बिजनेस स्टैंडर्ड - तिरुपुर के कपड़े का ताना-बाना
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तिरुपुर के कपड़े का ताना-बाना

टी ई नरसिम्हन /  November 05, 2017

एक साल पहले एस वेंकटेश एक जॉब वर्क यूनिट चला रहे थे, जिसमें करीब 10 लोगों को काम मिला हुआ था। आज वह तिरुपुर के निटवियर के गढ़ में एक बड़ी परिधान इकाई में सुपरवाइजर के रूप में काम कर रहे हैं। वह उन सैकड़ों कर्मचारियों में से एक हैं, जो उद्यमी बन गए थे। लेकिन उन्हें फिर से नौकरी करने के लिए मजबूर होना पड़ा क्योंकि वे नोटबंदी और उसके बाद वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का दबाव नहीं झेल पाए और उन्होंने अपनी फैक्टरियां बंद करने का फैसला किया। 

 
तिरुपुर के कदरपेट्टई बाजार में भी हालात कुछ अलग नहीं हैं। इस बाजार में उन कपड़ों की बिक्री होती है, जो निर्यात बाजार से वापस लौट आते हैं। ये निर्यात के लिए तैयार किए जाने वाले ब्रांडेड सूती कपड़े होते हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में नहीं बिक पाने के कारण इन्हें घरेलू बाजार में बेचा जाता है।  पिछले साल 8 नवंबर को नोटबंदी से पहले इस बाजार में 1,200 से अधिक इकाइयां और अन्य जॉब वर्क यूनिट 15,000 करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार कर रही थीं। आज उनका कहना है कि अब 40 फीसदी भी कारोबार नहीं बचा है। 
 
कपड़ा उद्योग
 
चेन्नई के दक्षिण में 450 किलोमीटर दूर छोटा सा कस्बा तिरुपुर निटवियर उद्योग का गढ़ है। यहां निर्यातकों, व्यापारी निर्यातकों (जो निर्यातकों से ठेके लेते हैं) और घरेलूू आपूर्तिकर्ताओं की इकाइयां हैं। निर्यात 26,000 करोड़ रुपये का उद्योग है और यह मुख्य रूप से नकद रहित है। लेकिन नोटबंदी का इस कारोबार पर भी असर पड़ा है क्योंकि उन्हें बुआई, बटन लगाने, छोटे-मोटे काम, प्रिटिंग और पैकेजिंग जैसे जॉब वर्क के लिए व्यापारी निर्यातकों को छोटे ठेकों का नकद भुगतान करना होता है। खुद व्यापारी निर्यातक छोटी इकाइयां हैं, जिन्हें अपने कर्मचारियों को नकद में भुगतान करना होता है। तिरुपुर एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन का अनुमान है कि घरेलू इकाइयां 7,000 करोड़ रुपये का बहीखातों में दर्ज होने वाला लेनदेन करती हैं। इतना ही लेनदेन नकद में होता है, जिसका मुख्यतया कोई ब्योरा नहीं रखा जाता है। दूसरी ओर असंगठित इकाइयां नकद में कारोबार करती हैं और उनका कारोबार करीब 15,000 करोड़ रुपये का होने का अनुमान है। 
 
पहले और आज 
 
पिछले साल नोटबंदी की घोषणा से एक महीने पहले अक्टूबर में तिरुपुर त्योहारी ऑर्डर पूरे करने में व्यस्त था। खाडेरपेट्टई की संकरी सड़कों पर ग्राहकों की भारी भीड़ थी। आज सड़कें वीरान हैं और हर  जगह सुनसान जगह की तरह नजर आती है। बाजार में ग्राहक बहुत कम आ रहे हैं, इसलिए दुकानदार आपस में बातचीत कर समय बिताते हैं। लिमरा गारमेंट्स के मालिक मोहम्मद इमायिल एक ऐसे ही दुकानदार हैं। वह कहते हैं कि नोटबंदी और जीएसटी का असर बरकरार है। इस बाजार के ज्यादातर खरीदार देशभर में सड़कों के किनारे सामान बेचने वाले दुकानदार हैं। वह कहते हैं कि कारोबार 60 फीसदी घट गया है। इससे वह कर्मचाारियों को वेतन देने की हालत में नहीं हैं, जिससे उन्होंने कर्मचारियों की संख्या 15 से घटाकर 4 कर दी है। 
 
