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घिरते बादल

संपादकीय /  October 29, 2017

सरकार की ओर से सरकारी बैंकों के पुनर्पूंजीकरण कार्यक्रम की घोषणा को लेकर हो रही चर्चा के बीच समस्या का एक पहलू ऐसा भी है जिसे शायद पर्याप्त तवज्जो नहीं दी गई है। सरकारी बैंकों को कुछ उम्मीद है कि वे फंसे हुए कर्ज की समस्या के बोझ से धीरे-धीरे निजात पा सकते हैं परंतु इस समस्या का एक छोटा स्वरूप अपेक्षाकृत स्वस्थ रहे निजी क्षेत्र के बैंकिंग क्षेत्र में भी नजर आ रहा है। कई प्रमुख निजी बैंकों के फंसे हुए कर्ज में हाल के दिनों में इजाफा हुआ है। सितंबर 2017 में समाप्त तिमाही के नतीजों से यह प्रतीत होता है। 

 
आईसीआईसीआई बैंक के फंसे हुए कर्ज में हालांकि जून तिमाही की तुलना में कमी आई है लेकिन फिर भी यह कर्ज 7.9 फीसदी के साथ चिंताजनक स्तर पर है। ठीक एक साल पहले की समान तिमाही में यह स्तर 6.1 फीसदी था। बैंक ने 2,058 करोड़ रुपये के शुद्घ मुनाफे की घोषणा की जो सालाना आधार पर 34 फीसदी कम है।  अन्य बैंकों में भी ऐसी ही स्थिति नजर आई। ऐक्सिस बैंक ने कहा कि उसके फंसे हुए कर्ज में पिछली तिमाही की तुलना में 24 फीसदी का इजाफा हुआ है। एचडीएफसी बैंक बाकी बैंकों की तुलना में सतर्क रहा है और उसका फंसा हुआ कर्ज 1.24 फीसदी के सहज स्तर पर है। 
 
अहम प्रश्न यह है कि क्या ऋण देने के मामले में खराब कारोबारी व्यवहार के कारण संकट में फंसे सरकारी बैंकों का पुनर्पूंजीकरण करते हुए हम एक महत्त्वपूर्ण बात की अनदेखी कर रहे हैं? रिजर्व बैंक ने जब कुछ निजी बैंकों के बहीखाते का विश्लेषण किया तो उसे फंसे हुए कर्ज को लेकर बताई गई प्रोविजनिंग और वास्तविक प्रोविजनिंग में अंतर दिखा जिसके प्रति उसने असंतोष प्रकट किया। केंद्रीय बैंक के मुताबिक ऐक्सिस बैंक और येस बैंक ने अपने फंसे हुए कर्ज के बारे में कम जानकारी दी। जबकि एचडीएफसी बैंक नियामक के साथ चर्चा कर रहा है। नियामक ने उसे एक विवादित ऋण को फंसे हुए कर्ज की श्रेणी में डालने को कहा है। केंद्रीय बैंक ने अभी आईसीआईसीआई के बारे में अपना ऐसा ही अंकेक्षण जाहिर नहीं किया है। 
 
बहरहाल सवाल केवल खराब बैंकिंग का नहीं है। अगर कुछ निजी बैंक तनावग्रस्त दिख भी रहे हैं तो शायद कॉर्पोरेट क्षेत्र पर दबाव के अतिरिक्त सवाल को विवरणात्मक ढंग से देखा जाना चाहिए। एचडीएफसी बैंक का दावा है कि फंसे हुए कर्ज में उसका अधिकांश हिस्सा कृषि क्षेत्र के ऋण से सामने आया है।  अन्य बैंकों मसलन आईसीआईसीआई आदि लौह एवं इस्पात आदि क्षेत्रों के कमजोर प्रदर्शन के कारण कर्ज में हैं। गत वर्ष ऐक्सिस बैंक ने अनुमान जताया था कि उसके कॉर्पोरेट अग्रिम का 15 फीसदी हिस्सा संकट में है। जिन बैंकों ने मूलभूत क्षेत्रों मसलन बिजली आदि को ऋण दिया है वे अपने धन की वापसी को लेकर अनिश्चित हैं। दिवालिया और निस्तारण प्रक्रिया शायद इस वर्ष के अंत से पहले नतीजे दिखाना शुरू कर दे लेकिन इसका प्रभाव अब तक तो जाहिर नहीं हुआ है।  
 
व्यापक बिंदु यही होना चाहिए कि देश के कॉर्पोरेट क्षेत्र का अतीत कोई बहुत उल्लेखनीय नहीं रहा है। मामला चाहे सरकारी बैंक का हो या निजी बैंक का, वह जोखिम का सही आकलन नहीं कर पाता। कई कंपनियों ने दिखाया है कि उन्होंने कर्ज लेते समय व्यावहारिकता नहीं दिखाई। समस्या का एक हिस्सा तो अनुबंधों का प्रवर्तन न कर पाना भी रहा है। ऐसे में पहले ही हो चुके सौदों पर नए सिरे से मोलतोल होता है। कई कारोबारी घरानों में यह आम है। फंसे हुए कर्ज की बढ़ती समस्या के चलते देश में अनुबंध प्रवर्तन पर भी नए सिरे से दृष्टिï डालनी चाहिए।
Keyword: bank, loan, debt, PSB,,
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