बिजनेस स्टैंडर्ड - लुधियाना: दोहरी मार से अभी भी वस्त्र उद्योग तार-तार
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लुधियाना: दोहरी मार से अभी भी वस्त्र उद्योग तार-तार

अरुप रॉयचौधरी /  November 05, 2017

उत्तर भारत में होजरी एवं रेडीमेड कपड़ों के सबसे बड़े केंद्र लुधियाना में धुंध से भरा आसमान ठंड की दस्तक देने लगा है। आम तौर पर इस शहर में कारोबारी गतिविधियां अक्टूबर-फरवरी की अवधि में ही अपने पूरे शबाब पर होती हैं। लेकिन इस बार हालात कुछ अलग रह सकते हैं। स्थानीय कारोबारियों और विनिर्माताओं को लग रहा है कि इस बार की सर्दियों में उनका कारोबार ठंडा ही रहेगा। उनकी इस आशंका के पीछे नोटबंदी के बाद के प्रभावों और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के क्रियान्वयन से उपजे हालात हैं। बिज़नेस स्टैंडर्ड ने कपड़ा एवं होजरी उद्योग की आपूर्ति शृंखला से जुड़े कई कारोबारियों से बात की तो उनके मन में आशंकाओं के बादल घुमड़ते हुए नजर आए। परंपरागत तौर पर इस उद्योग की गतिविधियां नकदी पर आधारित रही हैं लेकिन नोटबंदी के समय इस आधार को तगड़ा झटका लगा था। हालात यह हैं कि अभी तक मांग नोटबंदी के पहले के स्तर पर नहीं पहुंच पाई है। इस उद्योग में काम कर रहे लोगों की बड़े पैमाने पर छंटनी की जा चुकी है लेकिन छोटे स्तर की विनिर्माण इकाइयों को नाममात्र के मार्जिन पर ही काम करना पड़ रहा है। उनके पास कार्यशील पूंजी की कमी है जिससे उनका कारोबार भी धीमा पड़ रहा है।

 
अपनी वस्त्र निर्माण फैक्ट्री के भीतर शीशे के केबिन में बैठे हरिंदर पाल सिंह को भी यही चिंता सता रही है। स्वेटशर्ट एवं टीशर्ट बनाने वाली कंपनी पूनम टेक्सटाइल्स के मालिक हरिंदर कपड़ा उद्योग पर नोटबंदी एवं जीएसटी के असर की बात पूछते ही गंभीर हो गए। उन्होंने कहा, 'वर्ष 2015-16 में मेरा कुल कारोबार 11 करोड़ रुपये रहा था लेकिन पिछले साल नोटबंदी के चलते यह घटकर 8 करोड़ रुपये पर आ गया। हालांकि हम थोड़ा संभल गए हैं लेकिन इस सर्दी में भी कारोबार कुछ खास नहीं रहेगा। छोटी इकाइयों की हालत तो और भी खराब है।' हरिंदर की यह हालत तब है जब वह बाजार में सप्लाई करने के अलावा खुद अपने स्टोर से भी बिक्री करते हैं। उनके लुधियाना में दो, दिल्ली में तीन और देहरादून में एक स्टोर हैं। लेकिन अब वह मांग नहीं होने से दिल्ली का अपना कारोबार समेटना चाहते हैं। हरिंदर कहते हैं, 'नवंबर के अंत तक हम दिल्ली के अपने तीनों स्टोर बंद कर देंगे। हम आपूर्तिकर्ताओं और बिचौलियों की भूमिका को कम कर अपना मार्जिन बढ़ाने की कोशिश में लगे थे और इसीलिए हमने ये स्टोर भी खोले थे। लेकिन नोटबंदी और फिर जीएसटी के बाद हम कारोबार बढ़ाने के बारे में सोच भी नहीं रहे हैं। विस्तार कर पाना तो अब नामुमकिन हो चुका है।'
 
हमारी बातचीत के दौरान ही उनके कारखाने में काम करने वाला एक आदमी उनके दफ्तर में दाखिल होता है और उन्हें कोई काम नहीं होने की बात बताता है। इस पर हरिंदर कहते हैं, 'कोई बात नहीं बेटा। दो दिन रुक जा, नया ऑर्डर आ सकता है।'  हमारे साथ बातचीत में वह यह मानते हैं कि व्यापक तौर पर नकदी पर आधारित कपड़ा उद्योग की नोटबंदी ने कमर ही तोड़ दी है। वह कहते हैं, 'देखिए, एक ग्राहक कपड़ों के लिए आम तौर पर नकदी में ही भुगतान करता है। वह नकदी खुदरा कारोबारी से होते हुए सप्लायर और थोक विक्रेता और फिर उत्पादक तक पहुंचती है। जब बाजार में नकदी ही नहीं होगी तो फिर पूरी आपूर्ति शृंखला ही सिमट जाएगी। असर अब भी नजर आते हैं।' 
 
