बिजनेस स्टैंडर्ड - पुनर्पूंजीकरण के बाद की राह क्या?
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पुनर्पूंजीकरण के बाद की राह क्या?

आकाश प्रकाश /  November 07, 2017

यह एक महत्त्वपूर्ण कदम है लेकिन बाद में हमें इन बैंकों के मानव संसाधन और संचालन ढांचे में अहम बदलाव करना होगा। इस बारे में विस्तार से बता रहे हैं आकाश प्रकाश

 
सरकार ने हाल ही में सरकारी बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के लिए 2.11 लाख करोड़ रुपये के पैकेज की जो घोषणा की उसने लोगों को विस्मित कर दिया। दो साल की अवधि में किए जाने वाले इस पुनर्पूंजीकरण की राशि की मात्रा चकित करने वाली है। इस घोषणा का समय और इसका दायरा दोनों अप्रत्याशित थे। बाजार ने इसे सकारात्मक प्रतिक्रिया दी और सरकारी बैंकों के शेयर कुछ ही घंटों में 30 से 40 फीसदी तक उछल गए। कई विश्लेषक इसे जीएसटी के बाद मोदी सरकार का दूसरा सबसे अहम सुधार बता रहे हैं। वे वित्त वर्ष 2019 में जीडीपी वृद्धि दर के अनुमान सुधारने में व्यस्त हैं। कई लोगों को लग रहा है कि बैंकिंग क्षेत्र की फंसे हुए कर्ज और अनुत्पादक परिसंपत्तियों की समस्या समाप्त हो जाएगी।
 
प्रस्तावित पुनर्पूंजीकरण की व्यवस्था को तीन हिस्सों में बांटा गया है। कुल राशि में 18,000 करोड़ रुपये बजट से दिए जाएंगे, 58,000 करोड़ रुपये बाजार से इक्विटी के रूप में जुटाए जाएंगे और 1.35 लाख करोड़ रुपये सरकार द्वारा पुनर्पूंजीकरण बॉन्ड के रूप में उपलब्ध कराए जाएंगे। यह सारी प्रक्रिया दो साल में पूरी की जाएगी लेकिन अधिकांश पूंजी अगली चार तिमाहियों में बैंकों में आएगी। पुनर्पूंजीकरण बॉन्ड नए थे और इनके चलते बाजार में उत्साह का माहौल बना। शेष दो हिस्से तो पुरानी इंद्रधनुष योजना में भी शामिल थे।
 
बाजार के उत्साह की वजह थी भारी भरकम धनराशि। सरकारी बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के लिए अधिकांश अनुमान 25 से 35 अरब डॉलर की राशि के थे, ऐसे में 32 अरब डॉलर की प्रस्तावित राशि पर्याप्त होनी चाहिए। इससे सरकारी बैंक अपने फंसे हुए कर्ज को निपटा सकेंगे, बेसल-3 मानकों को पूरा कर सकेंगे और दोबारा सुधार पथ पर आगे बढ़ सकेंगे। दूसरी बात, बतौर निवेशक हमें यही सिखाया जाता है कि तनावग्रस्त परिसंपत्तियों के मामले में भागीदारी के लिए पुनर्पूंजीकरण की प्रतीक्षा करनी चाहिए, बजाय पहले पूंजी प्रतिबद्धता जताने के। पुनर्पूंजीकरण योजना के बाद यह निश्चित है कि कई वर्षों में पहली बार कुछ सरकारी बैंक अब निवेश के काबिल होंगे। 
 
इससे वृहद आर्थिक स्थिति पर भी बहुत बोझ नहीं पड़ेगा। ऐसा लगता है कि पुनर्पूंजीकरण बॉन्ड के ब्याज के रूप में इसकी वास्तविक लागत करीब 9,000 करोड़ रुपये होगी। यह राजकोषीय घाटे को बहुत अधिक प्रभावित नहीं करेगा, न ही व्यवस्था में नकदी की स्थिति पर इसका बहुत अधिक असर होगा। यह पूरी प्रक्रिया एक तरह की वित्तीय इंजीनियरिंग के समान है। सामान्य लेखा के हिसाब से भी देखा जाए तो यह बैंकों की बैलेंस शीट नए सिरे से मजबूत करने के लिहाज से काफी है। वृहद अर्थव्यवस्था पर इसका इकलौता गलत प्रभाव सरकारी कर्ज में इजाफे के रूप में सामने आ सकता है। न तो रेटिंग एजेंसियों और न ही बॉन्ड बाजार बढ़े हुए कर्ज को लेकर बहुत उद्विग्न हैं। अगर उनको फिक्र नहीं है तो शायद यह बहुत मानी न रखता हो। 
 
