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आरबीआई की रिपोर्ट में दर्ज बैंकों की चालबाजी

देवाशिष बसु /  October 23, 2017

यह रिपोर्ट पिछले कुछ दिनों से रिजर्व बैंक की वेबसाइट पर है। परंतु मीडिया ने इसके महत्त्व को अब तक नहीं समझा है। इस संबंध में विस्तार से बता रहे हैं देवाशिष बसु 

 
उपभोक्ताओं से जुड़े मुद्दे नियामकीय प्राथमिकता में सबसे निचले पायदान पर आते हैं। यहां तक कि प्रख्यात अर्थशास्त्री और सार्वजनिक रूप से बुद्घिजीवी माने जाने वाले भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने भी अपने भाषणों में उपभोक्ता हित को लेकर सरसरी टिप्पणी ही की। यही वजह है कि मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि पिछले चार आलेखों से मैं बैंकों द्वारा फ्लोटिंग यानी घटने-बढऩे वाली ऋण दर के नाम पर की जा रही लूट को लेकर आरबीआई की एक आंतरिक समीक्षा रिपोर्ट में साम्य देखने को मिला। आरबीआई की यह रिपोर्ट सीमांत निधि लागत पर आधारित उधार दर (एमसीएलआर) के कामकाज की समीक्षा पर आधारित है। 
 
समूह की अध्यक्षता जनक राज ने की और यह रिपोर्ट आरबीआई की वेबसाइट पर मौजूद है। परंतु मीडिया ने इसके महत्त्व की अनदेखी की।  मैंने अपने पिछले आलेखों में यह कहा है कि जब ब्याज दरें बढ़ती हैं तो बैंक झटपट अपनी दरें बढ़ा देते हैं लेकिन जब दरों में कमी आती है तो बैंक ज्यादा से ज्यादा फायदा अपने पास रखने की कोशिश करते हैं।  वहीं अध्ययन समूह की शालीन भाषा को देखें तो उसमें कहा गया है, 'ऋण दर का पारेषण मौद्रिक नीति चक्र के दौरान एकदम असमान रहा। कड़ाई के दौर में यह ज्यादा और सहजता के दिनों में कम रहा। यह ब्याज दर व्यवस्था से भी अप्रभावित था।' 
 
जुलाई 2010 से मार्च 2012 के कड़ाई के चरण के दौरान रीपो दर से बकाया ऋण का स्तर 60 फीसदी रहा जबकि अप्रैल 2012 से जून 2013 के सहज स्तर के दौरान यह 40 फीसदी था। इसका मतलब यह हुआ कि सहजता के दिनों में ग्राहकों को 60 फीसदी का चूना लगाया गया। यह राशि नकदी में हजारों करोड़ रुपये की होगी।  चकित करने वाली बात है कि रिपोर्ट में कहा गया है, 'निजी क्षेत्र के बैंकों के मामले में कम एमसीएलआर दर को वास्तविक ऋण दर में पारेषित होने में छह महीने का वक्त लग गया। जबकि सरकारी बैंकों के मामले में यह काम छह महीने बाद भी पूरा नहीं हुआ था।'
 
अपने एक आलेख में मैंने कहा था कि फ्लोटिंग दर के आकलन में गड़बड़ी की गुंजाइश है। आरबीआई की रिपोर्ट में इस बारे में कहा गया है कि बैंक विशिष्टï तरीके का इस्तेमाल करते हुए आधार दर और एमसीएलआर का आकलन करने के बजाय तदर्थ तरीके से काम करते हैं। इससे या तो आधार दर बढ़ जाती है या फिर आधार दर निधि की लागत के अनुरूप नहीं रह जाती। 
 
