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मानव विकास पर नए सिरे से विचार

पार्थसारथि शोम /  October 25, 2017

नए भारत के निर्माण के लिए नीतिगत क्रांति की आवश्यकता आन पड़ी है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं पार्थसारथि शोम 

 
हाल ही में मैंने यह लिखा था कि कैसे सन 1980 के दशक से देश में आय के वितरण की स्थिति खराब होती जा रही है और आय का सबसे अधिक हिस्सा आय के वितरण के शीर्ष पर मौजूद 0.001 फीसदी लोगों के पास सीमित है। मैंने यह भी लिखा था कि हमारा देश जलवायु परिवर्तन के जोखिम और सालाना मौत के असंगत आंकड़ों के हिसाब से चौथा सबसे अधिक जोखिम वाला देश है। इससे पहले मैंने किसानों की आत्महत्या के मसले पर भी लिखा और यह भी कि हम कितने सहनशील बन चुके हैं। 
 
अब जबकि संयुक्त राष्ट्र मानव विकास रिपोर्ट (यूएनएचडीआर) ने एक बार फिर से यह दोहराया है कि सन 2030 तक 17 सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने की कोशिश की जाएगी। इसे भारत समेत 193 देशों का समर्थन हासिल है। उन्होंने यह भी माना है कि विभिन्न समूह अभी भी मूलभूत वंचन और अवरोधों से जूझ रहे हैं। यह भी कि हर किसी के लिए मानव विकास उपलब्ध नीतिगत विकल्पों की मदद से हासिल किया जा सकता है। भारत अगर इस प्रतिबद्घता को पूरा करना चाहता है तो उसके पास अभी 13 वर्ष का समय है। उम्मीद की जानी चाहिए कि वह केवल इसमें शिरकत नहीं कर रहा है बल्कि इसे पूरा करने का भी इच्छुक है। 
 
यूएनएचडीआर के लक्ष्यों को हासिल करने की कोशिश में यह बात ध्यान में रखी जानी चाहिए कि इस दौरान न केवल असमानता को खत्म करने और महिला-पुरुष समानता हासिल करने की दिशा में आगे बढऩा है बल्कि यह भी तय करना है कि कोई पीछे न रह जाए। इस क्रम में अत्यधिक गरीबी को खत्म करना, भूख से निजात पाना और इन सब प्रक्रियाओं को स्थायी बनाना शामिल है। जाहिर सी बात है कि ये तमाम लक्ष्य असमानता समाप्त करने की प्रक्रिया से कहीं आगे के हैं। इसमें अत्यधिक गरीबी और भूख आदि से निपटने जैसी तमाम बातें शामिल की गई हैं। 
 
हमारे देश के सामने यह बहुत बड़ी चुनौती है। फिलहाल मानव विकास सूचकांक के मोर्चे पर हमारा देश कई देशों के बीच स्थिति है। निश्चित तौर पर अगर इस दिशा में कोई तुलनात्मक अध्ययन किया गया तो वह आंखे खोल देने वाला होगा। पहली बात, तमाम अन्य अंतरराष्ट्रीय तुलनाओं की तरह भारत की समग्र रैंकिंग यहां भी कम है। मानव विकास सूचकांक में दर्ज 188 देशों के बीच भारत को 131वां स्थान हासिल है। कुछ अन्य ब्रिक्स देशों की बात करें तो ब्राजील और चीन को क्रमश: 79वां और 90वां स्थान हासिल है। मानव विकास सूचकांक में आय, शिक्षा और जीवन संभाव्यता का एक खास सम्मिश्रण शामिल है जिसे रिपोर्ट के तकनीक नोट में स्पष्टï किया गया है। एकता के क्षेत्र में हमारे सबसे ज्यादा अंक हैं। इस मोर्चे पर नॉर्वे के 0.95 अंक तथा ब्राजील, चीन और भारत के क्रमश: 0.75, 0.74 और 0.62 अंक हैं। 
 
