बिजनेस स्टैंडर्ड - वायु प्रदूषण की बड़ी समस्या से निपटने में अहम हैं कड़े उपाय
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वायु प्रदूषण की बड़ी समस्या से निपटने में अहम हैं कड़े उपाय

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  November 06, 2017

मुझे गलत मत समझिए। दो सप्ताह पहले मैंने कहा था कि हमें इन सर्दियों में सांस लेने में राहत होगी। इसका अर्थ यह नहीं है कि हम स्वच्छ हवा में सांस ले सकेंगे। मेरा मतलब था कि कुछ कदमों की बदौलत पिछले जाड़ों की तुलना में इस बार वायु प्रदूषण कम होगा। स्तर बहुत ज्यादा होने का यह अर्थ नहीं है कि हम प्रदूषण के खिलाफ शिथिलता बरतें या जरूरी कदमों को धीमा कर दें।

 
बीती सर्दियों में नवंबर के 53 फीसदी दिन प्रदूषण से भरे हुए थे। दिसंबर में 32 फीसदी और जनवरी में 45 फीसदी दिनों के साथ यही बात थी। जाहिर है यह निहायत खतरनाक और जहरीला था। इन जाड़ों में हम उम्मीद कर सकते हैं कि ऐसे दिन कम होंगे। परंतु हवा की गुणवत्ता अभी भी निहायत खराब है। अगर हम कोई ठोस उपाय नहीं करते हैं तो हालात ऐसे ही बने रहेंगे। 
 
इस स्तर को कम करने के लिए क्या किया जाना चाहिए? मैं जरूरी कदमों को चार श्रेणियों में बांटती हूं: तात्कालिक और आवश्यक, लंबी अवधि के लिए लेकिन तत्काल शुरू करने वाली, आवश्यक लेकिन क्रियान्वयन की दृष्टिï से कठिन और कठिन लेकिन असंभव नहीं। तात्कालिक श्रेणी से शुरू करते हैं। सच यह है कि वायु प्रदूषण को लेकर तमाम शोरगुल के बीच हम हालात संभाल नहीं पा रहे हैं। गंदे से गंदा ईंधन कर से रियायत पा रहा है जबकि स्वच्छ ईंधन को रियायत नहीं दी जा रही। वस्तु एवं सेवा कर व्यवस्था के अधीन फर्नेस ऑयल जैसा जहरीला ईंधन इस्तेमाल करने वाले उद्योगों को ईंधन पर रीफंड दिया जा रहा है। परंतु प्राकृतिक गैस जीएसटी से बाहर है। यानी उद्योगपति चाहकर भी स्वच्छ ऊर्जा का इस्तेमाल नहीं कर सकते। इस पर जमकर कर लगाया गया है और कोई रीफंड नहीं दिया जाता। 
 
हम दुनिया का सबसे प्रदूषक ईंधन यानी पेट कोक, अमेरिका से आयात करते हैं। अमेरिका प्रदूषण के चलते खुद इस पर प्रतिबंध लगा चुका है। चीन ने इसका आयात बंद कर दिया है लेकिन हम ओपन जनरल लाइसेंस के अधीन इसे अनुमति दिए जा रहे हैं। तीन साल पहले हमने करीब 60 लाख टन पेट कोक का आयात किया था और गत वर्ष मार्च के अंत तक यह 1.40 करोड़ टन हो गया था। घरेलू स्तर पर भी 12 से 14 लाख टन पेट कोक का उत्पादन होता है। यानी हम इस मायने में चीन को भी पीछे छोड़ चुके हैं।
 
अब सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में इस गंदे ईंधन का इस्तेमाल बंद करने के लिए दखल दिया है। उसने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से कहा है कि वह उच्च सल्फर ईंधन से उत्पन्न प्रदूषकों को देखते हुए उत्सर्जन मानक तय करे। उद्योग जगत इससे बचने की हरसंभव कोशिश कर रही है। दुख की बात है कि हम स्वच्छ हवा को लेकर चिंतित नहीं नजर आ रहे।
 
इसके बाद आता है दीर्घावधि का तात्कालिक एजेंडा। यह सच है कि वाहन उद्योग प्रदूषण में सबसे बड़ा योगदान कर रहा है। उसमें डीजल इंजन सबसे ज्यादा प्रदूषण फैलाते हैं। फिलहाल पूरा प्रयास प्रदूषण मानकों में सुधार के जरिये प्रदूषण कम करने पर है। परंतु यह अपर्याप्त है। सच्चाई यह है कि भले ही हम हर वाहन से होने वाला प्रदूषण कम कर दें लेकिन वाहनों की तादाद तो रोजबरोज बढ़ती ही जा रही है। देश में अभी ऐसे लोग बहुत बड़ी तादाद में हैं जो नए वाहन खरीदेंगे। तो प्रदूषण में कमी कैसे आएगी? 
 
इकलौती राह यही है कि सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा दिया जाए। परंतु इस मोर्चे पर भी कुछ खास नहीं हो रहा है। बीते कुछ सालों में दिल्ली में एक भी नई बस शुरू नहीं हुई। पैदल या साइकिल से चलने वालों के लिए कोई नया मार्ग नहीं बन रहा। दूरदराज इलाकों तक आवागमन की सुविधा उपलब्ध कराने की दिशा में भी कोई प्रयास नहीं हो रहा है। हम इस मोर्चे पर पूरी तरह विफल हैं। 
 
सड़कों से उठने वाली धूल, विनिर्माण के कचरे या कचरा जलाने से उपजे धुंए को मैं आवश्यक लेकिन कठिन निपटान की श्रेणी में रखती हूं। जब हर जगह सड़क या तो खोदी जा रही है या फिर उस पर काम चल रहा है तो भला उससे कितनी धूल साफ की जा सकती है। नगर निकायों को मिलकर काम करना होगा। ऐसा केवल सॢदयों में नहीं करना होगा बल्कि हर समय इसकी जरूरत होगी। कचरा जलाने के मामले में भी यही सच है। हमारे पास कचरा निपटान की कोई ठोस व्यवस्था नहीं है। हम आग लगाकर ही कचरे को निपटा सकते हैं। दिल्ली जैसे शहरों में जहां कचरा निस्तारण के ठिकाने बनाए गए हैं वहां भी जब तब आग लगती ही रहती है। अगर कचरा फेंकने की  उपयुक्त व्यवस्था नहीं है तो भी सबसे आसान यही लगता है कि उसे एक जगह एकत्रित कर जला दिया जाए। यही होता आया है। हमें कचरे के पूर्ण निस्तारण की व्यवस्था करनी होगी। इसमें कचरे को अलग-अलग करना शामिल है। आधे अधूरे उपायों से काम नहीं चलने वाला। 
 
अंत में बात करते हैं दिल्ली के आसपास पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में फसल जलाने की प्रवृत्ति की। इस समस्या को हल किया जा सकता है लेकिन इसके लिए ऐसा हल निकालना होगा जो किसानों को अपने फसल अवशेष के वैकल्पिक उपयोग का तरीका सिखा सके। यहां हमें बड़े जवाब तलाश करने होंगे तभी इनका क्रियान्वयन हो सकेगा। हम चाहे जितनी पीठ थपथपा लें लेकिन हमें ठोस उपायों और कदमों की आवश्यकता है।  वायु प्रदूषण तब तक समाप्त नहीं होगा जब तक कि हम उपरोक्त सवालों को हल नहीं करते। इसके कोई फौरी इलाज नहीं हैं बल्कि इस कठिन समस्या के कठिन हल तलाश करने होंगे। 
Keyword: environment, india, pollution,,
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