इन तदर्थ समायोजन में निम्र बातें शामिल हैं, (1) निधि का असंगत आकलन (2) आधार दर में कोई बदलाव नहीं। बावजूद इसके कि जमा की लागत काफी कम हो (3) ऋण दर में जमा की लागत के प्रभाव की कमी नेटवर्थ पर प्रतिफल में तेज बढ़ोतरी को समतुल्य किया जा सके (4) आधार दर फॉर्मूला में नए घटक शामिल करना ताकि दरों को वांछित स्तर तक समायोजित किया जा सके। इससे जाहिर होता है कि कीमतों को जानबूझकर कृत्रिम तरीके से ऊंचा बनाए रखा गया और कर्जदारों को उनकी वैध बचत से वंचित किया गया। 
 
आरबीआई के अपने अध्ययन समूह ने ये बातें कही हैं। यहां आरबीआई की भूमिका क्या है? आरबीआई ने हमेशा उपभोक्ताओं के खिलाफ जाने वाले बैंकिंग व्यवहार की अनदेखी की? यह सच है कि सन 1999 के बाद से आरबीआई ने शनै: शनै: देश के बैंकों को उपभोक्ताओं के साथ मनमाना व्यवहार करने की इजाजत दी है। आश्चर्य नहीं कि अध्ययन समूह ने आगे लिखा कि विभिन्न बैंकों की दरों में अंतर को समझ पाना मुश्किल है। खासतौर पर यह देखते हुए कि बैंकिंग स्तर पर कारोबारी नीतियां समान हैं और ग्राहक ऋण के स्तर पर जोखिम भी। 
 
कुछ बैंक बहुत ज्यादा शुल्क वसूल करते हैं। विश्लेषण में कहा गया है कि ये बैंक समान ग्राहकों से अलग-अलग दर वसूल करते हैं। जबकि एमसीएलआर की बैंकों द्वारा निर्धारित दर में बहुत मामूली भूमिका होनी थी लेकिन यही मुख्य निर्धारक बन गई। इस प्रकार बैंकों द्वारा ऋण दर तय करने की पूरी प्रक्रिया अस्पष्टï बन गई।  रिपोर्ट में कहा गया है, 'कई बैंक एमसीएलआर पर मनमानी वसूली करते नजर आते हैं। अध्ययन समूह को चुनिंदा बैंकों के विशिष्टï अध्ययन से इस संबंध में कुछ बातें पता चलीं।' प्रमुख बातें इस प्रकार हैं: (1) कई बैंकों ने एमसीएलआर में भारी कमी को आंशिक तौर पर दूर करने के लिए साथ ही साथ कारोबारी नीति प्रीमियम में इजाफा किया। इससे ऋण दर तक इसका पारेषण पूरी तरह नहीं हुआ। (2) कारोबारी नीति प्रीमियम तय करने के पीछे के तर्क का कोई दस्तावेजीकरण नहीं (3) कई बैंकों में ग्राहकों से शुल्क वसूली संबंधी फैसलों पर बोर्ड की मंजूरी की नीति ही नहीं है। (4) कुछ बैंकों के पास इस विस्तार के आकलन तक का सही तरीका नहीं है।
 
वे पूर्ववर्ती ऋण दर में एमसीएलआर को घटा देते हैं और (5) ऋण जोखिम आकलन में क्रेडिट रेटिंग वाला तत्त्व शामिल नहीं होता बल्कि इसके लिए देनदारी चूक की आशंका का पारंपरिक तरीका अपनाया जाता है।  स्थानाभाव में मैं इस विस्फोटक कहे जा सकने वाले दस्तावेज के बारे में और अधिक नहीं लिख रहा हूं। हालांकि मीडिया ने इसकी बड़े पैमाने पर अनदेखी की है। रिपोर्ट को अगर सपाट ढंग से पढ़ा जाए तो यह साबित होता है कि बैंक अपने ग्राहकों के साथ धोखेबाजी कर रहे हैं। वे अनावश्यक रूप से ऊंची दरें वसूल कर रहे हैं, भेदभाव कर रहे हैं और अस्पष्टïता बरत रहे हैं। इस बीच आरबीआई भी इस ओर कतई ध्यान नहीं दे रहा है। 
Keyword: bank, loan, debt, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई),
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