बिजनेस स्टैंडर्ड - पुनर्पूंजीकरण बॉन्ड के निहितार्थ!
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पुनर्पूंजीकरण बॉन्ड के निहितार्थ!

ए के भट्टाचार्य /  10 29, 2017

क्या सरकार, सरकारी बैंकों के स्वामित्व में बदलाव लाएगी? क्या प्रबंधन में ऐसा सुधार किया जाएगा कि फंसे हुए कर्ज की समस्या दोबारा न उभरे? सवाल उठा रहे हैं ए के भट्टाचार्य 

 
गत वर्ष दीवाली के कुछ दिन बाद देश के बैंक जबरदस्त मशक्कत करते दिख रहे थे। नोटबंदी के चलते 500 और 1,000 रुपये के नोट बंद हो गए थे और बैंकों के सामने पुराने नोट बदलने के लिए लंबी कतारें लगी थीं। यह दीवाली खासकर सरकारी क्षेत्र के बैंकों के लिए पिछली दीवाली से अलग थी। दीवाली के तकरीबन एक सप्ताह बाद इन बैंकों ने राहत की सांस ली क्योंकि 24 अक्टूबर को सरकार ने अगले दो साल में सरकारी बैंकों में 2.11 लाख करोड़ रुपये की पूंजी डालने की घोषणा की।
 
यह राशि पूर्ण पूंजीकरण के लिए जरूरी 3 लाख करोड़ रुपये से थोड़ी ही कम है लेकिन इससे समस्या से निपटने में सरकार की गंभीरता पता चलती है। अभी इस बारे में ज्यादा जानकारी सामने नहीं आई है लेकिन अनुमान है कि 18,000 करोड़ रुपये की राशि इक्विटी के रूप में आएगी। 58,000 करोड़ रुपये की राशि बैंक बाजार से जुटाएंगे। 1.35 लाख करोड़ रुपये की शेष राशि पुनर्पूंजीकरण बॉन्ड के रूप में होगी। इसके बारे में ज्यादा जानकारी आनी शेष है। 
 
वित्त मंत्री अरुण जेटली, आरबीआई गवर्नर ऊर्जित पटेल और मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन भी अनेक अवसरों पर इस योजना की बात कर चुके हैं। इससे तीन बातें साफ तौर पर सामने आ रही हैं।  पहली बात, मोदी सरकार अपनी राजकोषीय सुदृढ़ीकरण योजना में रियायत के लिए तैयार है ताकि सरकारी बैंकों को जरूरी पूंजी दी जा सके।  सरकार के कई बयानों के उलट तथ्य यह भी है कि पुनर्पूंजीकरण बॉन्ड के आगमन से राजकोषीय घाटा बढ़ेगा। अगर राजस्व बढऩे से इस काम में मदद नहीं मिलती तो यह मोदी सरकार का पहला वर्ष होगा जब वह राजकोषीय घाटे के लक्ष्य के मोर्चे पर पिछड़ जाएगी।
 
आरबीआई गवर्नर ने सही कहा था कि बॉन्ड जारी करना सरकार के लिए नकदी निरपेक्ष होगा लेकिन इससे सरकार की उधारी तो बढ़ेगी। अतिरिक्त उधारी और इन बॉन्ड पर सालाना ब्याज ही 8,000 से 9,000 करोड़ रुपये होगा। इससे सरकार का घाटा बढ़ेगा। पटेल ने भी इस आशंका को खारिज नहीं किया था। उन्होंने कहा कि लंबी अवधि के दौरान इसका राजकोषीय असर होना तय है। मुख्य आर्थिक सलाहकार ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मानकों और आईएमएफ के मानकों में भी सरकार के घाटे का आकलन करते समय इस तरह के बॉन्ड को शामिल नहीं किया जाता है। इनका उल्लेख होता है लेकिन उक्त संदर्भ में नहीं। परंतु प्रभावी तौर पर देखें तो यह राजकोषीय घाटे में विस्तार का सबब बनेगा। यहां तक कि सुब्रमण्यन ने सार्वजनिक भाषण में यह स्वीकार किया कि हमारे देश में जो व्यवस्था है उसमें ये बॉन्ड घाटे में शामिल होंगे। संभव है कि सरकार पुनर्पूंजीकरण बॉन्ड के असर को अलग से प्रस्तुत करे। कई साल पहले तेल बॉन्ड के मामले में ऐसा किया जा चुका है ताकि तेल कंपनियां कच्चे तेल की बढ़ी कीमतों से निपट सकें और उसे ग्राहकों पर न डालना पड़े। अगर यह राह चुनी जाती है तो विश्लेषक और रेटिंग एजेंसियां दो तरह के घाटों का जिक्र करेगी। एक वास्तविक और दूसरा आधिकारिक। वास्तविक घाटे में पुनर्पूंजीकरण बॉन्ड शामिल होगा। तब मामला और जटिल हो जाएगा। 
 
