बिजनेस स्टैंडर्ड - नए संवत में क्या हैं संभावनाएं?
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नए संवत में क्या हैं संभावनाएं?

नितिन देसाई /  October 26, 2017

अगर वित्त वर्ष 2018 की दूसरी तिमाही में भी जीडीपी की वृद्घि दर 7 फीसदी से कम बनी रहती है तो संवत 2074 को लेकर बहुत सुनिश्चित पूर्वानुमान नहीं लगाए जा सकते। विस्तार से बता रहे हैं नितिन देसाई 

 
संवत 2073 समाप्त हो गया है और संवत 2074 की शुरुआत हो चुकी है। यह वर्ष का वह समय है जब हम अतीत का आकलन करते हैं और भविष्य पर विचार करते हैं। दीवाली के अवसर पर कई कारोबारियों ने अपने बीते वर्ष के खाते बंद किए होंगे और नए साल के बही खाते खोलने के लिए चौपड़ पूजन किया होगा। पता नहीं इस दीवाली पर यह रस्म करने वालों के दिलोदिमाग में क्या चल रहा होगा? 
 
पिछले संवत वर्ष की शुरुआत कारोबारियों के लिए एक धमाके के साथ हुई थी। दीवाली के ठीक 9 दिन बाद उनका सामना नोटबंदी से हुआ। उसके करीब आठ महीने बाद वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के रूप में उनको दूसरा झटका लगा। क्या सरकार संवत 2073 में कारोबारियों को लगने वाले इन झटकों को लेकर थोड़ी अलग तैयारी कर सकती थी ताकि कारोबारी जगत के लोगों पर इतना बुरा असर न होता?
 
उदाहरण के लिए नोटबंदी की बात करें तो उच्च मूल्य वर्ग के नोटों को चलन से बाहर करने की जरूरत थी ऐसा सब मानते हैं। स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक के प्रमुख रहे पीटर सैंड्स ने हॉर्वर्ड केनेडी स्कूल के लिए लिखे एक पर्चे में दलील दी कि जी7 और जी20 देशों को मिलजुलकर काम करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से कर वंचना, वित्तीय अपराध, आतंकियों को धन मुहैया कराने वालों और भ्रष्टïाचार करने वालों के लिए मुश्किल पैदा की जा सकती है। बिना उच्च मूल्य के नोटों के अवैध गतिविधियों में लगे लोगों के पकड़े जाने का जोखिम बढ़ जाएगा, इससे उनका कारोबारी मॉडल प्रभावित होगा। 
 
गत वर्ष 8 नवंबर को हुई नोटबंदी का प्राथमिक उद्देश्य यही था कि अर्थव्यवस्था में उच्च मूल्य की नकदी को समाप्त कर दिया जाए जिससे ऐसा करने वालों को समस्या खड़ी हो। इसके लिए रातोरात 1,000 और 500 रुपये के नोट का चलन बंद करना आवश्यक नहीं था। 2,000 रुपये का नोट लाने की जरूरत तो बिल्कुल नहीं थी। इसके बजाय यह भी किया जा सकता था कि जब ये नोट बैंक में आ जाते तो इनको वहां से वापस चलन में न भेजा जाता। ऐसा करके भी धीरे-धीरे इनका चलन बंद किया जा सकता था। तब वैसी अफरातफरी नहीं मचती। यूरोपीय केंद्रीय बैंक ने मई 20167 में 500 यूरो का नोट चलन से हटाने का इरादा जताया था और उसने यही तरीका अपनाया। डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने और कर दायरा बढ़ाने जैसे अन्य उपाय तो बाद में बचाव के लिए जोड़े गए। इन्हें भी अपेक्षाकृत अधिक सहजता से लागू किया जा सकता था। जुलाई 2017 में जीएसटी का क्रियान्वयन थोड़ा अलग मामला था। इस पर लंबे समय से काम चल रहा था और मोटेतौर पर कारोबारियों और आर्थिक टीकाकारों ने इसकी सराहना ही की। दुर्भाग्यवश सरकार ने जल्दबाजी में काफी कुछ करने की कोशिश की। बाजार पर ऐसी कर व्यवस्था लागू की गई जिसके लिए वह तैयार ही नहीं था। अनौपचारिक लेनदेन, जाली बही खाते, नकद भुगतान का व्यापक इस्तेमाल आदि अनौपचारिक क्षेत्र की कुछ खास विशेषताएं हैं।
 
