बिजनेस स्टैंडर्ड - और ज्यादा खुलासा कर सकते थे प्रणव दा
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और ज्यादा खुलासा कर सकते थे प्रणव दा

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  October 27, 2017

प्रणव मुखर्जी (प्रणव दा या दादा) का सार्वजनिक जीवन पांच दशक के राजनीतिक इतिहास में विस्तारित है। इतिहास बताता है कि उन्हें बहस की चुनौती देने वाला कोई शख्स कभी उनसे जीत नहीं सका। इसलिए नहीं कि वह हार नहीं मानते। बल्कि राजनीतिक उद्भव एवं इतिहास का उनका ज्ञान, संविधान की उनकी जानकारी और शासन की समझ सब अद्भुत हैं। इन दशकों के दौरान उन्होंने राजनीतिक मतभेदों से परे रिश्ते कायम किए। उनकी ताजातरीन पुस्तक 'द कोअलिशन इयर्स' की बात करते हुए मैं इन बातों से पूरी तरह अवगत हूं।

 
उनकी इन राजनीतिक स्मृतियों पर आधारित किताबों की इस शृंखला की सबसे अहम बात यह है कि इन स्मृतियों को लिपिबद्ध किया गया। दुनिया भर में (ओबामा नवीनतम उदाहरण हैं) यह लोकतांत्रिक परंपरा का हिस्सा हो सकता है पर भारत में ऐसा कभी नहीं हुआ। नेहरू साहित्यिक रुचि के नेता थे लेकिन उन्होंने अपना लेखन सत्ता में आने के पहले किया और सत्ता में रहते ही उनका निधन हो गया। उसके बाद से पी वी नरसिंह राव और इंद्र कुमार गुजराल को छोड़कर किसी शीर्ष नेता ने अपनी बातों को लिखा नहीं है। कुछ के पास समय और ऊर्जा नहीं रही तो कुछ के पास शायद कहने को कुछ नहीं था या योग्यता ही न थी। डॉ. मनमोहन सिंह में ये सारी काबिलियत है लेकिन वह अब तक इस दिशा में आगे बढऩे में सतर्कता बरत रहे हैं। हमारे कई नेता तो नई बात कहने से हिचकिचाते हैं क्योंकि वे खुद या उनकी संतान राजनीति में होती हैं। 
 
ऐसे में अगर मुखर्जी ने यह राह चुनी है तो यह अच्छी बात है। उनकी किताब के तीन खंड आ चुके हैं और बतौर राष्ट्रपति उनके कार्यकाल से जुड़ा चौथा खंड शायद आगे आएगा।। हमारे राजनीतिक इतिहास का यह दस्तावेजीकरण अनमोल है। खासतौर पर सन 1984 के बाद के काल का जब हमारी राजनीति में खुलापन आना शुरू हुआ। प्रणव दा के विवरण और संदर्भ  अचूक होते हैं। भारत की राजनीति और शासन व्यवस्था पर नजर रखने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए वे अमूल्य हैं। दिक्कत यह है कि जितनी बातें सामने नहीं आतीं, उतनी छिपाई जाती हैं। वह अक्सर नौकरशाही के निक्कमेपन, कूट लेखन और संकेतों का जिक्र करते हैं। जबकि इनके बजाय वह कुछ अहम तथ्यों के बारे में स्पष्टï बात कर सकते थे और कुछ अहम पड़ावों पर विस्तार से प्रकाश डाल सकते थे। 
 
पहले दो खंडों में तो इस बात को समझा जा सकता था। ये दोनों खंड उस समय आए जब वह राष्ट्रपति थे। उस  पद की 'मर्यादा' का ध्यान रखना आवश्यक था।  तीसरे खंड में तो उनके पास यह बचाव भी नहीं था।  ऐसे हील हवाले किताब में भरे पड़े हैं। अहम मुद्दा यह है कि कैसे उन्होंने इस पुस्तक का इस्तेमाल संप्रग के 10 साल के दौरान उपजे कई विवादित मुद्दों और निर्णयों में अपने आप को उचित ठहराने में किया है। अपने कुछ समकालीनों को सांकेतिक रूप से आरोपित भी किया है। हमें उनसे कहीं अधिक स्पष्टïता की उम्मीद थी। प्रणव मुखर्जी वह मजबूत शख्सियत हैं जिन्होंने अपने दम पर टीम अन्ना को असंवैधानिक जन लोक पाल के लिए दबाव बनाने से रोका था। 
 
मैं यहां संप्रग के 10 साल के उन बातों का जिक्र करूंगा जिन पर प्रणव दा कहीं अधिक रोशनी डालते तो अच्छा होता: सोनिया गांधी ने उनके बजाय मनमोहन सिंह को क्यों चुना और वह इससे कैसे निपटे? उन्होंने पहले वित्त मंत्री पद क्यों ठुकराया और फिर पांच साल बाद उन्होंने क्यों स्वीकार किया और इतनी गड़बड़ी क्यों की? उन्होंने हामिद अंसारी के बजाय खुद को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाने के लिए सोनिया गांधी पर कैसे दबाव बनाया? अतीत से लागू होने वाले कराधान संबंधी खराब विरासत को वह कैसे उचित ठहराते हैं? 
 
