बिजनेस स्टैंडर्ड - बतौर राजनेता प्रधानमंत्री मोदी की दुविधा
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बतौर राजनेता प्रधानमंत्री मोदी की दुविधा

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  November 03, 2017

जोसेफ हेलर के प्रसिद्घ उपन्यास कैच-22 में लेफ्टिनेंट मिलो माइंडबेंडर का चरित्र खुद से कारोबार करके ख्याति अर्जित करता है। वह कुछ ऐसे कारोबार करता है कि लेनदेन के क्रम में शामिल हर व्यक्ति को मुनाफा होता है जो अंतत: सरकार की जेब से आता है। वह निंदित पूंजीवाद का ब्रांड ऐंबेसडर इसलिए बन गया क्योंकि उसके लिए अपनी कंपनी (सिंडिकेट) के लाभ के अलावा कोई चीज मायने नहीं रखती थी। वह हमेशा मुनाफा कमाता। वह अक्सर गांव के सारे अंडे और टमाटर खरीद लेता और फिर अपनी सैन्य टुकड़ी में उनको मनमाने दाम पर बेचता। 

 
एक बार उसने दुनिया भर में मौजूद मिस्र के कपास का पूरा भंडार खरीद लिया। इसके बाद कोई खरीदार ही नहीं रह गया और अगर किसी ने उससे इसे खरीदा भी तो वापस उसे ही बेच दिया। उसने इन कपास के गठ्ठïों को चॉकलेट में डुबाकर अपने साथी जवानों की मेस में बेचने की भी कोशिश की लेकिन नाकाम रहा। उसने एकाधिकारवादी खरीदार और विक्रेता बनकर मिस्र की कपास का पूरा बाजार समाप्त कर दिया। 
 
आखिर में उसने एक रास्ता निकाला और सोचा कि इसे सरकार को क्यों न बेच दिया जाए? बतौर एक पक्का पूंजीवादी वह भी मानता था कि कारोबारी जगत में सरकार का भला क्या दखल? परंतु अपनी उक्तियों के लिए मशहूर और मुक्त बाजार समर्थक पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति केल्विन कॉलिज की व्यंग्य में कही एक बात उसके बचाव के लिए सामने थी। उन्होंने कहा था, 'कारोबार में शिरकत सरकार का काम है।' मिलो के मुताबिक राष्ट्रपति ने जो कहा सच ही कहा होगा। सरकार का काम ही है कारोबार तो भला कपास को अमेरिकी सरकार को क्यों न बेच दिया जाए? 
 
अब मिलो माइंडबेंडर की जगह सन 1969 के बाद हमारे देश की सरकार को रखकर देखते हैं और भारतीय बैंकों की जगह मिस्र की कपास। आप कैच-22 को यहां घटित होते हुए देख सकते हैं। सबसे पहले इंदिरा गांधी ने सभी बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया और बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र में राज्य का स्वामित्व शुरू किया। सभी बीमा कंपनियां और विकास से जुड़े वित्तीय संस्थान सरकारी थे। इसके बाद उसने खुद से खरीदारी शुरू की। यानी बैंकों से अपने बॉन्ड में निवेश कराना, अपनी परियोजनाओं और सरकारी उद्यमों को कर्ज दिलवाना आदि। बाद में ऐसे अनेक मामलों में कर्ज माफी भी की गई। बैंकिंग पर एकाधिकार सरकार के लिए वोट दिलाने का बंदोबस्त तक बन गया। इस प्रक्रिया में बैंक नियमित अंतराल पर दिवालिया होने लगे। 
 
चूंकि बैंक सरकारी हैं इसलिए उनको नाकाम नहीं होने दिया जा सकता है और सरकार किसी भी हालात में विफल हो नहीं सकती। उसके पास कर लगाने और नकदी छापने का अधिकार है। यही वजह है कि सरकार बैंकों का बार-बार पूंजीकरण करती है और अगर राजकोष की स्थिति बेहतर दिखाने के लिए यह काम बजट से इतर तरीके से किया जाना है तो बैंकों द्वारा बॉन्ड जारी किए जाते हैं। बहरहाल, क्या यह सब करती हुई हमारी सरकार लेफ्टिनेंट मिलो माइंडबेंडर से कहीं अधिक पूंजीवादी नहीं दिखती। वास्तव में ऐसा है। अगर उसका अर्थशास्त्र कैच-22 था तो हमारा कैच-23 है।
 
हो सकता है आपको लगे कि मैं यहां तो कैच-23 जैसे व्यंग्य का इस्तेमाल कर रहा हूं जबकि हाल ही में मैंने सरकार के बैंकों को उबारने के पैकेज की तारीफ की है। मैं बता दूं कि यह एक अच्छी योजना है क्योंकि मौजूदा हालात में यही संभव था। अगर आपका मरीज दमे के दौरे के कारण घुट रहा है और आप चिकित्सक हैं तो आप उसके शरीर में स्टेरॉयड्स ही डालेंगे, भले ही इसके दुष्प्रभाव होते हों। 
 
