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ताजा आर्थिक कदम कहीं यशवंत की बातों का तो असर नहीं

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  November 02, 2017

पिछले चार हफ्तों में केंद्र सरकार आर्थिक नीतियों के मोर्चे पर अपनी सक्रियता बढ़ाती हुई नजर आई है। इस दौरान सरकार की तरफ से आर्थिक नीतियों से संबंधित चिंताओं को दूर करने के लिए उठाए गए कुछ कदमों पर गौर करें तो यह बात अधिक स्पष्ट रूप से दिखेगी। मोटे तौर पर केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने इस अवधि में तीन तरह के कदम उठाए हैं। पहली श्रेणी में तेल कीमतों को काबू में रखने के लिए उठाए गए कदम हैं, दूसरी श्रेणी में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की खामियों को दूर करने वाले उपाय हैं जबकि तीसरी श्रेणी के उपाय सरकारी नियंत्रण वाले बैंकों की तनावग्रस्त परिसंपत्ति की समस्या को दूर करने और ढांचागत निवेश को प्रोत्साहन देने से जुड़े हुए हैं।

 
तेल कीमतों में बढ़ोतरी की समस्या सितंबर के मध्य में सतह पर आई थी। पेट्रोल एवं डीजल की कीमतें मई 2014 के स्तर पर पहुंच गई थीं जबकि तीन साल पहले की तुलना में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल के भाव करीब आधे हो चुके हैं। दबाव में आई सरकार को पेट्रोल एवं डीजल पर आयात शुल्क घटाने का ऐलान करना पड़ा। सरकार ने कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के समय उत्पाद शुल्क को बढ़ाकर सही ही किया था ताकि अतिरिक्त राजस्व जुटाया जा सके। लेकिन कच्चे तेल के भाव बढऩे पर उत्पाद शुल्क में कटौती करने का फैसला मुश्किल हो गया था क्योंकि इस तरह के कदम से सरकार को मिलने वाले राजस्व में कमी आती और उसका राजकोषीय घाटा भी बढ़ता। 
 
लेकिन उत्पाद शुल्क में कटौती की मांग होने के एक पखवाड़े बाद 3 अक्टूबर को सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद शुल्क में प्रति लीटर 2 रुपये की कटौती का ऐलान कर दिया। तत्काल प्रभाव से लागू इस फैसले से चालू वित्त वर्ष की शेष अवधि में 13,000 करोड़ रुपये की राजस्व क्षति होने का अनुमान है। यह एक मुश्किल फैसला था लेकिन इसने यह दिखाया कि सरकार बदले हुए हालात के मुताबिक कदम उठाने को तैयार है।
 
जीएसटी के नियमों में बदलाव के संकेत भी अक्टूबर के पहले हफ्ते में ही देखने को मिले थे। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 1 अक्टूबर को ही कहा था कि जीएसटी की वजह से सरकार को राजस्व प्रवाह तटस्थ स्थिति में पहुंचने पर कर संरचना में सुधार की स्थिति बन सकती है। उन्होंने जीएसटी की कर दरों में कटौती की भी संभावना जताई थी। इसके कुछ ही दिनों बाद हुई जीएसटी परिषद की बैठक में जीएसटी से संबंधित कारोबार जगत की कठिनाइयों को दूर करने के लिए कई उपायों की घोषणा की गई। निर्यातकों को बड़ी राहत देते हुए कहा गया कि कारोबारी निर्यातकों को निर्यात के मकसद से खरीदे गए सभी उत्पादों पर 0.1 फीसदी कम कर देना होगा। निर्यातकों से वसूले गए कर को समयबद्ध तरीके से रिफंड करने का भी फैसला उस बैठक में लिया गया।
 
इसके अलावा कंपोजिशन स्कीम के दायरे में आने वाली इकाइयों के सालाना कारोबार की सीमा को भी 75 लाख रुपये से बढ़ाकर 1 करोड़ रुपये कर दिया गया। इसके साथ 1.5 करोड़ रुपये तक के सालाना कारोबार वाली इकाइयों को मासिक के बजाय तिमाही आधार पर रिटर्न जमा करने की छूट भी दी गई। परिषद ने 27 उत्पादों पर लगने वाली जीएसटी दर को कम करने और वाहनों को लीज पर देने या टैक्सी किराये पर लेने जैसी सेवाओं पर लागू दर में भी रियायत देने का फैसला किया। ई-वे बिलों की व्यवस्था शुरू करने को लेकर कारोबारियों के तीखे विरोध को देखते हुए इसे अगले साल तक के लिए स्थगित कर दिया गया। खुद राजस्व सचिव हसमुख अढिया ने भी माना था कि जीएसटी में कुछ सुधारों की जरूरत है।
 
सरकार ने 24 अक्टूबर को सार्वजनिक बैंकों में 2.11 लाख करोड़ रुपये की पूंजी डालने का एक बड़ा ऐलान भी किया। इसमें 1.35 लाख करोड़ रुपये के पुनर्पूंजीकरण बॉन्ड जारी करने, बाजार से बैंकों को 58,000 करोड़ रुपये की इक्विटी जुटाने और 18,000 करोड़ रुपये सीधे केंद्र सरकार द्वारा डालने की बात कही गई है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों के चलते पेश आ रही पूंजी की कमी को दूर करने के लिए सरकार ने यह कदम उठाया है। उसी दिन सरकार ने देश के बड़े कस्बों और शहरों को जोडऩे के लिए सात लाख करोड़ रुपये का बड़ा निवेश करने की महत्त्वाकांक्षी सड़क योजना की भी घोषणा की।
 
हालांकि हमें यह ध्यान रखना होगा कि इनमें से कोई भी कदम पूरी तरह नया नहीं है। तेल कीमतों में कटौती, जीएसटी संबंधित मुद्दे और सार्वजनिक बैंकों की तरलता समस्या को दूर करने के लिए सरकार पहले भी कई कदम उठाती रही है। लेकिन इतना जरूर है कि इन कदमों और नीतिगत उपायों की दरकार लंबे समय से महसूस की जा रही थी। संभवत: यही वजह है कि सरकार की तरफ से उठाए गए इन सारे कदमों की व्याख्या सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा के उस चर्चित लेख के नतीजे के तौर पर की जा रही है जो उन्होंने 'इंडियन एक्सप्रेस' में लिखा था। सिन्हा ने 27 सितंबर को प्रकाशित अपने लेख में सरकार पर जरूरी आर्थिक कदम नहीं उठाने का आरोप लगाते हुए कहा था कि पेट्रोलियम कीमतों, जीएसटी क्रियान्वयन में आ रही दुश्वारियों और बैंकिंग क्षेत्र को पेश आ रही वित्तीय समस्याओं को दूर करने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए हैं।
 
सिन्हा के उस लेख के प्रकाशन के चार हफ्ते के ही अंदर सरकार ने उनकी तरफ से उठाए गए मसलों के समाधान के लिए कई कदम उठाए हैं। वैसे यह तर्क दिया जा सकता है कि सरकार तो अपने स्तर पर ही ये कदम उठाने की तैयारी कर रही थी। लेकिन ऐसा लगता है कि पार्टी के मार्गदर्शक मंडल में शामिल सदस्य की तरफ से हुई आलोचना ने इन कदमों के तीव्र क्रियान्वयन में अपनी भूमिका जरूर निभाई है।
Keyword: india, economy, IIP, GST,,
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