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हिमाचल प्रदेश में मतभेद से जूझ रहीं भाजपा और कांग्रेस

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  October 30, 2017

हिमाचल प्रदेश में 9 नवंबर को होने जा रहे विधानसभा चुनाव के बारे में हालिया चुनाव सर्वेक्षणों से चौंकाने वाले नतीजे मिले हैं। इंडिया टुडे-ऐक्सिस के सर्वेक्षण में कहा गया है कि विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) राज्य में सरकार बनाएगी लेकिन कांग्रेस के मौजूदा मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ही प्रदेश में मुख्यमंत्री पद के सबसे लोकप्रिय प्रत्याशी हैं।  प्रश्न उठता है कि यह कैसे? इसे समझना बहुत कठिन नहीं है। सिंह कांगड़ा क्षेत्र से ताल्लुक रखते हैं जो विधानसभा की 68 में से 16 सीटों का निर्वाचन सुनिश्चित करता है। राज्य की आबादी का एक चौथाई हिस्सा भी कांगड़ा में निवास करता है। भाजपा के वरिष्ठï नेता और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार भी कांगड़ा से हैं। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को कांगड़ा में 10 सीट पर जीत मिली थी जबकि भाजपा को तीन। मंडी में 10 तथा शिमला में आठ विधानसभा सीट हैं। ये तमाम सीटें मिलकर किसी भी दल के पक्ष में चुनाव पलट सकती हैं।

 
प्रचार अभियान शुरू हो चुका है। कांग्रेस और भाजपा दोनों पूरी शिद्दत से इसमें लगे हैं। भाजपा का नारा है, 'हिसाब मांगे हिमाचल' जबकि कांग्रेस का जवाबी नारा है, 'जवाब देगा हिमाचल'। ये नारे आपको चाहे जैसे लगें लेकिन राज्य में ये चुनावी बहस का हिस्सा हैं। एकमात्र बात यह है कि यह चुनाव सबसे कम प्रचार अवधि वाला चुनाव है जबकि आदर्श आचार संहिता यहां सबसे लंबे समय के लिए प्रवर्तन में है। आचार संहिता 20 दिसंबर तक यानी 69 दिनों तक लागू रहेगी क्योंकि 18 दिसंबर को नतीजे घोषित होने के बाद 20 दिसंबर को नई सरकार बनेगी। परंतु विभिन्न राजनीतिक दल और प्रत्याशियों को प्रचार अभियान के लिए 12 दिन का समय मिल रहा है। 
 
नामांकन वापस लेने की अंतिम तिथि शुक्रवार को थी और 7 नवंबर को प्रचार बंद हो जाएगा। वर्ष 2012 के चुनाव में आदर्श आचार संहिता 3 अक्टूबर को लागू हुई थी और नामांकन का काम 10 अक्टूबर को शुरू हुआ। नाम वापस लेने की आखिरी तिथि 20 अक्टूबर को थी, चुनाव 4 नवंबर को हुए और प्रचार के लिए 13 दिन का समय दिया गया। कांग्रेस और भाजपा दोनों को अपने प्रत्याशियों की सूची जारी करने में दिक्कत हो रही है, ऐसे में प्रचार अभियान के लिए कम समय शायद बुरी बात नहीं है। दोनों दल आंतरिक झगड़ों से परेशान हैं।
 
वीरभद्र सिंह जहां अपने ही दल में बहुत अधिक अलोकप्रिय हैं। ऐसा शायद इसलिए क्योंकि वह बहुत लंबे समय से बने हुए हैं और उनके चलते पार्टी में दूसरी पीढ़ी का नेतृत्व न तो उभरा, न ही विकसित हुआ। भाजपा भी बेहतर नहीं है। हाल ही में लोगों को पूर्व मुख्यमंत्री पी के धूमल के बेटे अनुराग ठाकुर और मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार जे पी नड्डïा के बीच अशोभनीय क्लेश नजर आया। प्रधानमंत्री मोदी कई बैठकों में सार्वजनिक रूप से नड्डा की तारीफ कर चुके हैं। 
 