जीएसटी का पूरा क्रियान्वयन कुछ वर्षों का चरणबद्घ काम हो सकता था। इस वर्ष पूरा ध्यान एकल कर व्यवस्था और नाकों पर वस्तुओं के अबाध संचार पर केंद्रित किया जा सकता था। पंजीयन की आवश्यकता, रिटर्न फाइल करना और आकलन का काम अधिकांश कारोबारों के लिए पुरानी वैट व्यवस्था के तर्ज पर हो सकता था। इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम और इनवॉयस के लिए स्वचालित मैचिंग का काम भी दो-तीन वर्षों में चरणबद्घ ढंग से लागू किया जा सकता है। ऐसा करने से कर वंचना और झूठे दावों की गुंजाइश तो रहेगी लेकिन साथ ही यह जोखिम भी रहेगा कि जब व्यवस्था पूरी तरह काम करने लगेगी तो ऐसे लोग पकड़े जा सकेंगे।
 
कर ढांचे के सामान्यीकरण की आवश्यकता को पहचाना जा चुका है लेकिन जीएसटी में सामान्य कर दर को लेकर अगर हम किसी समझौते की प्रतीक्षा करते तो वह विभिन्न राज्यों के बीच आपसी बातचीत में ही उलझा रह जाता। बहरहाल, कई वस्तुओं पर ऊंची कर दर एक झटके की तरह आई क्योंकि अब बिल में दिखने वाली जीएसटी दर में उत्पाद शुल्क और बिक्री कर दोनों शामिल होते हैं। बड़ी समस्या यह है कि ऊंची दरों के चलते रिटर्न भी भारी भरकम होंगे। अतीत में बिना बिल की बिक्री से होने वाला लाभ केवल बिक्री कर के बराबर होता था अब यह ज्यादा होगा। यह भी संभव है कि नोटबंदी और जीएसटी दोनों केा ही उन कारोबारी चिंताओं के लिए भी जिम्मेदार ठहराया जा रहा हो जो अन्य वजहों से सामने आ रही हैं। मिसाल के तौर पर मांग में धीमी वृद्घि, उच्च वास्तविक ब्याज दर, अचल संपत्ति क्षेत्र की गलत गतिविधियां दूर करने के लिए उठाए जा रहे कदम, दूरसंचार और इन्फोटेक क्षेत्र में सामने आ रही दिक्कतें और चीनी आयात से मिल रही चुनौती। परंतु एक कठिन कारोबारी माहौल में नोटबंदी और जीएसटी के कारण उत्पन्न उथलपुथल को कम करना फायदेमंद होता। 
 
फिलहाल कारोबारी चक्र का मिजाज क्या कहता है? आरबीआई के एक हालिया सर्वेक्षण के मुताबिक कारोबारी अनुमानों का सूचकांक वर्ष 2017-18 की पहली तिमाही के 105.4 से गिरकर दूसरी तिमाही में 103.6 पर आ गया। इसी अवधि में उपभोक्ताओं के आत्मविश्वास का सूचकांक भी 96.8 से गिरकर 95.5 पर आ गया। जबकि मुद्रास्फीति का अनुमान बढ़ा है। ऑर्डर बुक इससे पिछली तिमाही से तो कम है लेकिन एक वर्ष पहले की तुलना में कहीं अधिक बेहतर है। 
 
जॉन केनेथ गालब्रेथ ने कहा था कि आर्थिक अनुमान जताने की प्रक्रिया का इकलौता काम है भविष्यवाणी के काम को सम्मानजनक बनाना। यानी भविष्यवाणी के तौर पर कहा जाए तो कहा जा सकता है कि हमें नवंबर के अंत तक इंतजार करना चाहिए क्योंकि उस वक्त सीएसओ जीडीपी की जुलाई-सितंबर 2017 की वृद्घि दर के अनुमान के वास्तविक आंकड़े प्रस्तुत करेगा। अगर यह वृद्घि 6 फीसदी के नीचे रहती है तब चिंता की बात है। अगर यह 6 और 7 फीसदी के बीच है तो संभावनाएं अनिश्चित हैं और अगर यह 7 फीसदी से ज्यादा होती है तो हम सहजता से यह कह सकते हैं कि हम सुधार की ओर अग्रसर हैं।  मैं उम्मीद करता हूं कि संवत 2074 में लोगों को और अधिक नीतिगत झटके न झेलने पड़ें। 
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