बिजनेस स्टैंडर्ड - समाप्त होगा अर्थव्यवस्था में तेजी का दौर
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समाप्त होगा अर्थव्यवस्था में तेजी का दौर

आकाश प्रकाश /  October 24, 2017

वैश्विक अर्थव्यवस्था और बाजार इस समय ऐसी स्थिति में हैं कि वे ब्याज दर में इजाफे और प्रोत्साहन के समापन को संभाल सकते हैं।  बाजार में तेजी का दौर भी खत्म होने की संभावना है। बता रहे हैं आकाश प्रकाश

 
आखिरकार सस्ती पूंजी और अपारंपरिक मौद्रिक नीति का दौर खत्म होता दिख रहा है। अमेरिका में पहले ही दरें बढ़ाने का काम शुरू हो गया है। अमेरिका में आर्थिक प्रोत्साहन भी अब समाप्त होना है क्योंकि उसका असर फेडरल रिजर्व की बैलेंस शीट पर पड़ रहा है। ब्रिटेन में ब्याज दरें बढ़ेंगी और यूरोपीय केंद्रीय बैंक अपने आर्थिक प्रोत्साहन को खत्म करने की प्रक्रिया कभी भी शुरू कर सकता है। केवल जापान में केंद्रीय बैंक प्रोत्साहन जारी रखेगा। वैश्विक स्तर पर आर्थिक प्रोत्साहन या परिसंपत्ति खरीद की प्रक्रिया मोटे तौर पर 2018 की चौथी तिमाही तक समाप्त हो जाएगी। 
 
पहली नजर में सहज मुद्रा का जाना डराने वाली बात लगती है। वित्तीय संकट के बाद से ही हम सबने अप्रत्याशित मौद्रिक परिस्थितियों का सामना किया है। कई निवेशक तो यह भूल ही चुके हैं कि सामान्य मौद्रिक और ब्याज दर व्यवस्था क्या और कैसी होती है? वे भूल गए हैं कि पूंजी की अपनी लागत होती है। मौद्रिक नीति चक्र में बदलाव को अधिकांश विश्लेषकों ने वर्ष 2018 में वैश्विक वित्तीय बाजार के लिए सबसे बड़ा जोखिम बताया है। मौद्रिक समायोजन की अप्रत्याशित और अपारंपरिक प्रकृति को देखते हुए कहा जा सकता है कि ऐसी कोई नजीर नहीं है जिसके आधार पर बाजार और वास्तविक अर्थव्यवस्था के उस प्रदर्शन का आकलन किया जा सके जो प्रोत्साहन समाप्त होने के बाद हमारे सामने होगा। प्रोत्साहन का समापन उलटा भी पड़ सकता है। हो सकता है यह प्रक्रिया बहुत धीमी हो और इस बीच मुद्रास्फीति दोबारा पकड़ बना ले। 
 
मौजूदा मौद्रिक सख्ती को लेकर अच्छी बात यह है कि यह आर्थिक गतिविधियों के सामान्य होने के पश्चात की जा रही है। वैश्विक अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है। यह काम मजबूरी में नहीं किया जा रहा है। दुनिया की किसी बड़ी अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति चिंता का विषय नहीं है। अतीत में ऐसा वक्त आया है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था को ऊंची दरों ने नुकसान पहुंचाया है। यह वह दौर था जब मुद्रास्फीति के दबाव में दरों में अचानक इजाफा किया गया था। सख्ती के दौर में जहां मुद्रास्फीति की स्थिति नियंत्रण में हो, वहां मौद्रिक नीति में बदलाव का व्यापक आर्थिक वृद्घि पर बहुत सीमित प्रभाव होता है। अगर यह रुझान जी-7 देशों की अर्थव्यवस्थाओं की मौद्रिक नीति बदलाव पर प्रभाव रखता है वह प्रबंधन योग्य होगा। राहत की बात यह भी है कि हम पहले ही नीतिगत सामान्यीकरण की ओर कुछ कदम उठा चुके हैं और बाजार और अर्थव्यवस्था दोनों ने इसे स्वीकार भी किया है।
 
