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वायु प्रदूषण की समस्या से संभव है निजात पाना

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  October 23, 2017

सर्दियां करीब आ रही हैं और ठंड अपने साथ मौसम में बदलाव लाएगी। हवा में घुले प्रदूषक तत्त्व हमारे और करीब आ जाएंगे। दीवाली अभी हाल ही में गुजरी है लेकिन फिर भी इस वर्ष मुझे उम्मीद है कि सांस लेना अपेक्षाकृत आसान रहेगा। यह सवाल उठ रहा होगा कि मैं ऐसा क्यों कह रही हूं? आइए जरा जायजा लेते हैं कि हमने क्या किया है और हवा को स्वच्छ रखने के लिए आगे क्या कुछ किया जाना चाहिए?

 
सबसे पहले बात करते हैं जन जागरूकता की। यह अपने आम में बहुत अहम है और निष्क्रियता तथा सक्रियता के बीच का अंतर इससे तय होता है। मेरा मानना है कि आज वायु प्रदूषण व्यापक चिंता का विषय है। बीती सर्दियों में जन स्वास्थ्य को लेकर एक तरह की आपात स्थिति निर्मित हो गई थी। उस वक्त प्रदूषण का स्तर पूरी तरह नियंत्रण से बाहर हो गया था। प्रदूषक तत्त्वों के हमारे शरीर पर असर को सीधी तरह समझने में भी मदद मिली लेकिन इसका हमारे शरीर के साथ संबंध कायम करना कठिन था। उदाहरण के लिए मरती हुई नदियों का संबंध हम अपने घरों के नलों से आसानी से नहीं जोड़ सकते। अगर हम ऐसा करते भी हैं तो घरों में वाटर फिल्टर लगाने का विकल्प तो है ही या फिर बोतलबंद पानी खरीदने का। जाहिर है हम बदलाव के बारे में नहीं सोचते। 
 
परंतु वायु प्रदूषण सामाजिक स्तर पर बहुत बड़े समानता स्थापित करने वाले कारक की भूमिका निभाता है। जैसा कि मैंने पहले भी लिखा है, आप जितने चाहे उतने एयर प्यूरीफायर स्थापित कर दें लेकिन आपको सांस तो लेनी ही होगी। इसके अलावा प्रदूषकों की प्रवृत्ति इतनी तेजी से बढऩे की होती है कि हमारे घरों के एयर प्यूरीफायर उनके खतरनाक लक्षणों से नहीं निपट सकते। ऐसे में कदम उठाने जरूरी हैं। हम बदलाव की कोशिश इसलिए कर रहे हैं क्योंकि यह हमारे शरीर पर असर डाल रहा है, हमारे बच्चों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है। 
 
दूसरी बात, मुझे ऐसा लगता है कि ज्यादातर मौकों पर जरूरी कदम इसलिए विफल हो जाते हैं क्योंकि हम जरूरी कदम उठाने के बजाय कुछ और करने लगते हैं। हमारे पास ऐसा करने की तमाम वजहें भी रहती हैं। यह तथ्य है और हमें इसके बारे में सोचना चाहिए। गत वर्ष इस समय तक प्रदूषण हमारा दम घोंट रहा था। मेरे कई सहयोगियों ने स्मॉग (धुआं और धुंध) से निपटने की आपात योजना की बात की। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आगे बढ़ाई गई इस योजना को पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने जनवरी 2017 में अधिसूचित किया। इसे ग्रेडेड रिस्पॉन्स ऐक्शन प्लान (ग्रैप) का नाम दिया गया। इसमें छह प्रकार के कदमों का उल्लेख है जिनकी मदद से प्रदूषण के बढ़ते स्तर को थामा जा सकता है। इसे आपदा की चेतावनी देने वाली व्यवस्था के रूप में देखा जा सकता है जिसमें कहा गया है कि प्रदूषण स्तर बढऩे पर कौन से सख्त कदम उठाए जाने चाहिए। इस योजना का लक्ष्य है हर कदम पर क्रियान्वयन के लिए जी तोड़ मेहनत करना ताकि शहर को आपातकालीन स्थिति में पहुंचने से पहले संभाला जा सके।
 
