बिजनेस स्टैंडर्ड - बैंकों में नकदी डालने पर कुछ जरूरी सवाल
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Thursday, November 23, 2017 02:03 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|
 
होम विशेष खबर

बैंकों में नकदी डालने पर कुछ जरूरी सवाल

अजय शाह /  November 05, 2017

बैंकिंग क्षेत्र में बिना सुगठित संचालन और तकनीकी उन्नयन के नई पूंजी डालने का नतीजा बैंकिंग क्षेत्र की ओर से भविष्य में और ढिलाई के रूप में सामने आ सकता है। विस्तार से बता रहे हैं अजय शाह

 
निश्चित रूप से 2.11 लाख करोड़ रुपये में से 1.35 लाख करोड़ रुपये की राशि कम नहीं होती और इसका समायोजन करना आसान नहीं है। यह राशि इस वर्ष केंद्र सरकार के शुद्घ कर राजस्व का 11 फीसदी और वर्ष 2002-03 के सकल शुद्घ कर राजस्व के बराबर है। दिल्ली मेट्रो के पहले तीन चरणों में 70,000 करोड़ रुपये का व्यय आया। यानी बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के ताजा फैसले में इससे करीब दोगुनी राशि खर्च की जाएगी। मगर देश के बैंकिंग क्षेत्र की समस्या यहां समाप्त नहीं होने वाली। आर्थिक नीति बनाने वालों को भविष्य में भी सरकारी बैंकों को उबारने के लिए राजकोषीय व्यय से जुड़े बड़े निर्णय लेने होंगे। आखिर वे कौन से सिद्घांत हैं जिनके आधार पर ऐसे निर्णय लिए जाते हैं?
 
हमें पहला सवाल तो यही पूछना चाहिए: भारत को बैंकिंग की किस कदर आवश्यकता है? कई अन्य देशों मसलन अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, चीन आदि में बहुत बड़ी बैंकिंग व्यवस्था है। परंतु भारत में बैंक अर्थव्यवस्था के लिए इस कदर महत्त्वपूर्ण नहीं हैं। भारत की अर्थव्यवस्था बाजार के दबदबे वाली है। 2,400 बड़ी कंपनियों के पास ही 131 लाख करोड़ रुपये का शेयर बाजार पूंजीकरण है। अगर हम बची हुई कंपनियों में इक्विटी की गणना कर पाएं तो यह राशि इससे बहुत अधिक होगी। विरोधाभासी बात यह है कि सभी बैंकों द्वारा निजी तौर पर दिए गए ऋण का आंकड़ा 80 लाख करोड़ रुपये का है। जाहिर है बैंकिंग दुनिया के अन्य इलाकों की तुलना में भारत के लिए कम अहमियत रखती है।
 
दूसरा सवाल जो हमें पूछना चाहिए वह यह है कि क्या हमारे पास ऐसे नीतिगत उपाय हैं जिनकी मदद से गैर बैंकिंग क्षेत्र से पूंजी की आवक को अर्थव्यवस्था में तेजी से समायोजित किया जा सके? हमारे मामले में इसका जवाब साफ तौर पर हां है। शेयर बाजार, बॉन्ड बाजार, विदेशी मुद्रा की आवक, गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी), वित्तीय प्रौद्योगिकी कंपनियों, प्रतिभूतिकरण आदि की मदद से उदारीकरण के जरिये यह आसानी से किया जा सकता है। इन कारकों की मदद से हम पूंजी तक अपनी पहुंच बना सकते हैं और बैंक ऋण का मुकाबला कर सकते हैं। 
 
तीसरा सवाल यह पूछा जाना चाहिए कि क्या अर्थव्यवस्था के लिए यह समय ऐसा है कि ऋण वृद्घि पर जोर दिया जाए? आज भारत में हम दिवालिया संहिता पर अमल के साथ परिवर्तन के दौर से गुजर रहे हैं। भारत में विभिन्न निगम पारंपरिक तौर पर अनुशासित नहीं रहे हैं और उनमें भुगतान को लंबित करने की आदत रही है। दिवालिया संहिता ने परेशान कर्जदाता या बॉन्ड धारक को यह अवसर प्रदान किया है कि वह चाहे तो दिवालिया प्रक्रिया की शुरुआत कर सके। भारतीय फर्मों को अब हालात में सुधार करना होगा। उन्हें अब समस्त भुगतान समय पर करने होंगे। इससे उनकी नकदी की स्थिति में फर्क आएगा। अगर कुछ वर्ष तक नकदी की सख्ती रही तब तो ठीक है और अगर हम बैंकिंग संकट का सामना नहीं कर रहे होते तब भी कुछ वर्ष बाद यह स्थिति बननी ही थी।
 
चौथा प्रश्न यह है कि क्या हमारी राजकोषीय स्थिति इतनी मजबूत है जिसके तहत हम बढ़ते ऋण को आसानी से हासिल कर सकें? भारत में इसका जवाब नकारात्मक है। देश लंबे समय से राजकोषीय दबाव में है, हमारी क्रेडिट रेटिंग खराब है और हमारे यहां ऐसे स्वैच्छिक बॉन्ड निवेशक नहीं हैं जो देश के राजकोषीय संस्थानों पर यकीन रख सकें। ऐसे में बढ़ा हुआ कर्ज आसानी से समायोजित नहीं होगा। यह पूरी तरह अव्यवहार्य होगा।
 
