बिजनेस स्टैंडर्ड - ऑनलाइन खबर देने के लिए भुगतान मॉडल कितना कारगर?
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Wednesday, November 22, 2017 04:50 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|
 
होम विशेष खबर

ऑनलाइन खबर देने के लिए भुगतान मॉडल कितना कारगर?

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  November 01, 2017

ऑनलाइन खबरों के लिए भुगतान किए जाने की क्या कोई उम्मीद है? खबरों को ऑनलाइन पढ़ रहे अधिकतर उपभोक्ताओं का मानना है कि मुफ्त सेवाएं देने वाली वेबसाइटों की बहुतायत को देखते हुए पैसे चुकाकर खबरें पढऩे का विचार बेतुका है। डिजिटल न्यूज रिपोर्ट के नतीजों से तो यही लगता है। ऑक्सफर्ड स्थित रॉयटर्स पत्रकारिता अध्ययन संस्थान (आरआईएसजे) की तरफ से जारी इस रिपोर्ट को 30 देशों के सर्वेक्षण के बाद तैयार किया गया है। हालांकि इस रिपोर्ट में एक अपवाद भी है।

 
अमेरिकी उपभोक्ताओं के बीच भुगतान वाली ऑनलाइन खबरें पढऩे की प्रवृत्ति में उछाल देखी गई है। वर्ष 2015 में आठ फीसदी अमेरिकी नागरिक भुगतान देकर ऑनलाइन खबरें पढ़ते थे लेकिन वर्ष 2016 में यह संख्या बढ़कर 16 फीसदी हो गई है। इसमें ऑनलाइन ग्राहक बनने के अलावा एकबारगी भुगतान करने वाले और दान देने वाले अमेरिकी भी शामिल हैं। भुगतान कर ऑनलाइन खबरें पढऩे की प्रवृत्ति में आई इस उछाल के लिए पिछले साल अमेरिका में हुए राष्ट्रपति चुनाव को जिम्मेदार बताया जा रहा है। राष्ट्रपति चुनाव लड़ रहे डॉनल्ड ट्रंप के प्रति उत्सुकता के चलते आई इस उछाल को 'ट्रंप बंप' भी कहा जाता है। 
 
'द न्यूयॉर्क टाइम्स' ने चुनाव के बाद के छह महीनों में करीब 5 लाख ऑनलाइन ग्राहक अपने साथ जोड़े जबकि 'द वॉल स्ट्रीट जर्नल' के ऑनलाइन पाठकों की संख्या में 2 लाख की बढ़ोतरी हुई। आरआईएसजे के फेलो रिचर्ड फ्लेचर ने इस रिपोर्ट के आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए कहा है कि ऑनलाइन ग्राहक बनने वाले लोगों में 18-24 साल की उम्र वाले युवाओं का अनुपात तेजी से बढ़ा है। वर्ष 2016 में युवा ग्राहकों की तादाद महज चार फीसदी थी लेकिन वर्ष 2017 में यह बढ़कर 18 फीसदी हो गई है। इस रिपोर्ट के मुताबिक ऑनलाइन ग्राहक बनने वाले अधिकतर लोग वामपंथी और युवा हैं जो अमेरिकी राष्ट्रपति और उनकी नीतियों को नियंत्रित रखने की मीडिया की पहल का समर्थन करते हैं। सर्वेक्षण में शामिल करीब 29 फीसदी अमेरिकियों ने कहा कि वे पत्रकारिता को धन मुहैया कराने के इरादे से ऑनलाइन ग्राहक बन रहे हैं। भारत में भी करीब दर्जन-भर समाचार संस्थान ऑनलाइन ग्राहक बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
 
द केन ऐट डिजिपब के सह-संस्थापक रोहिन धर्मकुमार ने पिछले महीने एक कार्यक्रम में कहा था, 'नई पीढ़ी के युवाओं को खबरें पढऩे के लिए भुगतान करने में कोई एतराज नहीं है। वे नेटफ्लिक्स या गाना जैसे प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने के लिए भुगतान करते ही हैं, लिहाजा उन्हें खबरों के लिए पैसे देने में कोई दिक्कत नहीं है।' पिछले साल शुरू हुआ द केन हरेक सुबह कारोबार जगत से जुड़ी एक मौलिक खबर अपने ग्राहकों को उपलब्ध कराता है। इसके एवज में वह सालाना 2,750 रुपये का शुल्क (कर अलग) लेता है और अभी तक करीब 20 हजार ग्राहक उसकी सेवाएं लेना शुरू कर चुके हैं। मई 2016 में शिवेंद्र गौड़ ने रॉकेट पोस्ट लाइव नाम से भुगतान वाली समाचार सेवा शुरू की थी। उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले में वह व्हाट्सऐप के जरिये स्थानीय खबरें मुहैया कराते हैं। करीब 14,000 लोग उनकी सेवा का इस्तेमाल कर रहे हैं और उनमें से 11,000 से अधिक लोग सालाना 100 रुपये की फीस भी देते हैं। 
 