मोदी सरकार द्वारा इन बॉन्ड को राजकोषीय घाटे के विस्तार में शामिल करने के इरादे का अंतिम पुष्टï करता संकेत वित्त मंत्री ने दिया। उन्होंने अप्रत्यक्ष तौर पर कहा कि सरकार राजकोषीय विवेक और पूंजीगत व्यय में संतुलन रखेगी। इसका मतलब है सरकार बीच का रास्ता अपनाएगी जहां राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को कुछ शिथिल बनाया जा सकता है और उच्च पूंजीगत व्यय से उच्च वृद्घि हासिल करने का प्रयास किया जा सकता है। 
 
शेयर बाजार भी सरकार के कदम के पक्ष में नजर आ रहे हैं। बुधवार को सेंसेक्स में 435 अंक की उछाल आई और वह रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। 22 सूचीबद्घ सरकारी बैंकों के बाजार पूंजीकरण में 1.2 लाख करोड़ रुपये की बढ़ोतरी आई। निफ्टी बैंक सूचकांक एक दिन में 30 फीसदी उछला जो खुद में एक रिकॉर्ड है। जाहिर है बाजार को लग रहा है कि दिवालिया कानून और बैंकों में नई पूंजी डालने से वित्तीय क्षेत्र का दबाव कम होगा। 
 
बाजार की सकारात्मक प्रतिक्रिया अहम है और सरकार के नए पूंजीकरण पैकेज के लिए भी यह अपने आप में शुभ संकेत समेटे है। याद रहे कि 2.11 लाख करोड़ रुपये के नए पैकेज में से 58,000 करोड़ रुपये की राशि को इक्विटी के जरिये डाला जाएगा। अगर बाजार को इन सूचीबद्घ सरकारी बैंकों में सुधार की क्षमता नजर आती है और उसे लगता है कि पुनर्पूंजीकरण बॉन्ड के बाद वे बेहतर मुनाफा कमाने में सफल होंगे तो इससे इन बैंकों के शेयरों की खुदरा बिक्री भी बढ़ेगी। आरबीआई गवर्नर को उम्मीद है कि इस पैकेज के बाद सरकारी बैंकों के निजी अंशधारक भी उत्साहित होंगे और पूंजी की जरूरत बाजार फंडिंग से भी पूरी होगी। 
 
तीसरा, पुनर्पूंजीकरण पैकेज अपने आप में इन सरकारी बैंकों की परिसंपत्ति की गुणवत्ता सुधारने वाला नहीं साबित होगा। इसीलिए इन बैंकों में आगे और क्या सुधार किए जा सकते हैं इस बारे में सवाल उठाए जा रहे हैं। वित्त मंत्री ने सुधार उपायों का जिक्र किया है जो सरकार आने वाले समय में उठाएगी। ये उपाय पूंजीकरण पैकेज के पूरक होंगे। ऐसे सुधारों के बारे में विस्तृत ब्योरे की अभी प्रतीक्षा है।
 
आरबीआई गवर्नर भी संकेत दे चुके हैं कि ये सुधार संबंधी उपाय क्या हो सकते हैं। पटेल का मानना है कि उन बैंकों को प्राथमिकता मिलेगी जिनकी स्थिति पूंजीकरण से सुधर सकती है। उन्होंने कहा, 'इस संबंध में आकलित रुख अपनाया जाएगा जहां जिन बैंकों ने अपनी बैलेंस शीट को बेहतर तरीके से निपटाया होगा और जो नई पूंजी को कर्ज देने में इस्तेमाल करेंगे उनको प्राथमिकता दी जाएगी। यह सरकारी पुनर्पूंजीकरण कार्यक्रम में बाजार के समान अनुशासन लाने का अच्छा तरीका है और पिछली ऐसी योजनाओं से अलग भी।'
 
निश्चित तौर पर भारतीय अर्थव्यवस्था में दोहरी बैलेंस शीट की समस्या से तब तक निजात नहीं पाई जा सकती है जब तक कि आगे और सुधारों का क्रियान्वयन नहीं किया जाता। क्या सरकार सरकारी बैंकों के स्वामित्व के तौर तरीकों में  बदलाव लाएगी? क्या इनके प्रबंधन में ऐसा बदलाव किया जाएगा कि फंसे हुए कर्ज की समस्या दोबारा सर न उठाए? इन बातों को देखें तो मौजूदा पैकेज अधूरा लगता है। हालांकि इसमें आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य के सुदर्शन चक्र और मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन के ब्रह्मस्त्र दोनों के गुण हैं। इन दोनों ने ये नाम सुधार पैकेजों को दिए थे। 
Keyword: bank, loan, debt, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई),
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