हरिंदर का कहना है कि नोटबंदी के पहले भी उनके सारे लेनदेन चेक या ऑनलाइन बैंकिंग के ही माध्यम से होते थे। लेकिन खुदरा विक्रेताओं और आपूर्तिकर्ताओं को यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं होती है कि भारी मात्रा में नकदी का इस्तेमाल करने से उन्हें दो बहीखाते रखने पड़ते हैं जिनमें से एक को ही वे कर विभाग की नजर में लाते हैं। लेकिन ये विक्रेता खुलकर सामने आने को तैयार नहीं होते हैं। एक खुदरा विक्रेता ने अपना नाम सामने न आने की शर्त पर कहा, 'पहले खुदरा कारोबारियों को अपना सारा लेनदेन और रसीदों का ब्योरा रखना जरूरी नहीं होता था। लेकिन नोटबंदी और जीएसटी के बाद हालात बदल गए हैं। कारोबार करने के लिए जीएसटी नंबर लेना अब जरूरी हो गया है। लेकिन कई छोटी इकाइयां जीएसटी के दायरे में नहीं आती हैं। उन सबके पास तो पैन नंबर भी नहीं हैं। उनमें से कई इकाइयों के पास कोई काम ही नहीं आ रहा है क्योंकि बड़े कारोबारी उनके साथ लेनदेन ही नहीं कर रहे हैं।' अक्टूबर-फरवरी का समय सर्दियों का होता है और इसी दौरान शादी-ब्याह भी खूब होते हैं। लेकिन अभी तक मांग में कोई खास तेजी नहीं दिख रही है। एक कारोबारी का कहना है कि लुधियाना के कारखानों में काम करने वाले अधिकतर मजदूर उत्तर प्रदेश और बिहार के हैं लेकिन मांग कम रहने की सूरत में उनकी संख्या में कटौती करनी पड़ सकती है।
 
एक अनुमान के मुताबिक भारत में रेडीमेड कपड़ा उद्योग का आकार करीब 25,000-30,000 करोड़ रुपये का है। उसमें से 10-15 फीसदी हिस्सा ऊनी कपड़ों का है और लुधियाना इसका सबसे बड़ा गढ़ है। पूरे देश में तैयार होने वाले ऊनी कपड़ों का 90 फीसदी कारोबार लुधियाना से ही होता है। सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग मंत्रालय की वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक लुधियाना के कपड़ा कारखानों में 1.06 लाख लोग काम करते हैं। लेकिन पिछले एक वर्षों में इनकी संख्या में कटौती हुई है। हालांकि रोजगार गंवाने वाले लोगों की सही संख्या का अंदाजा नहीं लग पाया है। धनवान लोगों से भरपूर इस चमक-दमक वाले शहर में हरेक दूसरी कार उन्नत रूप में नजर आती है। बाहर से खरीदे गए उपकरण लगाकर इन कारों को नया रंग-रूप देने की कोशिश की जाती है। यहां तक कि मारुति आल्टो जैसी छोटी कार को भी लोग मोटे टायरों और क्रोम अलॉय व्हील से लैस कर देते हैं। यहां के लोग दबी-छिपी जुबान में यह मानते हैं कि उनके पास काफी अघोषित संपत्ति है। हरिंदर सिंह भी इसकी तस्दीक करते हैं। वह बताते हैं कि नोटबंदी के ऐलान के शुरुआती दिनों में कंपनियों को ढेरों नए ऑर्डर मिलेे थे और उसके लिए नकद भुगतान भी किए गए। इसके अलावा कारखानों के मालिक अपने कर्मचारियों को तीन-चार महीनों का वेतन एडवांस में दे रहे थे।
 
सिलाई मशीन के कल-पुर्जे बनाने वाली कंपनी पंजाब मेटल फेब्रिकेटर्स के कर्ताधर्ता उप्पल बंधु भी नोटबंदी के समय नकदी की अधिकता का जिक्र करते हैं। राजिंदर उप्पल कहते हैं, 'उस समय नकदी की भरमार थी। कभी भी समय पर भुगतान नहीं करने वाले ग्राहक भी नकद भुगतान कर रहे थे। यहां तक कि एडवांस ऑर्डर भी खूब मिल रहे थे। लेकिन बैंकों से नए नोट बांटने में दिक्कत होने के बाद नकदी की किल्लत होने लगी। नोटबंदी और जीएसटी लागू करने के पीछे सरकार की मंशा को लेकर हमें कोई संदेह नहीं है। लेकिन इन कदमों को गलत तरीके से लागू करने से हमारी मुश्किलें बढ़ गईं।'
Keyword: demonetization, note, rupee, ludhiyana,,
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