इसके अलावा वर्ष 2010-15 के दौरान इस सूचकांक में भारत स्थिति सुधार के मामले में ब्राजील और चीन के पीछे था। भारत ने इस अवधि में चार स्थान का सुधार किया जबकि ब्राजील ने 7 और चीन ने 11 स्थानों का सुधार किया। ब्राजील में आय के वितरण की कमजोरी से सभी अवगत हैं और अब भारत ब्राजील को पार कर गया है। एटकिंसन के असमानता सूचकांक के आधार पर देखें तो नॉर्वे के 5.4 अंक, ब्रिटेन के 7.8 अंक, अमेरिका के 12.9 अंक, ब्राजील के 25 अंक और भारत के 26.5 अंक हैं। इस संबंध में चीन के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। एक बार सीएचआई को अगर मानव विकास सूचकांक में समायोजित कर दिया जाए तो इस असमानता समायोजित मानव विकास सूचकांक (आईएचडीआई) में भारत 27.2 अंकों के साथ सबसे बड़े प्रतिशत नुकसान का भागी है। यहां तक कि ब्राजील भी 25.6 अंक के साथ भारत से बेहतर स्थिति में है। भारत का मानव विकास सूचकांक मूल्य नॉर्वे की तुलना में एक तिहाई है। जबकि कहीं अधिक मूल्यवान आईएचडीआई मूल्य नॉर्वे के आधे के बराबर है। बहरहाल, पिकेटी के हालिया निष्कर्ष की आलोचना संभव है जिसमें उन्होंने देश में आय के वितरण की बिगड़ती स्थिति का जिक्र किया है। हालांकि वे निष्कर्ष संयुक्त राष्ट्र की बातों को ही पुष्टï करते हैं। 
 
यूएनएचडीआर गरीबी की तीव्रता को भी हमारे सामने लाता है। वह इसके लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और आय जैसे घटकों की विविधतापूर्ण अवधारणा का इस्तेमाल करता है। इस आधार पर किया गया आकलन बताता है कि देश की 33 फीसदी आबादी इन चीजों से वंचित है जबकि 50 फीसदी या उससे अधिक आबादी में इनकी भारी कमी है। ब्राजील, चीन और दक्षिण अफ्रीका के परिणाम जहां 2012-14 की जानकारी पर आधारित हैं, वहीं भारत में यह एक दशक पुराना मामला है। जाहिर है इनकी आपस में तुलना संभव नहीं। परंतु एक दशक में वैसे अंतर भर नहीं सकते जैसे संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में सामने आए हैं। ब्राजील, चीन, दक्षिण अफ्रीका और भारत में बहुआयामी गरीब आबादी का प्रतिशत क्रमश: 2.4, 5.2, 10.3 और 55.3 है। गहन गरीबी के आंकड़े क्रमश: 0.3, 1.0, 1.3 और 27.8 फीसदी है। 
 
इन आंकड़ों से भारत की हकीकत समझी जा सकती है। इसे देखते हुए एक बात तो स्पष्टï है कि हम अपनी आंखें बंद नहीं रख सकते। इसके बजाय हमें ऐसी नीतियां बनानी होंगी जो इसमें सुधार ला सकें। सवाल यह है कि देश के 60 फीसदी निचले स्तर के लोगों को कैसे चिह्निïत कर प्राथमिकता में ला सकते हैं और उनको गरीबी से उबारने के लिए कैसे स्पष्टï कर-व्यय नीतियां बना सकते हैं? इस क्रम में सुसंगत जनसंख्या नीति, करदाताओं के पंजीयन का तेज विस्तार करना बजाय कि सार्वजनिक संसाधनों को व्यय करने के, नए बने कर दायरों के तहत बेहतर आय कर, 60 करोड़ रुपये से ऊपर की अचल और वित्तीय संपत्ति पर संपत्ति कर को नए सिरे से लागू करना, आय, संपत्ति और जमीन का जरूरत पडऩे पर संविधान संशोधन के जरिये व्यापक पुनर्वितरण करना और निजी क्षेत्र की कारोबारी सामाजिक उत्तरदायित्व में कई गुना इजाफा करना आदि कुछ ऐसे काम हैं जिन पर नई नीति बनाने वालों को ध्यान देना चाहिए।  अगर देश को सतत विकास और गरीबी निवारण की अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्घताओं को हासिल करना है तो उसके पास केवल 13 वर्ष का समय शेष है। 
Keyword: india, economy, poverty,,
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