बहरहाल, उपरोक्त दोनों नेताओं के बीच विवाद का विषय था अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स)। ठाकुर का जोर इस बात पर था कि एम्स उनके लोकसभा क्षेत्र हमीरपुर में बने। भाजपा ने अपने कई उम्मीदवारों को बता दिया है कि उनकी उम्मीदवारी तय है लेकिन कुछ सीटों पर पार्टी ने महिला उम्मीदवार उतारना तय किया है। यानी यहां से पुराने प्रत्याशी या उम्मीदवार को हटाया जाएगा। इसकी वजह से कई लोग नाराज हैं। कितनी गुटबाजी और तोडफ़ोड़ चुनाव नतीजों को नुकसान पहुंचा सकती है इसे एक बात से समझा जा सकता है। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में 105 प्रत्याशी स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में उतरे थे और उन्हें कुल मिलाकर 410,393 वोट मिले थे। यह कुल मतदान का 12.14 फीसदी था। पांच स्वतंत्र उम्मीदवारों को जीत भी मिली। बीते चुनाव में आठ सीटों पर कड़ा मुकाबला था। इन सीटों पर जीत का अंतर 800 वोट से कम रहा। 
 
कांग्रेस में भी हालात बेहतर नहीं हैं। वीरभद्र सिंह और राहुल गांधी के बीच दो दौर की वार्ता हो चुकी है ताकि सीटों का सही तालमेल हो सके। पार्टी को उस समय झटका लगा जब पार्टी के दिग्गज नेता रहे सुखराम के बेटे अनिल शर्मा ने भाजपा की सदस्यता ले ली। मंडी क्षेत्र में सुखराम का परिवार बड़ी राजनीतिक ताकत है और उनकी कभी वीरभद्र सिंह से नहीं बनी।  हिमाचल प्रदेश में सरकारी कर्मचारियों की तादाद बहुत ज्यादा है। यहां के लोगों का प्राथमिक पेशा कृषि है और सेब की खरीद कीमतें तय करना यहां का अहम राजनीतिक मुद्दा है। किसान कहते हैं कि उनको इस फल का सही मूल्य नहीं मिलता और वे सरकार से कह रहे हैं कि वह केंद्र के साथ लॉबीइंग करके आयातित सेब पर शुल्क बढ़वा दे। सब्सिडी में देरी भी एक विवादास्पद मुद्दा है। किसानों को वर्ष 2013-14 से ही सब्सिडी दावों पर राहत का इंतजार है। देश के शेष हिस्से की तरह नोटबंदी और जीएसटी यहां भी बड़ा चुनावी मुद्दा हैं। 
 
नोटबंदी और कर सुधार ने छोटे कारोबारियों और प्रवासी मजदूरों को बुरी तरह प्रभावित किया। कारोबारी अपना वोट कांग्रेस के पाले में डाल सकते हैं क्योंकि पार्टी लगातार सरकार को इस मुद्दे पर घेरती आ रही है। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने जीएसटी के गलत क्रियान्वयन को हिमाचल प्रदेश के कारोबारियों की दिक्कत की बड़ी वजह बताया है। 
 
विकास और बेरोजगारी भी प्रमुख चुनावी मुद्दे हैं। भाजपा ने कहा था कि वह राज्य में 61 राष्टï्रीय राजमार्ग बनाएगी लेकिन उसका आरोप है कि राज्य के मंत्रियों ने योजना को आगे बढ़ाने में कोई योगदान नहीं किया।  हिमाचल प्रदेश का चुनाव प्रचार और चुनाव भले ही राष्टï्रीय स्तर पर गुजरात चुनाव जैसी सुर्खियां नहीं बटोरे लेकिन शिक्षा क्षेत्र में प्रशासनिक सफलता और रोजगार के क्षेत्र में नाकामी के साथ इस छोटे पहाड़ी राज्य के चुनाव की अपनी अहमियत है। वहां यह चुनाव रोचक होने वाले हैं और यह देखना दिलचस्प होगा कि कौन से मुद्दे लोगों को राजनीतिक रूप से प्रेरित करते हैं।
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