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सुविधा न साधन, पेशेवर डिग्री बांटता कॉलेजों का प्रबंधन

अदालती आईना
एम जे एंटनी /  October 31, 2017

उच्चतम न्यायालय के कई निर्णयों में वर्णित उच्च संवैधानिक आदर्शों के बावजूद शिक्षा पिछले दशकों में धीरे-धीरे महज व्यावसायिक गतिविधि रह गई है। पेशेवर पाठ्यक्रमों के संचालक कॉलेजों में वसूली जाने वाली कैपिटेशन फीस पर लगाम लगाने के लिए शीर्ष अदालत ने मानदंड तय किए। लेकिन उन्हें नजरअंदाज करते हुए फीस बढ़ाई जाती रही जिससे पेशेवर शिक्षा आम छात्रों की पहुंच से बाहर हो गई है। इससे छात्रों में निराशा और आत्महत्या के मामले भी बढ़े हैं। हालत यह है कि अधिकांश निजी मेडिकल कॉलेजों में डिग्री कोर्स की फीस करीब 1 करोड़ रुपये हो गई है।
इसके चलते नेताओं और धनकुबेरों के संरक्षण में चलने वाले पेशेवर कॉलेजों की संख्या बढ़ती गई है। भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआई) के मुताबिक देश भर के कुल 477 मेडिकल कॉलेजों में से निजी प्रबंधन वाले कॉलेजों की संख्या सरकारी संस्थानों से अधिक है। हालांकि मेडिकल कॉलेजों की मान्यता देने के लिए इस नियामक संस्था ने नियम तय किए हुए हैं लेकिन निजी कॉलेजों की बढ़ती संख्या यह दर्शाती है कि इन मानकों का लगातार उल्लंघन हो रहा है। अधिकांश कॉलेजों में मेडिकल जैसी विशेषीकृत शिक्षा के लिए जरूरी ढांचा ही मौजूद नहीं है। फिर भी उन्हें अनुमति मिल जाती है और निर्धारित संख्या से अधिक छात्रों को प्रवेश दे दिया जाता है। छात्रों को अपने जोखिम पर प्रवेश देकर कॉलेज प्रबंधन अदालत जाकर अंतरिम राहत मांगते हैं ताकि उन्हें अगले शैक्षणिक सत्र से कमियों को दूर करने का मौका दे दिया जाए। अधिकांश मौकों पर इन कॉलेजों की अपील स्वीकार कर ली जाती है जबकि उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 2004 में ही उच्च न्यायालयों से कह दिया था कि वे अंतरिम आदेश पारित कर इन कॉलेजों को राहत न प्रदान करें। अब यह एमसीआई की बारी है कि वह दोयम दर्जे के कॉलेजों को राहत देने की मांग का अदालतों में विरोध करे।
अनियमितता होने से मेडिकल शिक्षा से जुड़े पक्षों के बीच भ्रष्टाचार की स्थिति बनती है। पिछले महीने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने उच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश, एक बिचौलिए और एक हवाला कारोबारी को गिरफ्तार किया था। उन लोगों पर लखनऊ में एक मेडिकल कॉलेज का संचालन करने वाले ट्रस्ट के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में चल रहे मामले को निपटाने का वादा करने का आरोप है। इस कॉलेज के अलावा 46 अन्य कॉलेजों को भी प्रवेश देने से सरकार ने प्रतिबंधित किया हुआ है। मामला रफा-दफा कराने में लगे इन लोगों की गिरफ्तारी के समय उनके ठिकानों से करोड़ों रुपये बरामद किए गए।
उच्चतम न्यायालय ने एक निगरानी समिति का गठन किया है जो एमसीआई की गतिविधियों पर नजर रखेगी। इसके अलावा एक सक्षम प्राधिकरण और सुनवाई समिति की बात भी फैसलों में की गई है लेकिन यह साफ नहीं है कि इस गड़बड़झाले को दुरुस्त करने में इनकी क्या भूमिका होगी?
