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क्राउड फंडिंग, कृत्रिम बुद्घिमत्ता और मशीन

दीपक लाल /  October 31, 2017

डिजिटल क्रांति ने एक तरफ हमें तरह-तरह के फायदे पहुंचाए हैं, वहीं उसका एक चेहरा डरावना भी है। कृत्रिम बुद्घिमत्ता और रोबोट से जुड़े खतरों के बारे में विस्तार से चर्चा कर रहे हैं दीपक लाल
पिछले आलेख में मैंने गूगल और फेसबुक जैसे मंचों की बात की थी। इस भाग में मैं क्राउडफंडिंग और कृत्रिम बुद्घिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस यानी एआई) आधारित रोबोट की बात करूंगा।
रोनाल्ड स्ट्रास्ज के एक हालिया पर्चे (अ थिअरी ऑफ क्राउडफंडिंग) से पता चलता है कि किकस्टार्टर जैसी क्राउडफंडिंग वेबसाइट मांग की अनिश्चितता के दौर में आर्थिक किफायत बढ़ाने का काम करती हैं। वे उद्यमियों को किसी उत्पाद के तैयार होने के पहले उपभोक्ताओं से अनुबंध करने का अवसर देकर ऐसा करती हैं। इससे उनके पास अवसर रहता है कि अगर उद्यमी संभावित निवेश न भी करे तो भी वे अपने उत्पाद को तैयार कर सकें। यह उपभोक्ताओं को भी यह प्रोत्साहन देती है कि वे अपनी मांग जाहिर करें। किकस्टार्टर की प्रक्रिया कुछ ऐसी है कि वह व्यक्तिगत स्तर पर मांग आमंत्रित करती है और इन सभी के लिए लक्षित स्तर की घोषणा करता है। 30 दिनों की अभियान अवधि के दौरान एकत्रित मांगों की घोषणा की जाती है और उपभोक्ताओं को यह अवसर दिया जाता है कि वे अपने सशर्त निर्णय सामने रख सकें। अगर मांग का स्तर पहले की गई घोषणा से कम होता है तो क्राउडफंडिंग अभियान को नाकाम घोषित कर रद्द कर दिया जाता है। अगर मांग लक्ष्य से ज्यादा हो जाती है तो उपभोक्ताओं से कहा जाता है कि वे इसकी फंडिंग करें। यह राशि उस उद्यमी को दी जाती है जो उक्त परियोजना पर काम करने को तैयार हो। इसके अलावा परियोजना पूरी होने और की गई मांग के निपटने के बाद उसका एक भरापूरा बाजार होता है। लक्ष्य हासिल होने के बाद उपभोक्ता खुले बाजार में उस उत्पाद को खरीदने की उत्सुकता भी दिखा सकते हैं। विलंबित भुगतान की समस्या इसी पश्चवर्ती बाजार में आती है। यही वजह है कि क्राउड फंडिंग के  जरिये मांग की अनिश्चितता कम की जाती है और यह पारंपरिक उद्यमिता में मिलने वाली वित्तीय मदद की कमी पूरी करता है। क्राउड फंडिंग पर आधारित यह नवाचार डिजिटल क्रांति के जरिये समाज कल्याण को आगे बढ़ा रहा है।
एआई की बात करें तो रोबोट को लेकर तीन चिंताएं हैं। इनमें सबसे पहली चिंता है प्रौद्योगिकी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर रोजगार जाना। दूसरी चिंता है कि वे मनुष्य की जगह ले सकती हैं या उसे अपना दास बना सकती हैं। तीसरी चिंता रोबोट से जंग की है।
अगर प्रौद्योगिकी आधारित बेरोजगारी और भारत जैसे श्रमिक बहुल निर्यात वाले देश के अपने जनांकिकीय लाभांश का इस्तेमाल न कर पाने की बात की जाए तो अर्थशास्त्र के मूलभूत सिद्धांत इस डर को खारिज करते हैं। जब तक प्रौद्योगिक से बनने वाली वस्तुएं मौजूदा श्रम आधारित तकनीक से बेहतर नहीं होती हैं तब तक रोबोटिक तकनीक को कैसे अपनाया जा सकता है? यह तकनीक ही है जिसकी वजह से पश्चिमी देशों में ऊंची इमारतों पर निर्माण कार्य क्रेनों से होता दिखता है जबकि भारत में श्रमिकों को ऊंची जगहों पर काम करते हुए आसानी से देखा जा सकता है। रिकॉर्डो का तुलनात्मक लाभ का सिद्धांत इस ओर इशारा करता है कि दुनिया के अन्य देश तमाम चीजें चाहे जितनी कम लागत में तैयार करें लेकिन भारत को उन चीजों के उत्पादन में तुलनात्मक बढ़त हासिल रहेगी जिनका उत्पादन और निर्यात उसके लिए घरेलू स्तर पर किफायती है। यह किफायत श्रम आधारित होगी। अहम बात यह है कि श्रम और पूंजी जैसे कारक आधारित बाजारों में अवसर लागत साफ परिलक्षित होनी चाहिए। इसके लिए श्रम बाजार की विसंगतियां कम करनी होंगी।
