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निर्यात में सुधार का जश्न मनाने का नहीं आया वक्त

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  October 27, 2017

सितंबर 2017 में देश के विदेश व्यापार संबंधी प्रदर्शन ने आर्थिक वृद्घि की गति में सुधार की उम्मीद जगाई है। वस्तु निर्यात में 25 फीसदी से ज्यादा की उछाल ने भी इस आशावाद को जन्म दिया है। आयात में 18 फीसदी से अधिक की बढ़ोतरी को घरेलू मांग और विनिर्माण में सुधार के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। सवाल यह है कि निर्यात में सुधार कितना स्थायी है और क्या आयात में सुधार वाकई घरेलू विनिर्माण में सुधार का संकेतक है? इन सवालों के जवाब पाने के लिए यह उचित होगा कि वर्ष 2017-18 की पहली छमाही में देश के विदेश व्यापार प्रदर्शन का आकलन किया जाए।
 
अप्रैल-सितंबर 2017 के दौरान कुल निर्यात के आंकड़े खासे प्रभावशाली हैं। 11.5 फीसदी की दर के साथ यह बीते कुछ सालों की बेहतरीन वृद्घि दर है। खासकर इसलिए कि निर्यात कमजोर रहा और एक साल तो उसमें गिरावट भी आई। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में कमी ने भी कुल निर्यात में सुधार में मदद की क्योंकि पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात में 26 फीसदी का इजाफा हुआ। अगर पेट्रोलियम उत्पादों को निकाल दिया जाए तो निर्यात वृद्घि घटकर 9.7 फीसदी रह जाती है। पेट्रोलियम उत्पादों के अलावा करीब 10 ऐसी जिंस श्रेणियां हैं जो देश के कुल निर्यात में 85 फीसदी के लिए उत्तरदायी हैं। ये श्रेणियां हैं इंजीनियरिंग वस्तुएं, रसायन, समुद्री उत्पाद, चावल, कपड़ा, रत्न एवं आभूषण, मांस एवं पोल्ट्री उत्पाद, चमड़े की वस्तुएं, औषधि और इलेक्ट्रॉनिक वस्तएं। इन वस्तुओं का विश्लेषण देश के निर्यात प्रदर्शन पर नई रोशनी डालेगा। 
 
इंजीनियरिंग वस्तुओं की बात करें तो चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में इसमें बढिय़ा सुधार देखने को मिला। 37 अरब डॉलर के निर्यात के साथ इस क्षेत्र ने 20 फीसदी की तेजी दर्ज की। यह निर्यात की अकेली सबसे बड़ी श्रेणी साबित हुई। निश्चित तौर पर उनका मूल्यांकन समान अवधि में पेट्रोलियम उत्पादों के 18 अरब डॉलर से अधिक रहा। इंजीनियरिंग वस्तुओं के निर्यात में सुधार भी विनिर्माण क्षेत्र तथा रोजगार के लिए शुभ संकेत लेकर आया है। 
 
रसायन निर्यात में भी 25 फीसदी की वृद्घि दर्ज की गई। अप्रैल से सितंबर तिमाही के दौरान इस क्षेत्र में करीब 8.52 अरब डॉलर का निर्यात हुआ। परंतु इसमें कच्चे तेल की कीमतों के सुधार का भी योगदान रहा क्योंकि इसका सीधा असर रसायनों पर पड़ता है। समुद्री उत्पाद और चावल के निर्यात में भी उल्लेखनीय वृद्घि दर्ज की गई। यह निर्यात क्रमश: 3.74 अरब डॉलर और 3.73 अरब डॉलर रहा। इन दोनों में क्रमश: 34 और 25 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। 
 
