बिजनेस स्टैंडर्ड - पुनर्पूंजीकरण से हो पाएगा बैंकों का कायाकल्प?
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Tuesday, November 21, 2017 11:07 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|
 
होम विशेष खबर

पुनर्पूंजीकरण से हो पाएगा बैंकों का कायाकल्प?

देवाशिष बसु /  November 06, 2017

सार्वजनिक बैंकों में अतिरिक्त पूंजी डालने के फैसले से बैंकिंग क्षेत्र की हालत में कितना सुधार हो सकता है? इसका विश्लेषण कर रहे हैं देवाशिष बसु

 
हाल ही में एक सफल एवं सजग फंड मैनेजर ने मुझे ईमेल भेजकर सार्वजनिक बैंकों के पुनर्पूंजीकरण की सरकारी योजना की एक तुलनात्मक तस्वीर भेजी। मैंने उस तस्वीर का थोड़ा विस्तार किया है। कल्पना कीजिए कि एक प्रमोटर (प्रवर्तक) परिवार के नियंत्रण वाली कुछ सूचीबद्ध कंपनियां हैं। भ्रष्टाचार की चपेट में आकर इन कंपनियों का मूल्य काफी कम हो चुका है। प्रवर्तक भी कंपनियों के बेहतर परिचालन पर पर्याप्त ध्यान नहीं देते हैं। घाटे का बोझ बढऩे से उनके पास पूंजी की भी कमी है लेकिन वे जुटाई गई विशाल सार्वजनिक जमाराशि को दबाकर बैठी हैं। एक दिन प्रवर्तक चतुराई-भरी योजनाओं के जरिये इस सार्वजनिक जमा का इस्तेमाल करने का फैसला करता है। कंपनियों को अपने पास रखी विशाल राशि कर्ज के तौर पर प्रवर्तक को देनी होगी जो उसका इस्तेमाल इन कंपनियों में नए शेयर खरीदने के लिए करेगा। इसके पीछे तर्क यह दिया जाएगा कि इससे उन कंपनियों की सेहत सुधरेगी, भले ही पुराना प्रबंधन उनका संचालन करता रहे। 
 
केंद्र सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में पुनर्पूंजीकरण की योजना का ऐलान कर बिल्कुल यही काम किया है। सरकार ने इन बैंकों से वह राशि ले ली थी जो उसकी थी ही नहीं और अब अपने पैसे के तौर पर उन्हें वापस करने जा रही है।  अगर निजी क्षेत्र के किसी प्रवर्तक ने पिछली कोशिशों की नाकामी के बाद ऐसी ही योजना पेश की होती तो निवेशकों और नियामकों की क्या प्रतिक्रिया होती? नियामकों ने इसे एक इरादतन चूककर्ता  की तरफ से किए जाने वाले बार-बार किए जाने वाले कुप्रबंधन का सटीक उदाहरण बताते हुए फटकार लगा दी होती। निवेशकों ने तो गुस्से और अविश्वास के चलते उस प्रवर्तक कंपनी के शेयरों को तिलांजलि दे दी होती। इसके पीछे उनकी सोच यही होती कि पूंजी का विस्तार होगा और फिर उसे कम कर दिया जाएगा। खैर, खराब प्रबंधन और पूंजी का गलत आवंटन वित्त से संबंधित किताबों का विषय है। वास्तविक जिंदगी में हालात वैसे नहीं होते हैं। असलियत में, नियामकों ने चुप्पी साध ली जबकि निवेशक खुशी से उछल पड़े। यह अपने आप में वित्त के छात्रों और निवेशकों के लिए एक अच्छा सबक है। हर कोई इस बात से काफी खुश है कि एक गहराते बैंकिंग संकट का समाधान निकाल लिया गया है। यह संकट उस दोषपूर्ण बैंकिंग मॉडल की उपज है जो 1969 में लागू किया गया था। इस बैंकिंग मॉडल ने बैंकों की अक्षमता बढ़ाने, कर्ज आवंटन में भ्रष्टाचार का सहारा लेने और बार-बार बेलआउट पैकेज लागू करने के हालात पैदा किए।
 
सवाल है कि क्या जाना चाहिए था? किसी भी लाभदायक व्यावसायिक उद्यम के लिए जवाबदेह प्रबंधन और जिम्मेदार स्वामित्व तो उसकी जान हैं। मालिकों का यह दायित्व है कि वे पूंजी का आवंटन सही तरीके से करें जबकि प्रबंधकों पर अपने कारोबारी लक्ष्यों को हासिल करने का जिम्मेदारी होती है। ऐसे में प्रोत्साहन राशि ही वह जरिया है जो मालिकों और प्रबंधकों को एक दूसरे से जोड़ता है। मालिकों के लिए अधिक मुनाफा और बढ़ा बाजार मूल्य प्रोत्साहन का काम करता है तो प्रबंधकों को लिए अधिक प्रतिफल और बाजार मूल्य प्रोत्साहित करता है। सरल शब्दों में, यह साझा प्रोत्साहन ही आधुनिक पूंजीवाद और पूंजी निर्माण का मूल आधार है। अगर इनमें से कोई भी अवयव नदारद है तो उससे पूंजी के गलत आवंटन और घाटे की स्थिति पैदा होगी। 
 
