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खुलासों का संदेश

संपादकीय /  November 07, 2017

इंटरनैशनल कंसॉर्शियम ऑफ इन्वस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स (आईसीआईजे) और जर्मन समाचार पत्र स्विचडॉयचा जाइटुंग ने खुलासा किया है कि दुनिया भर की कंपनियां विदेशी कंपनियों का सहारा लेकर कर चोरी करती हैं। पैराडाइस पेपर्स के नाम से किए गए वित्तीय आंकड़ों के अब तक के सबसे बड़े खुलासे में करीब 1.34 करोड़ फाइलें सामने आई हैं और यह पिछले साल के पनामा पेपर्स खुलासों से भी बड़ा है। इस बार कागजात बरमूडा की ऐपलबी और सिंगापुर की एशियासिटी नामक दो फर्मों से ताल्लुक रखते हैं। इनसे पता चलता है कि दुनिया भर के कारोबारियों ने अपने-अपने देश में कर अधिकारियों से बचने के लिए 19 टैक्स हैवन (कर बचाने में मददगार ठिकाने) का इस्तेमाल किया है। पिछली बार की तरह इस बार भी इस सूची में कई प्रमुख व्यक्तियों और कंपनियों के नाम उजागर हुए हैं। भारत से कुल 714 नाम हैं। इनसे यह संकेत मिलता है कि कर वंचना के अलावा मामला, हितों के टकराव और अधूरे खुलासों का भी हो सकता है। 

 
इन खुलासों के बाद एक बार पुन: सबका ध्यान घरेलू कंपनियों द्वारा अंतरराष्टï्रीय कर ठिकानों का प्रयोग काला धन जमा करने की समस्या की ओर गया है। इतना ही नहीं यह खुलासा ऐसे वक्त पर हुआ जबकि भारत सरकार अर्थव्यवस्था से काला धन निकाल बाहर करने पर अपनी पीठ थपथपा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस वादे के साथ सत्ता में आए थे कि काला धन जमा करके देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। निश्चित तौर पर सरकार ने खुलासों की जांच के लिए एक बहुस्तरीय एजेंसी के गठन का आदेश दिया है और कहा है कि प्रवर्तन निदेशालय, रिजर्व बैंक और वित्तीय खुफिया विभाग के अधिकारी घोषित कर ब्योरे और पैराडाइस पेपर्स का मिलान कर कार्रवाई करेंगे। 
 
बहरहाल, अतीत का अनुभव बताता है कि यह कहना आसान है लेकिन करना कठिन। उदाहरण के लिए गत वर्ष पनामा पेपर्स का खुलासा होने पर भी ऐसी ही जांच का आदेश दिया गया था लेकिन इसका नतीजा अब तक नजर नहीं आया है। समस्या का एक पहलू यह भी है कि केवल विदेशी खातों का होना अवैध नहीं है। ऐसे कई खाते अवैध नहीं होते हैं क्योंकि वे घरेलू नियमन का पालन करते हैं। यही वजह है कि सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि नतीजे दर्शाने की कोशिश में जांच कहीं कर आतंकवाद में न तब्दील हो जाए और विदेशों में निवेश करने वाले हर व्यक्ति को परेशान न किया जाए। कर वंचना और विदेशी खातों में काला धन रखने के मामलों में भी अंतर करना होगा। कर लगाने की कार्रवाई भी नियमों के दायरे में होनी चाहिए। 
 
अधिक स्थायी कार्रवाई के लिए बहुस्तरीय रुख अपनाना होगा। उदाहरण के लिए भारत को नियमन बेहतर करने और पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में काम करना चाहिए। मिसाल के तौर पर 1 अप्रैल से भारत जनरल ऐंटी-अवॉयडेंस रूल (गार) के प्रावधानों को क्रियान्वित कर चुका है। इससे कर अधिकारियों को कर वंचना संबंधी नीतियों के खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार प्राप्त होता है। इसी तरह ओईसीडी की बेस इरोजन ऐंड प्रॉफिट शिफ्टिंग (बीईपीएस) पहल का अधोहस्ताक्षरी होने के नाते भारत ने जून में एक बहुपक्षीय निवेश समझौते पर हस्ताक्षर किए ताकि कर संधियों का दुरुपयोग रोका जा सके। भारत ने प्रभावी प्रबंधन के स्थान की अवधारणा के दायरे को भी विस्तार दिया है ताकि सरकार को यह मौका मिल सके कि वह कर वंचना के लिए बनाई गई विदेशी कंपनियों पर नजर डाल सके। परंतु एक बात स्पष्टï है, अभी और कदम उठाए जाने बाकी हैं। कर दरों को तार्किक बनाने और कर वंचना के प्रोत्साहन कम करने से भी इसमें मदद मिलेगी।
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