ऐसे हालात में जहां 70 फीसदी बैंक सरकारी हैं और जिनका फंसा हुआ कर्ज कुल पूंजी से ज्यादा हो रहा हो, वहां आप क्या करेंगे? ऐसे हालात में जहां कुछ करना आवश्यक हो। यह पैकेज निर्णायक, साहसी और एक हद तक रचनात्मक भी है। फंड जुटाने के लिए बॉन्ड जारी करने का विचार अच्छा है लेकिन यह विचार परेशान करने वाला है कि एक बार फिर किसी समृद्घ सरकारी उपक्रम को इन्हें खरीदने को कहा जाएगा। इससे कहीं बेहतर, निर्णायक और सुधारवादी विकल्प मौजूद थे। बड़े नेता कभी संकट को जाया नहीं जाने देते परंतु नरेंद्र मोदी ने एक अवसर गंवा दिया। हम इतने भी अतार्किक नहीं हैं कि उनसे इंदिरा गांधी की सबसे बुरी राजनीतिक विरासत यानी बैंकों के राष्ट्रीयकरण को पूरी तरह समाप्त करने को कहें। परंतु वह दो सबसे कमजोर और छोटे सरकारी बैंकों के निजीकरण के साथ एक शुरुआत कर सकते थे। इसके बाद कह सकते थे कि अगले 10 सालों तक हर वर्ष सबसे कमजोर बही खाते वाले सरकारी बैंक को बेचा जाएगा। इससे बाजार पर असर होता। अन्य बैंक बेहतर प्रदर्शन की कोशिश करते, वोट हासिल करने के लिए जनता का पैसा खर्च करने की राजनीतिक वर्ग की प्रवृत्ति पर लगाम लगती और मोदी का नाम बड़े सुधारकों में  शुमार हो जाता। 
 
परंतु क्या मोदी वाकई चाहते हैं कि उनको आर्थिक सुधारक के रूप में याद किया जाए? सरकारी उपक्रमों के प्रति प्रतिबद्घता अथवा सरकार का कारोबारी हस्तक्षेप ही किसी सुधारक के लिए एकमात्र कसौटी नहीं हो सकता। हां यह एक अहम पहलू अवश्य है। कोई भारतीय नेता, यहां तक कि मनमोहन सिंह और पी वी नरसिंह राव और पी चिदंबरम तक ने सरकारी उपक्रमों को बेचने का साहस नहीं दिखाया। खासतौर पर फायदे में चलने वाले उपक्रमों को बेचने का। यह प्रतिबद्घता केवल अटल बिहारी वाजपेयी ने दिखाई थी। वह सन 1970 की राजनीतिक अर्थव्यवस्था में निहित सर्वोच्च न्यायालय के एक आदेश से निराश थे। उस आदेश के जरिये ऊपरी अदालत ने कहा था कि बिना संसदीय मंजूरी के विनिवेश नहीं किया जा सकता। इस क्रम में उसने तेल क्षेत्र की दो दिग्गज कंपनियों एचपीसीएल और बीपीसीएल की बिक्री रोक दी थी। उम्मीद थी कि मोदी अपनी पार्टी के आदर्श नेता रहे पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी की राह पर चलेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वह एचपीसीएल को बेच भी रहे हैं तो किसे, एक अन्य सरकारी कंपनी ओएनजीसी को। यानी वही मिलो अर्थशास्त्र, अपने ही पैसे से अपनी ही चीज खरीदना। कैच-23 का उदाहरण। नरेंद्र मोदी के समर्थकों के पास एक तर्क है कि सन 1991 के बाद की अवधि में जब ज्यादातर सुधार चोरी-चुपके हो सके, आज सबकुछ जनता की नजर के सामने है और उसकी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ सकती है। लेकिन जनता का मिजाज बदलने के लिए मोदी से बेहतर स्थिति में कौन है? ऐसे में सवल यह है कि वह ऐसा क्यों नहीं कर रहे हैं? क्या वह वाकई करना चाहते हैं? अगर नहीं तो फिर वह चाहते क्या हैं?
 
इसका जवाब उनकी राजनीति में निहित है। वाजपेयी के उलट वह एक प्रतिबद्घ स्वयंसेवक हैं। इसके अलावा वाजपेयी जहां आरएसएस की पुरानी सामाजिक-आर्थिक की अपरिपक्वता पर हंसते, वहीं मोदी उस पर पूरा यकीन करते हैं। वह मोहन भागवत जैसे स्वयंसेवक भी होना चाहते हैं और वाजपेयी जैसे आधुनिक सुधारक के रूप में भी याद किया जाना चाहते हैं। इस दौरान वह एक और इंदिरा गांधी के रूप में सामने आ पा रहे हैं जो केंद्रीकृत सत्ता में यकीन रखती थीं। एक बड़ा आर्थिक राष्ट्रवादी जो एक विस्तारवादी और नियंत्रणवादी सरकार चला रहा है। मैं उनके राजनीतिक-आर्थिक मस्तिष्क को कुछ इस तरह पढऩा चाहूंगा कि राज्य द्वारा अर्थव्यवस्था चलाने में कुछ भी गलत नहीं है, बशर्ते कि आप राज्य शासन समझदारीपूर्वक और ईमानदारी से चलाएं। संपूर्ण राज्य की तलाश कभी पूरी नहीं हुई। ऐसा संभव नहीं दिखता।
 
मोदी ने अपनी युवावस्था और मध्य वय पूर्णकालिक स्वयंसेवक के रूप में बिताई है और उनकी रूढि़वादी बनावट रातोरात दूर नहीं होगी। परंतु अब वह वैश्विक नेताओं से मिल रहे हैं और कहीं ज्यादा सफल अर्थव्यवस्थाओं और समाजों को देख रहे हैं तो उनके मन में भी यह इच्छा होगी कि वह नवउदारवादी विचार को अपनाएं। सामाजिक-धार्मिक रूढि़वादिता और नवउदारवाद की ये दोनों ताकतें पूरी तरह विरोधाभासी हैं और एक साथ नहीं रह सकतीं। यही वह राजनीति है जहां मोदी का अर्थशास्त्र उलझ जाता है। इस दुविधा को क्या नाम दिया जाए? मेरा सुझाव है कि इसे कैच-24 राजनीति कहा जाए।
Keyword: narendra modi, development, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,
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