दुर्भाग्य से, जहां घाटे में चल रहे निजी उद्यम को बंद किया जा सकता है या उसका अधिग्रहण हो सकता है वहीं घाटे में चल रही एक सरकारी कंपनी की स्थिति उस जुआरी जैसी होती है जो कितनी ही बार मात क्यों न खा चुका हो लेकिन उसे नई जिंदगी मिल जाती है। लिहाजा इन सार्वजनिक उद्यमों को प्रोत्साहन देने से इतर हम अगले गैर-जिम्मेदार पूंजीकरण की जमीन तैयार करते हुए उन्हें गलत-प्रोत्साहन देते हैं।
 
दुनिया भर में लोकतांत्रिक सरकारें जवाबदेह मालिक के रूप में काम करने के मामले में स्वाभाविक रूप से खराब साबित होती हैं जिससे वह कहावत चरितार्थ होती है कि 'कारोबार में सरकार की कोई संलिप्तता नहीं होनी चाहिए'। खुद प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी ने भी 2014 के चुनावों के दौरान यही बात कही थी लेकिन जल्द ही वह इसे भूल गए। सार्वजनिक बैंकों के मालिक के रूप में सरकार न तो खुद पूंजी दे सकती है (खुद सरकार का खजाना खाली है) और न बैंकों का प्रबंधन ही कर सकती है (उसके पास समय और तवज्जो दोनों की कमी है)। जब हालात ठीक होते हैं तो लोकतांत्रिक सरकारें अक्सर इन बैंकों को गलत काम करने के लिए मजबूर करती हैं। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के समय कमोडिटी और रियल एस्टेट क्षेत्रों में भ्रष्ट एवं निकम्मे प्रबंधन के अलावा पूरी तरह धोखाधड़ी वाली गतिविधियों का भी बैंकों ने जिस तरह साथ दिया था, उससे यह बात बखूबी सामने आई थी। कुछ मामलों में बैंक प्रबंधक के स्तर पर भ्रष्टाचार हुआ था लेकिन अधिकांश मामलों में गलत ऋण आवंटन के आदेश नेताओं ने ही दिए थे। इसके लिए राजनीतिक मजबूरियों को भी ध्यान में रखना होगा। मोदी सरकार की पुनर्पूंजीकरण योजना का विरोध कर रहे पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने खुद बैंकों को किसी ठोस परिसंपत्ति आधार के बगैर हजारों करोड़ रुपये के शिक्षा ऋण जारी करने को कहा था। इसकी वजह यह थी कि पेशेवर शिक्षा तक सामान्य परिवारों के छात्रों की पहुंच बनाना सामाजिक रूप से वांछनीय था। बैंक प्रबंधन नेताओं को मना नहीं कर सकते हैं और उन्हें अपना काम सही तरह से अंजाम देने पर न तो कोई प्रोत्साहन दिया जाता है और न ही उन्हें भ्रष्टाचार के लिए दंडित किया जाता है। ऐसी स्थिति में अधिक पूंजी लगा देने से ही हालात कैसे सुधर सकते हैं? उसमें भी सरकार वित्तीय चालबाजी का आसान विकल्प यह काम कैसे कर सकता है? हमें शल्य चिकित्सा की जरूरत थी लेकिन केवल मरहम-पट्टïी ही की गई।
 
यह अपने आप में रहस्यपूर्ण है कि इस तरह के आसान विकल्प को उसी सरकार ने अपनाया है जिसका दावा है कि पहली बार साहसिक फैसले लेने से नहीं डरने वाला एक प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार एव अक्षमता पर सख्ती बरत रहा है। साहसिक फैसले लेने के नजीर के तौर पर सरकार उस नोटबंदी का उदाहरण देती है जिसने समूचे देश को कतार में खड़ा कर दिया था और मजदूरों, किसानों एवं छोटे कारोबारियों की जिंदगी ही बदलकर रख दी। इस सरकार के साहसिक फैसले का एक और उदाहरण जीएसटी को बताया जाता है जिसे बिना पर्याप्त तैयारी के ही लागू कर दिया गया था। 
 
यह काफी अचरज भरा है कि इतनी साहसी एवं आग्रही सरकार ने भी चुपके से कमोबेश उसी विकल्प को अपनाया है जो अतीत में कई बार नाकाम हो चुका है। दुखद यह है कि रेटिंग एजेंसियों, कारोबारी जगत, फंड प्रबंधकों और विश्लेषकों ने इस स्थिति को जानते हुए भी इस घोषणा पर खुशी का ही इजहार किया।
 
(लेखक मनीलाइफ डॉट इन वेबसाइट के संपादक हैं)
Keyword: bank, loan, debt, NPA,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 कर में छूट से बढ़ेंगे ऑनलाइन भुगतान?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS General News   Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.