एसकेएम टेक्स के मालिक और कदरपेट एसोसिएशन में एक पदाधिकारी एम जी कुमार  भी इमायिल की बात से सहमत हैं। उन्होंने कहा कि पिछले 6 महीनों में 300 से अधिक दुकानें बंद हो गई हैं। साउथ इंडिया कॉलर शट्र्स ऐंड इनर वियर स्मॉल स्केल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (सिस्मा) के महासचिव के एस बाबूजी ने कहा कि 2,000 इकाइयों (सभी सिस्मा की सदस्य) में से 30 से 40 फीसदी बंद हो गई हैं। वे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 60,000 से 80,000 लोगों को रोजगार दे रही थीं। अकेला तिरुपुर क्लस्टर ही 6 लाख से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार देता है। 
 
सबसे रोचक बात यह है कि यहां कोई भी नोटबंदी या जीएसटी के खिलाफ नहीं हैं। वास्तविकता तो यह है कि बाबूजी जैसे लोगों ने भारतीय जनता पार्टी के लिए प्रचार किया था ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात में अपनी सफलता को पूरे देश में दोहरा सकें। सभी का कहना है कि क्रियान्वयन में गड़बड़ी रही। जयावेल टेक्सटाइल्स के ए सुंदरम ने कहा कि कारोबारियों के लिए निवेश एक बड़ी चिंता है। इसके अलावा ग्राहक भी पैसा खर्च नहीं करना चाहते हैं। 
 
यहां की एक इकाई के मालिक एस राजेंद्रन ने कहा कि पिछली दीवाली के मुकाबले इस बार ऑर्डर 30 फीसदी कम आए और पहली बार बच्चों के परिधान के खंड में बिक्री 25 फीसदी कम रही। तिरुपुर में नकद कारोबार होता है, इसलिए यह बुरी तरह प्रभावित हुआ।  अगर कामगारों को समय पर मेहनताना नहीं दिया जाता तो वे अगले सप्ताह काम पर नहीं लौटते हैं। उदाहरण के लिए बाबूजी ने कहा कि कामगारों को बोनस का भुगतान करना पड़ता है। कामगाारों और उनकी यूनियनों ने इस बात पर जोर दिया है कि उन्हें बोनस का भुगतान नकद में किया जाए, जबकि नियम इसकी मंजूरी नहीं देते हैं। 
 
इमायिल की फैक्टरी में काम करने वाले एस मुरुगनंदम ने कहा कि उनका मालिक पूरे वेतन का भुगतान नहीं कर सकता क्योंकि ऑर्डरों की आवक में भारी गिरावट आई है। किसान से दिहाड़ी मजदूर बने मुरुगनंदम ने कहा कि उनके पास यह काम करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है क्योंकि वह और कोई काम, विशेष रूप से खेती का काम नहीं कर सकते। उनके जैसे अन्य कामगारों को भी फैक्टरी मालिक उनकी बुनियादी जरूरतों जितना ही भुगतान कर रहे हैं। अगर यही स्थिति आगे भी बनी रही तो उनके पास चेन्नई या अन्य किसी शहर में जाने के अलावा और कोई चारा नहीं होगा। पहले ही उनमें से बहुत से पास के कस्बों और जिलों में निर्माण उद्योग में काम करना शुरू कर चुके हैं। इसके अलावा बहुत से कामगार प्रवासी हैं, इसलिए उनके बैंक खाते खुलवाना भी एक बड़ी दिक्कत है। 
 
छोटे उद्यम की चाहत 
 
छोटे उद्यमों के मालिकों ने कहा कि जीएसटी की दर में कटौती, कारोबार को आसान बनाने और बैंक ऋण उपलब्ध कराने से उद्योग पटरी पर लौट आएगा। यह तमिलनाडुु और पड़ोसी राज्यों के 8 लाख से अधिक लोगों के लिए जीविका का साधन है। इनमें उत्तर-पूर्व के 1 लाख प्रवासी कामगार भी शामिल हैं। 
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