द वायर वेबसाइट को भी ऑनलाइन पाठकों के साथ अंशदान भी मिल रहा है।  वह ऐसी खोजपरक खबरें और विश्लेषणात्मक रिपोर्ट देता है जो आम तौर पर समाचारपत्र और टीवी चैनल नहीं देते हैं। वायर ने वजूद में आने के दो साल के ही भीतर अनुदान और मदद के तौर पर सात करोड़ रुपये जुटा लिए हैं। वीसीसर्किल और बिज़नेस स्टैंडर्ड के अलावा भी कुछ अन्य समाचार संगठन अपने ऑनलाइन पाठकों को मुहैया कराने वाली सामग्री के बदले धनराशि लेते हैं। 
 
एनडीटीवी और एबीपी जैसे कुछ समाचार समूह ई-कॉमर्स की दिशा में भी पहल कर रहे हैं। लेकिन अभी तक विज्ञापन से मिलने वाला राजस्व ही भारत में 7,690 करोड़ रुपये के आकार वाले डिजिटल मीडिया बाजार को राह दिखाता रहा है। इस वजह से ऑनलाइन समाचार के लिए प्रतिकूल माहौल बनता है। इसकी वजह यह है कि बाकी दुनिया की तरह भारत में भी डिजिटल विज्ञापन के मद में होने वाले व्यय का बड़ा हिस्सा गूगल और फेसबुक के पास ही जाता है। इससे मौलिक खबरें लाने, उनके लेखन और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर प्रस्तुति में करोड़ों रुपये खर्च करने वाले प्रकाशकों के हिस्से में प्रति पाठक चंद पैसों का ही राजस्व आता है। अगर वे विज्ञापन वाली जगह की बिक्री सीधे तौर पर करते हैं तो हरेक एक हजार पाठकों के लिए खबर की दर 30-150 रुपये तक जा पाएगी। विज्ञापन की बेहतर दर हासिल करने के लिए कई समाचार संगठन मौलिक विज्ञापन का सहारा लेते हैं। 
 
समाचार वेबसाइट के लिए राजस्व जुटाने का यह सबसे बड़ा स्रोत है। यह देखने में काफी हद तक संपादकीय जैसा ही होता है। इसका मतलब है कि इस मौलिक विज्ञापन में संपादकीय जैसी शैली, फॉन्ट, भाषा और डिजाइन का इस्तेमाल किया जाता है। दिसंबर 2015 में अमेरिकी संघीय व्यापार आयोग ने ऐसे विज्ञापनों के संदर्भ में स्पष्ट दिशानिर्देश जारी किए थे ताकि आम पाठक भ्रम के शिकार न हों। भारत में भी भारतीय विज्ञापन मानक परिषद ने इसके बारे में  कुछ बुनियादी सिद्धांत निर्धारित किए हैं। लेकिन यह मुद्दा नैतिक रूप से संदिग्ध नजर आता है। ऐसी स्थिति में ऑनलाइन खबरें मुहैया कराने के एवज में भुगतान स्वीकार करना ही इकलौता रास्ता नजर आता है। 
 
सकाल मीडिया समूह के मुख्य कार्याधिकारी प्रदीप द्विवेदी का मानना है कि आने वाले पांच-सात वर्षों में तो डिजिटल राजस्व प्रिंट कारोबार से होने वाले नुकसान की भरपाई नहीं कर पाएगा, लिहाजा शुल्क देकर खबरें मुहैया कराना या वेबसाइट को ई-कॉमर्स के लायक बनाना ही विकल्प हो सकता है। ऐसे में भुगतान-आधारित ऑनलाइन खबरें देने वाले कुछ शुरुआती ब्रांड पर ही राजस्व की सही राह खोजने की जिम्मेदारी आ पड़ी है।
Keyword: media, reporting, online, news, payments,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 कर में छूट से बढ़ेंगे ऑनलाइन भुगतान?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS General News   Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.