परंतु निर्यात के अन्य छह क्षेत्रों में हमारा प्रदर्शन चिंतित करने वाला है। रत्न एवं आभूषण देश का सर्वाधिक निर्यात वाला क्षेत्र हुआ करता था। इसमें साल की पहली छमाही में 4 फीसदी की गिरावट आई। 21.34 अरब डॉलर रुपये के साथ अब यह देश का सबसे बड़ा निर्यातक नहीं रहा। समान अवधि में हमने 17 अरब डॉलर मूल्य के मोती और अन्य कीमती रत्न आयात किए। यानी वर्ष 2016 की तुलना में 45 फीसदी का सीधा इजाफा। अगर समान अवधि में 19 अरब डॉलर मूल्य के सोने और चांदी के आयात को जोड़ दिया जाए तो रत्नाभूषण क्षेत्र का निर्यात भी चिंता का विषय बन जाता है। 
 
करीब 16 अरब डॉलर मूल्य का वस्त्र निर्यात 7 फीसदी की गति से बढ़ा। परंतु यह क्षेत्र तथा रत्नाभूषण क्षेत्र रोजगार को बढ़ावा देने वाले क्षेत्र हैं। उनका कमजोर प्रदर्शन देश की अर्थव्यवस्था के लिए सही नहीं है क्योंकि रोजगार निर्माण एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं का निर्यात महज 3 अरब डॉलर रहा और यह 5 फीसदी बढ़ा। औषधि निर्यात कहीं अधिक चिंता का विषय है क्योंकि यह 5 फीसदी घटकर 8 अरब डॉलर रह गया। यह क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से बेहतर निर्यात का क्षेत्र रहा है। 
 
शेष दो क्षेत्रों की कमजोरी इस बात का उदाहरण है कि राजनीति भी निर्यात को प्रभावित करती है। मांस, डेयरी और पोल्ट्री उत्पादों का निर्यात चालू वित्त वर्ष में बमुश्किल 2 फीसदी बढ़कर 2.02 अरब डॉलर पर पहुंचा। जबकि चमड़े से बने उत्पादों के निर्यात में भी 2 फीसदी की बढ़ोतरी हुई और वह 2.72 अरब डॉलर रहा। ये दोनों क्षेत्र हाल के दिनों में पशुओं के व्यापार, बीफ पर प्रतिबंध जैसी बातों पर छिड़ी राजनीति से प्रभावित हुए हैं। ऐसा माहौल बना दिया गया है कि गायों और भैंसों से जुड़े कारोबार हतोत्साहित हो रहे हैं। इसका सीधा नतीजा मांस, चमड़े और चमड़े से बने सामान के निर्यात में गिरावट के रूप में सामने आया है। जबकि बीते सालों में इसमें इजाफा देखने को मिलता था। 
 
अहम बात यह है कि वर्ष 2017-18 की पहली छमाही में 25 फीसदी की वृद्घि देखने को मिली लेकिन कच्चे तेल और सोने-चांदी को हटा दिया जाए तो वृद्घि दर केवल 12 फीसदी रह जाती है। इस वृद्घि की व्याख्या घरेलू औद्योगिक क्षेत्र में सुधार के रूप में की जा सकती है। बहरहाल, वस्तुओं की बात करें तो उनके आयात में इस अवधि में उल्लेखनीय वृद्घि हुई है। यह अलग कहानी है। 
 
इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं का आयात इस बीच 36 फीसदी बढ़कर 27 अरब डॉलर हो गया। यह घरेलू विनिर्माण के लिए अच्छी खबर नहीं है। कोयला आयात की बात करें तो यह 57 फीसदी उछलकर 10 अरब डॉलर हो गया। दालों के आयात में भी 18 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। गौरतलब है कि हमारे यहां कोयला और दाल दोनों की कमी नहीं।  ऐसे में लगता है कि निर्यात में वृद्घि के बावजूद कई ऐसे क्षेत्र हैं जो अतीत में देश के निर्यात का अहम हिस्सा थे लेकिन आजकल कमजोर हैं। गैर तेल, गैर स्वर्ण आयात में इजाफा हुआ है लेकिन इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं, कोयला और दालों का आयात तो चिंतित करने वाले स्तर पर है। संक्षेप में कहें तो अभी देश के विदेश व्यापार के प्रदर्शन का उत्सव मनाना जल्दबाजी है।
Keyword: india, economy, export,,
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