वर्ष 2013 में बाजार ने इसके खिलाफ मत जाहिर किया था। उस वक्त बेन बर्नान्के ने सबसे पहले कहा था कि फेड रिजर्व वित्तीय परिसंपत्तियों की खरीद की प्रक्रिया धीमी कर रहा है। तब 10 साल के बॉन्ड का प्रतिफल 2 फीसदी से बढ़कर 3 फीसदी हो गया था और कई उभरते बाजार दबाव में आ गए थे। यह आशंका थी कि अगर मौद्रिक समायोजन में बदलाव की कोई बात की गई तो बाजार ऐसी ही प्रतिक्रिया देगा। परंतु फेडरल रिजर्व आगे बढ़ा और उसने दरें  बढ़ाईं। उसने आर्थिक प्रोत्साहन समाप्त करने की स्पष्ट समयसीमा का भी उल्लेख किया। इस बीच बाजार स्थिर बने रहे। भारत की बात करें तो वह बाजार की प्रतिक्रिया के जोखिम से उबर चुका है। इस दिशा में शुरुआती कदम बिना किसी झटके के उठाए जा चुके हैं। यह भी सच है कि मौद्रिक सामान्यीकरण की गति का आकलन पूरी दुनिया में किया जाएगा। अमेरिका में मौद्रिक कड़ाई का मौजूदा दौर चरणबद्ध रहा है। नीति निर्माताओं को बाजार अस्थिर करने का कोई प्रोत्साहन नहीं है। उन्होंने अतिरिक्त प्रयास करके निवेशकों को आश्वस्त किया है कि मौद्रिक नीति समायोजन को खत्म करने से कोई दिक्कत नहीं होगी। चरणबद्घ तरीके का अर्थ है नीतिगत समायोजन की गुंजाइश बनी रहेगी जबकि दरें बढ़ती रहेंगी।
 
इस बात की भी काफी संभावना है कि मौद्रिक सख्ती का आकार पहले दी गई राहत से काफी कम होगा। कई निवेशकों को यकीन है कि वास्तविक ब्याज दर में कमी आई है। मुद्रास्फीति में भी बहुत अधिक इजाफे की उम्मीद नहीं है। इसलिए नॉमिनल नीतिगत दर भी घटी है। कई अर्थशास्त्री मानते हैं कि अमेरिका और ब्रिटेन में तटस्थ नॉमिनल नीतिगत दर क्रमश: 2.5 फीसदी और यूरोपीय संघ में 1.5 फीसदी है। अमेरिका में मौजूदा नीतिगत दर 1-1.25 फीसदी और यूरोपीय संघ में शून्य है। ऐसे में हमें 150 आधार अंक से अधिक सख्ती की आवश्यकता नहीं है। उतने भर से हम नई संतुलित दर हासिल कर सकते हैं। अधिकांश पर्यवेक्षक मानते हैं कि नॉमिनल तटस्थ दर संकट से पहले 4.5 फीसदी के स्तर पर थी। जिस प्रकार नीतिगत दर संकट पूर्व के स्तर पर नहीं जाती है उसी तरह केंद्रीय बैंकों की बैलेंस शीट भी पूरी तरह सामान्य होती नहीं दिखती। अगर बर्नान्के तथा केंद्रीय बैंकों के अन्य नेताओं की टिप्पणियों का अध्ययन किया जाए तो ऐसा लगता है कि केंद्रीय बैंकों की कम से कम आधी बैलेंस शीट पलट जाएगी। बची हुई प्रतिभूति कागजों में रहेगी जिसे नकदीकृत किया जा सकता है। वैश्विक स्तर पर सकल कर्ज का स्तर अपने उच्चतम स्तर पर है। इसमें सरकारी कर्ज, विभिन्न तरह के प्रोत्साहन आदि की भूमिका है। इससे यह संकेत मिलता है कि सहज नीतिगत सख्ती की बदौलत इसे प्रबंधनीय स्तर पर रखा जा सकता है। 
 
बढ़ती दरों के कुछ अन्य लाभ भी हैं। बचतकर्ताओं को अच्छा प्रतिफल मिलता है जिसे वे अपनी इच्छा से व्यय कर सकते हैं। ईयू, अमेरिका और ब्रिटेन में कुल बचत 180 खरब डॉलर तक हो सकती है। अगर इस बचत पर एक फीसदी का ब्याज मान लिया जाए तो इससे 180 अरब डॉलर की राशि प्राप्त होगी। बॉन्ड प्रतिफल में इजाफे से भी पेंशन फंड की व्यवहार्यता मजबूत होती है। बिना फंडिंग का हिस्सा बॉन्ड प्रतिफल के रूप में रह जाएगा जिसका इस्तेमाल भविष्य की देनदारियों पर रियायत के रूप में होगा। इससे कंपनियों पर नई पूंजी डालने का दबाव कम होगा। 
 
नीतिगत व्यवस्था के सामान्यीकरण के अपने जोखिम हैं, खासतौर पर कम आधार को देखते हुए लेकिन अंदाजा यही है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और बाजार दरों में बढ़ोतरी और आर्थिक प्रोत्साहन को संभाल सकते हैं। कुछ झटके लग सकते हैं लेकिन सस्ती मुद्रा की समाप्ति शायद वैश्विक बाजार में तेजडिय़ों के लिए उत्प्रेरक न बने। निश्चित तौर पर बाजार में तेजी का दौर समाप्त होगा। बहरहाल उसकी जो वजह होगी, संभवत: आज उसके बारे में कोई नहीं सोच रहा है। 
Keyword: india, economy, IIP, market,,
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