साफ कहें तो इसे जितनी सहजता से स्वीकार किया गया है और जिस तरह बाजार ने इसकी सराहना की है, यह आश्चर्य की बात है कि आखिर नीति निर्माताओं ने यह करने में इतना वक्त क्यों लिया? पूंजी की जरूरत से तो हम वर्षों से अवगत थे। आर्थिक समीक्षा में 2014 में ही दोहरे घाटे का जिक्र  किया गया था। सरकार को पेशकदमी में तकरीबन चार साल लग गए। इससे कुछ नैतिक समस्याएं जुड़ी हुई हैं लेकिन हम समूची बैंकिंग व्यवस्था और अर्थव्यवस्था को बड़े उद्यमों को उबारने की राजनीति का बंधक तो नहीं बना सकते। 
 
सरकारी बैंकों के शेयरों कीमत में 30-40 फीसदी का इजाफा हुआ, यानी यह कहा जा सकता है कि पोजिशनिंग एकतरफा थी। हर कोई निजी बैंकों और सरकारी बैंकों के शून्य स्वामित्व की बात कर रहा था। इन दोनों क्षेत्रों के बाजार पूंजीकरण को देखते हुए सरकारी बैंकों के स्वामित्व में मामूली बदलाव भी कीमतों में बड़े बदलाव की वजह बन सकता था। यहां से अब कीमतों में स्थिरता आएगी। यह पूंजी पर्याप्तता और जोखिम की कमी का नया स्तर होगा।
 
निवेशक जिस अगले कदम की प्रतीक्षा कर रहे हैं वह मानव संसाधन और संचालन सुधार से संबंधित हैं। क्या सरकारी बैंकों को यह इजाजत होगी कि वे बाजार आधारित क्षतिपूर्ति चुकाएं?  क्या बैंकों को यह इजाजत होगी कि वे बाहर से विशिष्टï कौशल वाले लोगों को बैंक में लाएं? क्या निर्णय प्रक्रिया का राजनीतिकरण खत्म करने के उपाय अपनाए जाएंगे? बैंकों के बोर्ड और वरिष्ठï प्रबंधन को क्या अधिक स्वायत्तता प्रदान की जाएगी और उनके वाणिज्यिक निर्णयों पर सवाल उठाने बंद किए जाएंगे? अगर ये कदम उठाए जाते हैं तभी बैंकों में पूंजी डालने की प्रक्रिया बार-बार दोहरानी नहीं होगी। बिना इन सुधारों के तो जनता का पैसा यूं ही बरबाद होता रहेगा। सरकार ने और सुधारों का वादा किया है। उसे इन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। मुझे नहीं लगता कि निजीकरण रामबाण है। ये सुधार ज्यादा जरूरी हैं। इनके पूरा होने पर भी बैंकों का प्रदर्शन काफी सुधर सकता है। 
 
तमाम वैश्विक निवेशकों के मन में सवाल यह है कि क्या इससे निजी बैंकों और एनबीएफसी की संभावनाओं पर असर होगा? माना जा रहा है कि शीर्ष तीन सरकारी बैंकों के अलावा शेष बैंक केवल 6 से 8 फीसदी आरओई (इक्विटी पर प्रतिफल) हासिल कर पाएंगे। वे ऋण वृद्घि में बहुत तेजी नहीं ला पाएंगे। निजी बैंकों के लिए वृद्घि की तमाम संभावनाएं हैं। खासतौर पर तब जबकि अर्थव्यवस्था में गति हो। ऋण के मामले में भी बड़े सरकारी बैंक बड़े और मझोले आकार को कॉर्पोरेट ऋण पर ही ध्यान केंद्रित करेंगे। इस क्षेत्र में गहरी प्रतिस्पर्धा और शुद्घ ब्याज माॢजन में कमी देखने को मिलेगी, शेष क्षेत्रों में इसका बहुत कम प्रभाव होगा। 
 
असुरक्षित खुदरा ऋण, सूक्ष्म वित्त, सस्ते आवास, सूक्ष्म और छोटे मझोले उद्यम आदि क्षेत्रों में निजी क्षेत्र का ध्यान बना रहेगा। यहां वृद्घि की अपार संभावनाएं हैं। सरकारी बैंक इन क्षेत्रों को कितना संभाल पाएगा यह कहा नहीं जा सकता। नकदी या प्रतिफल पर सीमित प्रभाव के साथ देखा जाए तो निजी क्षेत्र की फंडिंग भी अप्रभावित नजर आती है। यह सरकार की ओर से एक बड़ा सकारात्मक कदम है। इससे बैंकिंग व्यवस्था की दिक्कतें दूर होंगी और फंसे हुए कर्ज से निपटने में मदद मिलेगी। हमें अर्थव्यवस्था में नकदी बढ़ती दिखेगी। बैलेंस शीट में सुधार की प्रक्रिया तेज होगी। बहरहाल, हमें आगे इन बैंकों के मानव संसाधन और संचालन के स्तर पर सुधार करने होंगे। उसके बिना बात नहीं बनेगी। 
Keyword: bank, loan, debt, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई),
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