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पारदर्शी हो रुख

संपादकीय /  November 06, 2017

सरकारी बैंकों के फंसे हुए कर्ज की समस्या के बारे में हमें लंबे समय से जानकारी है। इस बीच कुछ हालिया नतीजों और उसके बाद उठाए गए नियामकीय कदमों से पता चलता है कि निजी क्षेत्र के बैंकों में भी परिसंपत्ति की गुणवत्ता की समस्या है। इन हालात में जबकि समूचे बैंकिंग क्षेत्र की सेहत की जांच परख हो रही है, यह भी आवश्यक है कि बैंकों की परिसंपत्तियों की गुणवत्ता की जांच के लिए पारदर्शी और स्थायित्व भरे तरीके अपनाए जाएं। 

 
हाल के दिनों में ऐसी धारणा बनी है कि बैंकिंग नियामक यानी केंद्रीय रिजर्व बैंक और उसके नियमन के अधीन कुछ अन्य बैंकों के बीच परिसंपत्तियों के वर्गीकरण को लेकर मतभेद रहे। एक निजी बैंक के प्रबंध निदेशक ने हाल ही में एक साक्षात्कार में कहा कि बैंक आज्ञाकारी बच्चों की तरह नियामक के निर्देश पर परिसंपत्तियों का वर्गीकरण करते हैं। बैंकिंग जगत देश की आर्थिक सेहत के लिए बहुत मायने रखता है और इस क्षेत्र में फंसे हुए कर्ज की समस्या आज की नहीं बल्कि काफी पुरानी है। ऐसे में आरबीआई अगर इस क्षेत्र को दुरस्त करने के लिए पेशकदमी करता है तो किसी को दिक्कत नहीं होनी चाहिए। बहरहाल, यह भी सच है कि पारदर्शिता और स्थायित्व के लक्ष्य पूरे नहीं होंगे, अगर नियामक द्वारा तय किए गए मानक सभी पर्यवेक्षकों और बैंकों के समक्ष स्पष्टï नहीं होंगे। वर्ष 2015 में भी परिसंपत्ति गुणवत्ता की समीक्षा की गई थी और तब पता चला था कि आरबीआई बैंकों की ऐसी परिसंपत्तियों को लेकर चिंतित था जो तनावग्रस्त होने के काफी करीब थीं। इस बात को लेकर व्यापक चिंता थी कि कुछ बड़ी कंपनियां व्यवस्था के साथ खिलवाड़ कर रही हैं और यह सुनिश्चित करने में लगी हैं कि उनके खाते वास्तविकता से अधिक विश्वसनीय नजर आएं। इसके बावजूद यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि क्या इस पूरी कवायद से असली सबक निकल कर आ रहे हैं?
 
सही सबक यही होगा कि किसी ऋण की गुणवत्ता को जांचने के लिए समान मानक तय किए जाने चाहिए। परंतु इसके बावजूद हाल के दिनों में जब बैंकिंग नियामक और कम से कम तीन निजी बैंकों के बीच कुछ खातों के दर्जे और उनके लिए की जाने वाले प्रोविजनिंग को लेकर असहमति पैदा हुई तो कम से कम इससे तो कोई खास यकीन उत्पन्न नहीं होता। अगर नियामक ऐसे मानक अपनाता है जो बैंकों द्वारा अपनाए जाने वाले मानकों से अलग हों तो फिर यह मतभेद स्थायी नहीं होता। इसी प्रकार अगर बैंकों के बहीखातों की गुणवत्ता का आकलन करने में मनमानापन अपनाया गया तो यहां समस्या उत्पन्न होनी तय है। क्या मानक ऋणों को तनावग्रस्त परिसंपत्ति के रूप में पुनर्वर्गीकरण किया जा रहा है? अगर ऐसा है तो क्यों और किन मानकों के आधार पर? आरबीआई और बैंकों को मिलकर यह स्पष्टï करना होगा कि ये कौन से मानक हैं?
 
निजी क्षेत्र के प्रतिष्ठिïत बैंकों की ओर से जारी किए गए वक्तव्य में कहा गया है कि वे उनके चुनिंदा ऋण को लेकर आरबीआई की सक्रियता से कतई सहमत नहीं हैं। इन मामलों में आरबीआई को अपने कदमों की वजह एकदम स्पष्टï रूप से सामने रखनी होगी ताकि तमाम बाजार प्रतिभागियों और पर्यवेक्षकों को इसे लेकर कोई संदेह नहीं रह जाए कि आखिर कौन से कदम एक मानक ऋण को तनावग्रस्त के खांचे में डाल देते हैं। नियामक के बंद दरवाजों के पीछे होने वाली निजी बातचीत खुले और पारदर्शी नियम कायदों का विकल्प नहीं हो सकती क्योंकि इससे सब लोग अवगत तो रहते हैं। अगर पारदर्शिता बरती जाए तो सभी अंशधारकों को मदद मिलेगी और इस क्षेत्र में परिपक्वता आती है।
Keyword: bank, loan, debt, NPA,,
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