीकेज बहुत कम होती है। ये लाभ सामने आने शुरू भी हो गए हैं।
Keyword: india, economy, IIP, GDP,,
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