पांचवां सवाल यह पूछा जाना चाहिए कि सरकार द्वारा खर्च किए जाने वाले आखिरी रुपये की सामाजिक लागत क्या है? कर नीति और कर प्रशासन के लिए मजबूत ढांचे वाले एक देश में जहां सार्वजनिक ऋण प्रबंधन की मजबूत तकनीक मौजूद हो, वहां सरकारी व्यय के हर अतिरिक्त रुपये की लागत 1.3 से 1.5 रुपये तक हो सकती है। परंतु भारत में जहां कर नीति, कर प्रशासन और ऋण प्रबंधन को लेकर ठोस तरीके से कुछ भी नहीं कहा जा सकता है, वहां सरकारी व्यय के हर अतिरिक्त रुपये की सामाजिक लागत 3 रुपये तक हो सकती है। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि 13.5 खरब रुपये खर्च करने की सामाजिक लागत 40 खरब रुपये तक हो सकती है। हमें सार्वजनिक धन के व्यय को लेकर मितव्ययिता बरतनी चाहिए।
 
छठा प्रश्न यह पूछा जाना चाहिए कि आखिर हालात इतने बिगड़े क्यों और क्या हम यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि हालात दोबारा नहीं बिगड़ें? बैंकिंग संकट की बात करें तो इससे निपटने के लिए आरबीआई के बैंकिंग नियमन और निगरानी के मोर्चे पर मजबूत संचालन और तकनीकी क्षमताओं की आवश्यकता है। अगर ऐसा नहीं किया जाता है तो बैंकिंग व्यवस्था में नई धनराशि डालने से होगा यही कि कुछ दिन बाद बैंक पुन: वही व्यवहार दोहराने लगेंगे। करदाताओं का पैसा बैंकों के लिए व्यय करने से जुड़ी हर चर्चा के साथ आरबीआई का बैंकिंग सुधार संबंधी श्वेत पत्र अवश्य होना चाहिए। इसके लिए बौद्धिक क्षमताओं की जरूरत होती है। मसलन दो कमजोर सरकारी बैंकों का विलय कर एक बड़ा कमजोर बैंक बना देना सुधार नहीं है। विनिर्माण कंपनियों और आईसीआईसीआई बैंक की उच्च शेयर कीमतों को लेकर वित्त मंत्रालय के निर्णय के बाद शेयर बाजार की प्रतिक्रिया बहुत कुछ कहती है। 
 
कुछ लोग ब्रिटेन और अमेरिका द्वारा सन 2008 के संकट के वक्त अपनाए गए उपायों को लेकर बहुत उत्सुक हैं। ऐसे संकेत दिए जाते रहे हैं कि भारतीय बैंकों की खस्ता हालत के मद्देनजर यह सरकार का उत्तरदायित्व है कि वह सरकारी बैंकों को ऐसी मदद मुहैया कराए। बहरहाल, उपरोक्त छह सवालों की बात करें तो अमेरिका अथवा ब्रिटेन में इनके उत्तर एकदम अलग होते। वहां बड़ी बैंकिंग व्यवस्था है। उनके यहां गैर बैंकिंग वित्तीय व्यवस्था को उदार बनाने या उसका समायोजन करने की गुंजाइश नहीं है। हालांकि वे भी एक वक्त ऐसी स्थिति में थे जब उन्हें नकदीकरण की जरूरत थी। उन्हें एएए की क्रेडिट रेटिंग हासिल थी, उनका सार्वजनिक ऋण प्रबंधन मजबूत था और कर्ज बढऩे देने की गुंजाइश थी। सार्वजनिक फंड की उनकी सीमांत लागत 1.5 थी। इससे जाहिर होता है कि उनकी कर नीति, कर प्रशासन और ऋण प्रबंधन तीनों मजबूत थे। इन देशों के वित्त मंत्रालयों ने न केवल निवेश किया बल्कि उन्होंने वित्तीय एजेंसियों में भी तत्परतापूर्वक सुधार किया। अर्थव्यवस्था जैसे क्षेत्रों में स्थानीय संदर्भ अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। 
 
यूटीआई के संकट पर नजर डालते हैं। उसमें एक ओर जहां करदाताओं के धन का इस्तेमाल किया गया वहीं साथ में कहीं अधिक गहरे सुधारों को भी अंजाम दिया गया: यूटीआई अधिनियम को समाप्त किया गया, यूटीआई के निजीकरण की प्रक्रिया शुरू की गई और उसे सेबी के नियमन के तहत लाया गया। यशवंत सिन्हा, एस. नारायण, जैमिनी भगवती, पी. चिदंबरम, यू के सिन्हा, केपी कृष्णन, एम दामोदरन आदि कुछ ऐसे लोग हैं जिन्होंने करदाताओं के धन के सापेक्ष सुधारों को भी बढ़ावा दिया। आज तो वित्तीय क्षेत्र सुधार का परिपक्व डिजाइन हमारे पास है जो जोखिम को कम करता है।
Keyword: bank, loan, debt, fund,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 पेमेंट बैंक में प्रतिस्पर्धा होगी ग्राहकों के लिए फायदेमंद?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS General News   Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.