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आबे की जीत

संपादकीय /  October 24, 2017

जापान की राजनीति पर करीबी नजर रखने वाले लोग अक्सर 'आबे पहेली' का जिक्र करते रहे हैं। टोक्यो स्थित टेंपल विश्वविद्यालय के जेफ किंगस्टन कहते हैं कि आबे मतदाताओं के बीच अलोकप्रिय होने के बावजूद एक के बाद एक चुनाव जीत रहे हैं और यही पहेली है। रविवार को हुए चुनाव में मिली शानदार जीत में आबे के नेतृत्व वाली लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी और उसके गठबंधन सहयोगियों को संसद में दो तिहाई से अधिक बहुमत हासिल हुआ। यह बात भी उस पहेली को और अधिक रेखांकित करती है। पिछले दिनों आबे की सार्वजनिक स्वीकृति की रेटिंग में उल्लेखनीय गिरावट आई और वह 30 फीसदी से नीचे चली गई। इसके अलावा छोटे मोटे कांड और राजनीतिक शर्मिंदगी के माहौल के चलते उन्हें अचानक चुनाव कराने पड़े। आबे इस बात से अवगत थे कि किबोउ नो तो (उम्मीद की पार्टी) नामक नए दल के छत्र तले सारे विपक्षी दल एकजुट हो रहे हैं। इस दल का नेतृत्व टोक्यो की गर्वनर यूरिको कोइके के हाथ में था। आखिरकार आबे की अचानक चुनाव कराने की रणनीति काम आई और विपक्ष को हार का सामना करना पड़ा। विपक्षी दलों के पास खुद को संभालने का वक्त ही नहीं था। इससे मतदाता भ्रमित हो गए और उन्होंने स्थिरता की चाह में आबे को मत दिया।  यह जीत आबे के लिए एक बड़ी राजनीतिक उपलब्धि है। अगर वह सन 2021 तक सत्ता में बने रहते हैं तो वह जापान में सबसे लंबे समय तक पद पर रहने वाले प्रधानमंत्री बन जाएंगे। 

 
दूसरे विश्वयुद्घ के बाद से जापान में प्रधानमंत्रियों का औसत कार्यकाल दो वर्ष के करीब रहा है। वर्ष 2012 में उनके प्रधानमंत्री बनने से पहले के छह वर्ष में जापान में छह प्रधानमंत्री हुए। इसमें खुद आबे का एक साल का कार्यकाल भी शामिल है। बहरहाल, उन्होंने डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ जापान (तत्कालीन नाम) को छोड़ दिया और वर्ष 2012 में वह राष्ट्रीय नवीनीकरण के नारे के साथ दोबारा सत्ता में आए। उनके इस राष्ट्रीय नवीनीकरण में आर्थिक बदलाव भी एक अहम तत्त्व था। वह इस मोर्चे पर मोटे तौर पर सफल भी रहे। अर्थव्यवस्था में लगातार छह तिमाहियों से वृद्घि दर्ज की जा रही है। पिछले एक दशक में ऐसा पहली बार हुआ है। इससे रोजगार उत्पन्न हुए हैं, बेरोजगारी सन 1990 के दशक के मध्य से अपने अब तक के निम्रतम स्तर पर है और शेयर बाजार के 21 वर्ष के उच्चतम स्तर पर पहुंचने से उसके आशावाद का अंदाजा भी लगाया जा सकता है। 
 
राष्ट्रीय नवीनीकरण का एक अन्य अहम पहलू है जापान के शांत प्रकृति वाले संविधान में बदलाव। अप्रत्याशित रूप से भारी बहुमत मिलने के बाद आबे के लिए यह संभव है कि वह जापान की सेना में नई जान फूंकने की अपनी महत्त्वाकांक्षा को आगे बढ़ा सकें। यह बदलाव बहुत बुरा भी नहीं होगा क्योंकि एशिया प्रशांत क्षेत्र में तस्वीर एकदम साफ होती जा रही है। शी चिनफिंग के नेतृत्व में चीन अपना दबदबा बढ़ाने की मंशा स्पष्टï रूप से जाहिर कर रहा है। उत्तर कोरिया का कोई भरोसा नहीं है और वह भी जापान को भड़काने की कार्रवाई जारी रखे हुए है। अमेरिका का पराभव हुआ है। भारत की बात करें तो आबे का सत्ता में मजबूती से वापस आना कई वजहों से बेहतर है। जापान ने उनके नेतृत्व में खुलकर भारत का साथ दिया है। चीन के साथ डोकलाम विवाद के अवसर पर भी हमें उसका साथ मिला। जापान की राजनीतिक स्थिरता इस क्षेत्र में भारत के लिए बेहतर होगी। इसके अलावा भारत भी इस रिश्ते को मजबूती देता हुआ आगे बढ़ सकता है क्योंकि रक्षा, व्यापार और बुनियादी ढांचागत क्षेत्र में आबे विश्वसनीय साथी साबित हुए हैं।
Keyword: india, japan, economy, defense,,
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