एमसीआई की निरीक्षण समितियों ने निजी मेडिकल कॉलेजों में कई तरह की गंभीर खामियां पाई हैं। कर्नाटक के एक कॉलेज में निरीक्षण के लिए पहुंचे सदस्यों ने पाया कि केवल एक महीने पहले ही शिक्षकों को नियुक्त किया गया था। उन लोगों के पास शैक्षणिक अनुभव का कोई सबूत भी नहीं था और न ही उन्हें स्थायी रूप से नियुक्त ही किया गया था। उनमें से कुछ ही लोगों के पास निवास प्रमाणपत्र थे। यहां तक कि मेडिकल कॉलेज में इलाज के लिए आए लोग भी निरीक्षण टीम को मूर्ख बनाने के लिए लाए गए दिखे। ज्यादातर मरीजों को पेट दर्द, खांसी और हल्का बुखार जैसे मामूली रोगों की शिकायत थी। एक जगह तो पुरुष और महिला मरीजों को एक मनोचिकित्सा वार्ड में एक साथ ही रखा गया था। एमसीआई के तमाम मानदंडों को पूरा करने का दावा करने वाले कुछ कॉलेजों ने तो गड़बड़ी पाए जाने पर अपने बचाव में यह तर्क दिया कि निरीक्षण टीम किसी धार्मिक त्योहार के आसपास पहुंची थी लिहाजा उसका अधिकतर स्टाफ छुट्टïी पर था। कुछ कॉलेजों में निरीक्षण के लिए पहुंचे सदस्यों को तो बाउंसरों ने भीतर जाने से रोकने की भी कोशिश की।
इन सबके बावजूद न्यायालय मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश लेने वाले छात्रों के प्रति उदार रहा है। शैक्षणिक कोर्स कर रहे छात्रों को प्रवेश संबंधी अनियमितताओं के बावजूद अपना कोर्स पूरा करने की इजाजत अदालतों ने दी। ऐसे में यह अंदाजा लगा पाना अधिक मुुश्किल नहीं है कि ये छात्र भविष्य में कैसे चिकित्सक बनेंगे? समय आ गया है कि एमसीआई अपनी वेबसाइट पर एक सूची जारी करे जिसमें डॉक्टरों की योग्यता और उनके शिक्षण संस्थान की जानकारी हो। आधार क्रमांक और सूचना का अधिकार नियम के मौजूदा दौर में जिंदगी और मौत को तय करने वाले डॉक्टरों से संबंधित आंकड़े मुहैया कराने जरूरी हैं। इससे मरीजों में डॉक्टरों के प्रति अविश्वास कम करने में मदद मिलेगी। मेडिकल शिक्षा की स्थिति की तुलना कानूनी शिक्षा से की जा सकती है। पिछले हफ्ते मद्रास उच्च न्यायालय ने कहा कि देश भर में 1,200 कानूनी शिक्षण संस्थानों की कोई जरूरत नहीं है, केवल 175 लॉ कॉलेज ही काफी होंगे। उसने कहा है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने वर्ष 2014 में हरेक तीसरे दिन एक लॉ कॉलेज को मान्यता दी थी। उनमें से कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के कुछ संस्थान तो केवल कागजों पर ही चल रहे थे। ये कॉलेज कानूनी पाठ्यक्रमों की डिग्रियां बांट रहे थे और अपराधियों तक को काला कोट पहनने का मौका दे रहे थे। एक जगह पर तो निरीक्षण टीम के सामने एक मैरिज हॉल को ही लॉ कॉलेज के रूप में पेश कर दिया गया था।
इस तरह के संस्थानों से पढ़कर निकलने वाले डॉक्टरों और वकीलों की सेवाएं लेने वाले ग्रामीण क्षेत्र के उपभोक्ताओं के पास विकल्प भी सीमित हैं। कहा जाता है कि डॉक्टर अपनी गलतियों को जमीन के नीचे दफना देते हैं और वकील उन्हें लटका देते हैं। ऐसे में उन पर निर्भर लोगों के पास विकल्प ही क्या बचता है?

Keyword: Supreme court, education, medical,
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