जहां तक दुनिया पर रोबोट के काबिज होने की बात है तो कंप्यूटर और इंसानी दिमाग की प्रासंगिकता पर अलग तरह के सवाल हैं। जॉन सर्ले ने सन 1998 में आई अपनी किताब 'द मिस्ट्री ऑफ कॉन्शियसनेस' में इस पर अच्छा प्रकाश डाला है। मस्तिष्क और शरीर के बीच की समस्या की शुरुआत फ्रांसीसी दार्शनिक देकार्त के वक्तव्य से होती है। वह इन दोनों के द्वंद्व की बात करते हैं लेकिन गिलबर्ट राइल ने इसका विरोध करते हुए कहा कि मन को लेकर देकार्त की दृष्टि मशीन में भूत के समान है। दार्शनिक और वैज्ञानिक अब इस दोहरेपन को मान्यता नहीं देते। मन दिमाग का केवल एक हिस्सा है। बहरहाल कंप्यूटर विज्ञानियों का दावा है कि दिमाग केवल एक डिजिटल कंप्यूटर है और मन उसका एक प्रोग्राम भर है। सर्ले कहते हैं कि मजबूत एआई को कमजोर एआई से अलग करके देखना होगा क्योंकि कमजोर एआई कंप्यूटर को उपयोगी उपकरण मानता है। दिमाग और कंप्यूटर के बीच सबसे बड़ा अंतर यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लॉस एंजिलस  के तंत्रिका विज्ञानी जोकिम फस्टर ने तंत्रिका विज्ञान के हालिया विकास क्रम को अपनी किताब 'द न्यूरोसाइंस ऑफ फ्रीडम ऐंड क्रिएटिविटी' में बयां है। किताब में कहा गया है कि मस्तिष्क एक जटिल संतुलनकारी व्यवस्था है जो अवधारणाओं को लक्षित निर्देश में बदलता है। इसमें प्री फ्रंटल कोर्टेक्स की अहम भूमिका होती है। इनमें से कई कदम निश्चितताओं पर नहीं बल्कि संभावनाओं पर आधारित होते हैं जो विभिन्न कदमों में से किसी एक के चयन की वजह बनते हैं। यह मुक्त सोच को दर्शाने वाली बात है। मस्तिष्क का सेरेब्रल कोर्टेक्स वाला हिस्सा सचेतन ध्यान को भी निर्देशित करता है। यहां चेतना वह स्थिति है जो चीजों को लेकर हमारी जागरूकता और मस्तिष्क की भावनात्मक प्रक्रिया को स्थापित करती है।
यहां तक कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर काम कर रहे वैज्ञानिक भी अब यह मानते हैं कि इंसान की जगह रोबोट के इस्तेमाल का उनका स्वप्न इस बड़े प्रश्न पर निर्भर करता हैकि आखिर कोई वस्तु चैतन्य क्यों है? यह सवाल एमआईटी के भौतिक विज्ञानी मैक्स टेगमार्क ने उठाया था। हालांकि मैं मानता हूं कि चेतनाशील रोबोट विकसित हो सकते हैं लेकिन मेरा संदेह बरकरार है। मस्तिष्क एक जीवविज्ञानी अंग है और यह कई तरह के काम कर सकता है। मुझे लगता नहीं कि इसका कोई विकल्प होगा।
आखिरी डर थोड़ा अधिक तार्किक है। स्वचालित रोबो हथियारों की होड़ शुरू हो सकती है। हमारे पास पहले ही ड्रोन हैं लेकिन इन्हें चलाने के लिए मनुष्य की जरूरत पड़ती है। परंतु टेगमार्क की रिपोर्ट के मुताबिक अब असली और पूर्ण स्वचालित हथियारों का विकास हो रहा है जो खुद ही निशाना तय करेंगे।
कुल मिलाकर डिजिटल क्रांति ने जहां कई तरह के लाभ दिए हैं वहीं इसके साथ कई तरह के आर्थिक और मानवीय भय भी सर उठा रहे हैं। विज्ञापन एजेंसियों और सोशल मीडिया जैसे मंचों तथा स्वचालित हथियारों से जुड़े कई डर सामने आ रहे हैं जिनसे निपटना जरूरी है।

Keyword: Digital, artificial intelligence, robot,
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