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पाकिस्तान में भारतीय उच्चायुक्त के लिए सही चयन हैं बिसारिया

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  November 03, 2017

वर्ष 2001 के जुलाई महीने की बात है। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पाकिस्तानी राष्ट्राध्यक्ष परवेज मुशर्रफ के बीच आगरा में बातचीत चल रही थी। अगर यह वार्ता सफल हो जाती तो शायद पूरी तस्वीर ही बदल जाती। बहरहाल, माहौल में एक किस्म की व्याकुलता थी। किसी तरह की कोई खबर बाहर नहीं आ रही थी और इस बातचीत के बारे में विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता निरुपमा राव के कोई जानकारी देने से मना करने पर पाकिस्तानी पत्रकारों ने उन पर लगभग हमला ही कर दिया था। तभी अचानक एक समस्या आन पड़ी। संपादकों के साथ सुबह के नाश्ते पर एक मुलाकात के दौरान मुशर्रफ ने कश्मीर मुद्दे पर भारत के कड़े रुख पर हमला बोल दिया। जबकि ठीक एक दिन पहले तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा था कि सीमा पार आतंकवाद समेत तमाम विषयों पर चर्चा होगी लेकिन उन्होंने कश्मीर का उल्लेख नहीं किया था। शायद मुशर्रफ इस बात से चिढ़े हुए थे और इसीलिए उन्होंने कश्मीर का बेधड़क जिक्र किया। 

 
एक दिन पहले वाजपेयी और उनकी टीम को मुशर्रफ के सुर अलग लगे थे। दोनों नेताओं ने दूसरे दिन अपनी बातचीत शुरू की। प्रधानमंत्री के निजी सचिव अजय बिसारिया कुछ कागजात के साथ अंदर आए और उन्हें प्रधानमंत्री को सौंप दिया। यह मुशर्रफ की उन बातों का लिखित ब्योरा था जो उन्होंने कुछ घंटे पहले संपादकों के साथ नाश्ते पर कही थीं। पीटीवी ने इस बातचीत का सीधा प्रसारण किया था। एनडीटीवी और पीटीवी के बीच हुए समझौते की बदौलत वह पूरा प्रसारण एनडीटीवी पर भी हुआ। वाजपेयी को वह सब सबसे आखिर में पता चला जो पूरी दुनिया कुछ घंटे पहले जान चुकी थी। वाजपेयी ने मुशर्रफ से सवाल किए। उन्होंने कहा कि आतंकवाद को बढ़ावा देना, कश्मीरी जिहादियों की तुलना पूर्वी पाकिस्तान की मुक्ति वाहिनी से करना न केवल ऐतिहासिक रूप से गलत है बल्कि पूरी तरह अस्वीकार्य भी है। वाजपेयी ने कहा कि अगर मुशर्रफ ऐसे विचार रखते हैं तो बातचीत को तुरत खत्म किया जा सकता है। मुशर्रफ पर इन बातों का कोई फर्क नहीं पड़ा और उन्होंने उत्तर दिया कि ये उनके सार्वजनिक विचार हैं। कई वर्ष बाद तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा था, 'संपादकों की बैठक के बाद जो कुछ हुआ वह एक निरर्थक कवायद भर थी।' बिसारिया इस पूरे प्रकरण के अहम मूकदर्शक थे।
 
बिसारिया ने पाकिस्तान के लिए जो राह पकड़ी है वह काफी लंबी और घुमावदार है। वह पोलैंड के राजदूत पद से मुक्त कर पाकिस्तान के उच्चायुक्त बनाए गए हैं। वह पोलैंड में राजदूत इसलिए थे क्योंकि वह पूर्वी यूरोप के समाजवादी खेमे की समझ रखते हैं। उन्हें रूसी भाषा में दक्षता हासिल है। वह सन 1988 से 1991 के बीच मॉस्को में पदस्थ थे और सोवियत संघ के विभाजन के साक्षी रहे। वह विदेश मंत्रालय में पूर्वी यूरोप से जुड़े काम देखते थे। 
 
बिसारिया अच्छे हास्यबोध वाले पेशेवर व्यक्ति हैं। जब वारसा में पदस्थ थे तो अतुल्य भारत के पर्यटन अभियान में बर्फ से ढकी एक पहाड़ी का चित्र प्रस्तुत किया गया था जिसमें एक विदेशी महिला (शायद पोलिश महिला) योगासन की मुद्रा में थी, मानो पर्वत शृंखला को सम्मान दे रही हो। इंटरनेट पर डाले गए इस पोस्टर के सामने बिसारिया और अमिताभ कांत खड़े थे। समस्या क्या थी? चित्रित पहाड़ था नेपाल स्थित अन्नपूर्णा और योग का यह दृश्य कास्की नेपाल का था। एक सचेत नेपाली पर्यटक ने इस तस्वीर को पोस्ट कर दिया और नेपाल में भारत की उसे उपनिवेश बनाने की कोशिशों पर शोर-शराबा शुरू हो गया। बिसारिया ने बिना समय गंवाए इस 'ईमानदार चूक' के लिए माफी मांग ली। 
 
जब वह पहली बार प्रधानमंत्री कार्यालय आए तो वह भाजपा नेताओं से ज्यादा सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं को जानते थे। उन्होंने भाजपा के तमाम वरिष्ठï नेताओं की सूची अपने अपने पास रखनी शुरू की। उनकी टेबल पर कांच के नीचे नेताओं की तस्वीर और उनके नाम होते थे। ऐसा इसलिए ताकि वे उनको सही पहचान सकें। वह और प्रधानमंत्री के मुख्य सचिव ब्रजेश मिश्र के बीच बहुत अच्छे ताल्लुकात थे। प्रधानमंत्री कार्यालय में तमाम मेल आते थे और ऐसा ही सुझाव मंगल पर अभियान भेजने को लेकर दिया गया। मिश्रा ने इस पत्र को बिसारिया को भेज दिया और साथ में लिखा कि विदेश मंत्रालय शायद इस सुझाव पर विचार करे।
 
बिसारिया ऐसे समय पर पाकिस्तान जा रहे हैं जबकि वहां आंतरिक उथल-पुथल का माहौल है। अगले साल वहां चुनाव होने हैं और पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) पर कमान की लड़ाई एकदम खुलकर सामने आ गई है। अगर इस्लामाबाद की फिजाओं में तैर रही अफवाहों पर ध्यान दिया जाए तो शाहबाज शरीफ पाकिस्तान के अगले प्रधानमंत्री हो सकते हैं, भले ही उन्हें चुनाव लडऩे के नाकाबिल घोषित कर दिया गया है। पाकिस्तान उसी हालात का शिकार हो सकता है जिसमें भारत 2004 से 2013 के बीच था। यानी देश के सबसे ताकतवर संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति यानी प्रधानमंत्री पर अन्य राजनीतिक ताकतों का दबाव। बिसारिया एक ऐसे व्यक्ति हैं जो इस हालत से निपट सकते हैं। 
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