इन जाड़ों में ग्रैप की तीसरे और चौथे स्तर की श्रेणी गत 17 अक्टूबर को लागू हो गई और यह फरवरी के अंत में या मार्च के मध्य में सर्दियों के समाप्त होने तक जारी रहेगी। ऐसा यह सुनिश्चित करने के लिए किया जा रहा है कि वायु प्रदूषण का स्तर 5वीं श्रेणी यानी आपात स्थिति तक न पहुंचे। योजना के मुताबिक निम्रलिखित कदम उठाए जा रहे हैं। पहला, बदरपुर ताप बिजली घर को बंद करना क्योंकि वह दिल्ली का प्रदूषण बढ़ाता है। दूसरा, एनसीआर में ईंट भ_ïे बंद करना क्योंकि वे नई साफ-सुथरी तकनीक अपनाने में नाकाम रहे हैं। तीसरा, दिल्ली में जेनरेटरों का इस्तेमाल बंद करना और चौथा, वायु प्रदूषण बढ़ाने वाले तमाम कारकों पर नजर रखना। इसमें विनिर्माण, सड़कों की धूल, कचरा जलाना और वाहनों से होने वाला प्रदूषण शामिल है। इसके लिए शीर्ष स्तर से निरंतर निगरानी करनी आवश्यक है। 
 
तीसरी बड़ी जीत यह है कि इस योजना के तहत क्षेत्र में प्रदूषण पर निगरानी रखने वाले केंद्रों की गहन स्थापना की जाएगी। जब ऐसा हो जाएगा तो अब तक के ज्ञात इतिहास में पहली बार हमें प्रदूषण का मोटा अनुमान लगाने का अवसर मिलेगा। हमें पता होगा कि कहां प्रदूषण का स्तर बढ़ रहा है और इस पर नियंत्रण कायम करने के लिए क्या स्थानीय कदम उठाए जाने चाहिए। चौथी सफलता यह है कि सर्वोच्च न्यायालय ने गत अप्रैल में ही यह जोर दिया कि बीएस 4 मानक वाले वाहन पेश किए जाएं। इससे भी प्रदूषण कम होगा। ट्रक वाहनों से होने वाले उत्सर्जन के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं, वे कम जहर उगलेंगे। बड़ी तादाद में ट्रकों की मौजूदगी के चलते भी हम स्वच्छ ईंधन का लाभ गंवा रहे हैं। फिर भी हालात में सुधार हो रहा है। 
 
पांचवां लाभ है निजी डीजल वाहनों की बिक्री में धीरे-धीरे आ रही गिरावट। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि राष्टï्रीय हरित पंचाट ने 10 वर्ष से पुराने ऐसे वाहनों पर रोक लगा दी है और डीजल और पेट्रोल के दामों का अंतर भी लगातार कम हो रहा है। उस दृष्टिï से देखा जाए तो अभी भी एजेंडा अधूरा ही है और आगे इस पर और ध्यान देने की आवश्यकता है। भारत पेट कोक और फर्नेंस ऑयल के रूप में बड़ी मात्रा में प्रदूषक ईंधन का आयात और इस्तेमाल करता है। देश में कार्बन उत्सर्जन खतरनाक और नियंत्रणहीन है। इसके बाद पड़ोसी राज्यों में फसल जलाने का मसला भी है। इस मसले से सावधानीपूर्वक निपटना होगा ताकि किसानों के पास विकल्प हों। इन विकल्पों में मशीन के इस्तेमाल से लेकर उक्त अवशेष की कीमत तय करने जैसी बातें शामिल हैं। हमें अपने वाहनों, फैक्टरियों और बिजली संयंत्रों को प्राकृतिक गैस जैसे स्वच्छ ईंधन में परिवर्तित करना होगा। बहरहाल, तथ्य यह है कि हमें पता है कि क्या किया जाना चाहिए। अगर हम इस समस्या पर अपना ध्यान बनाए रखें और जरूरी कदम उठाते रहें तो निश्चित रूप से प्रदूषण समाप्त होगा।
Keyword: environment, india, pollution,,
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