उनका दावा है कि उन्होंने 2004 में सोनिया गांधी से कहा था कि वह वित्त मंत्रालय नहीं चाहते तो फिर 2009 में उन्होंने यह पद क्यों स्वीकार किया? जबकि पहले उन्होंने यही कह कर पद लेने से इनकार किया था कि उनकी और मनमोहन सिंह की आर्थिक दृष्टिï भिन्न है। चिदंबरम के साथ अपने मतभेदों पर वह कहते हैं, 'मैं रूढि़वादी था और सुधारों को अर्थव्यवस्था में चरणबद्घ ढंग से लाने का हामी था जबकि चिदंबरम उदारवाद के समर्थक और बाजार समर्थक हैं।' एक अन्य जगह वह कहते हैं कि सन 1997 में चिदंबरम ने स्वप्निल बजट तो पेश किया लेकिन आंकड़ों में मार खा गए। 
 
सवाल यही है कि मनमोहन के साथ मतभेद के चलते एक बार नकारने के बाद वह पांच साल पश्चात वित्त मंत्री बनने को तैयार क्यों हो गए। उन्होंने चिदंबरम का स्थान लिया जबकि उनसे भी उनके मतभेद थे। बतौर वित्त मंत्री उनका कार्यकाल त्रासद रहा। वृद्घि रुक गई और तब से अब तक सुधार नहीं हुआ है। उन्होंने एफएसडीसी, एफएसएलआरसी, डीटीसी, ऋण प्रबंधन कार्यालय जैसी जो भी शुरुआत कीं वे सब अधूरी रहीं। उन्होंने तब के गवर्नर सुब्बाराव के साथ मतभेद भी नहीं छिपाए हैं। स्पष्टï है कि वह वित्त मंत्रालय में सुपर रेग्युलेटर बनाने के इच्छुक थे और देश में मौद्रिक और नियामक संस्थानों का शक्ति संतुलन बदलना चाहते थे। मनमोहन इससे असहमत थे। वह फिर भी आगे बढ़े और विफल रहे।
 
वह कुछ अहम घटनाओं के बारे में चर्चा से बचते दिखे। सबसे अहम है घोटाले और 2जी घोटाले को लेकर उनके कार्यालय और प्रधानमंत्री कार्यालय के बीच घटी घटनाएं। उन्होंने 278 पन्नों की किताब में उस घटना का जिक्र तक नहीं किया है जब वह दिल्ली हवाई अड्डे पर काले धन के मुद्दे पर बाबा रामदेव से मिलने गए थे। यह बहुत गलत कदम था और सरकार के लिए बड़ी शर्मिंदगी। उनके प्रशंसकों को भी उनका यूं झांसे में आ जाना रास नहीं आया। 
 
कई बार उनको वह नहीं मिला जिसका वह खुद को अधिकारी मानते थे। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उनको प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया गया। 2004 में सोनिया गांधी ने उन पर भरोसा नहीं किया और पसंदीदा गृह मंत्रालय नहीं सौंपा। सन 2007 में उन्हें राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार नहीं बनाया और 2012 में उन्होंने कोई कसर उठा न रखी तब जाकर उनका नामांकन हुआ। कुछ घटनाएं हैं जो बताती हैं कि वह भी एक साधारण मनुष्य हैं।  2 जून 2012 को वह सोनिया गांधी के साथ एक मुलाकात से पीछे हट गए। चर्चा थी कि वह मनमोहन को राष्ट्रपति बनवाने और उनको प्रधानमंत्री बनवाने वाली हैं। मुखर्जी कहते हैं, 'मैंने सुना था कि कौशांबी हिल्स में छुट्टिïयों के दौरान उन्होंने इस बारे में गंभीरता से सोचा।' बाद में जब उन्होंने सुषमा स्वराज को चेताकर लोकसभा में शांति कायम की तो सोनिया ने उनसे कहा, 'इसीलिए आप राष्ट्रपति नहीं हो सकते।'
 
वह लिखते हैं कि एम जे अकबर उनके राष्ट्रपति पद के नामांकन के लिए भाजपा में मेहनत कर रहे थे। वह 27 मई, 2012 को प्रणव दा से मिलने आए और उन्हें बताया कि आडवाणी और जसवंत सिंह दोनों उनके समर्थन में हैं। उन्हें लगा था कि उनका चुनाव सर्वसम्मति से होगा। पता नहीं उन्होंने अपनी पार्टी को भाजपा से समर्थन जुटाने के बारे में बताया था या नहीं। आप समझ ही सकते हैं क्या प्रतिक्रिया होती? वह बताते हैं कि कैसे बाला साहब ठाकरे के समर्थन के बाद उनसे मिलकर धन्यवाद देने पर कैसे सोनिया गांधी और अहमद पटेल बुरी तरह नाराज हो गए। चूंकि वह खुद को संगठन का आदमी कहते हैं तो यह पूछना बनता है कि क्या 2012 में यह एक कांग्रेसी नेता जैसा व्यवहार था?
 
वह कहते हैं कि मनमोहन, सोनिया, चिदंबरम और कपिल सिब्बल के कहने के बावजूद वह पिछली तारीख से लागू होने वाली कर व्यवस्था पर अड़े रहे। उन्होंंने लिखा कि एक वरिष्ठï साथी वोडाफोन के एक अधिकारी के साथ उनके घर आए। वह गर्व से कहते हैं कि उनके बाद पांच साल में कोई वित्त मंत्री उस प्रावधान को हटा न सका। परंतु किसी ने उस पर पहल भी नहीं की। बहरहाल, वह कह चुके हैं कि वह नियंत्रित निजाम के पक्षधर हैं। सन 1991 में वह व्यवस्था त्यागने वाले प्रधानमंत्री के कार्यकाल में ऐसी व्यवस्था का क्या काम? सही आकलन के लिए एक निष्पक्ष जीवनी लेखक की जरूरत होगी। 
Keyword: pranab mukherjee, congress,,
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