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देश-विदेश में हमेशा बेहतर रही हैं गठबंधन सरकार

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  October 22, 2017

मानसिकता क्या होती है? हमारे आसपास हर कोई यह मानता है कि मानसिकता यानी चुनिंदा स्थापनाओं पर ऐसा विश्वास जिसे किसी भी कीमत पर हिलाया न जा सके। यह अपने आप में बेहद खतरनाक बात है। इसकी वजह से आप में यह सोच उत्पन्न होती है कि कोई विशिष्टï विचार केवल इसलिए सही है क्योंकि आप उस पर यकीन करते हैं। इस बात से लगभग हर व्यक्ति इत्तफाक रखेगा कि ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की बदौलत देश में कई मानसिकताओं वाले लोग रहे। इनमें से एक अहम मानसिकता यह आभास दिलाती है कि किसी भी देश के लिए दो दलों वाली राजनीतिक प्रणाली ही सबसे बेहतर शासन प्रणाली होती है। इस मानसिकता के मुताबिक इस सोच से प्रस्थान यानी एकदलीय शासन या बहुदलीय शासन की ओर प्रस्थान करना सही नहीं है। परंतु यह राजनीति को देखने का सही तरीका कतई नहीं है। सन 1967 में देश में पहली बार गठबंधन सामने आया और तब से ही यह बहस निरंतर चली आ रही है। 

 
कांग्रेस पार्टी ने भी अपने हित में एक मिथक को बढ़ावा दिया कि गठबंधन की वजह से सरकार चलाना मुश्किल हो जाता है। इस मिथक को जानबूझकर प्रश्रय दिया गया। यही वजह है कि जब भी किसी एक दल को सत्ता मिली तो इसे पूरी सराहना दी गई। इसी प्रकार जब भी गठबंधन सरकार की बात सामने आई तो अनिच्छा और निराशा देखने को मिली। परंतु सच्चाई एकदम उलट है। देश में सन 1989 के बाद 25 वर्षों तक गठबंधन सरकारें ही सत्ता में रहीं। इन्हें भले ही बुरा माना जाता हो लेकिन सच यह है कि देश को सबसे सुखद आर्थिक परिणाम इसी काल में मिले। भारत में गठबंधन सरकारों के अधीन बहुत तेजी से विकसित हुआ। 
 
वर्ष 2014 में आयोजित आम चुनाव में जब भारतीय जनता पार्टी को बहुमत मिला तो एकदलीय शासन की वकालत करने वालों ने राहत की सांस ली। हर किसी ने सोचा कि देश में अब व्यवस्थित शासन व्यवस्था होगी। परंतु यह भी सच साबित नहीं हुआ। ऐसा नहीं है कि भाजपा ने बहुत खराब शासन किया इसलिए ऐसा हुआ। बल्कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि सामान्य बहुमत अच्छे शासन की न तो गारंटी होता है, न ही उसकी आवश्यकता होती है इस काम में। किसी नेता के लिए खुद को स्थापित करना आवश्यक है लेकिन इससे भी अच्छा शासन सुनिश्चित नहीं होता। यहां मेरा सवाल यह है कि क्या अब वक्त आ गया है कि ब्रिटिश शासकों द्वारा पीछे छोड़े गए शासन व्यवस्था के विचार को त्याग दिया जाए और इस बात को स्वीकार कर लिया जाए कि गठबंधन सरकारें हर मामले में एक दल की सरकार से बेहतर शासन प्रदान करती हैं क्योंकि एक दल सरकार और संसद पर अपना दबदबा कायम रखता है। इसके अलावा क्या हमें गठबंधन सरकारों की ओर सायास प्रयास करना आरंभ कर देना चाहिए। 
 
कई देशों में खासतौर पर उन देशों में जिनमें ब्रिटिश परंपरा नहीं रही है, वे पहले से ही ऐसा करते आए हैं। उन्होंने इस मामले में काफी बेहतर प्रदर्शन किया है। ऐसे देशों में राजनीतिक दल चुनाव पूर्व पूरी सक्रियता से व्यापक गठबंधन तैयार करते हैं। भारत में इसका ठीक उलटा होता है और चुनाव नतीजे सामने आने के बाद विभिन्न दल गठबंधन के प्रयास में लग जाते हैं। यह बात अपने आप में एकदम बेतुकी है। क्योंकि जनादेश पहले ही अपर्याप्त है। जोड़तोड़ करके बहुमत तक पहुंचा जा रहा है। 
 
मैं नहीं चाहता कि मैं इस मामले में बहुत अधिक गहराई में जाऊं लेकिन बात यह है कि फिलहाल जो स्थिति है उस हिसाब से भाजपा का अगले आम चुनाव में बहुमत कायम रखना असंभव नहीं तो भी हद से ज्यादा मुश्किल अवश्य होने जा रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि वर्ष 2014 में केवल सात राज्यों में उसे 282 में से 185 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल हुई थी। जबकि शेष 22 राज्यों में से उसके केवल 97 सीटों पर जीत नसीब हुई थी। 
 
यह संवैधानिक संदर्भों में तो बहुमत है लेकिन राजनीतिक समझ के हिसाब से इसे बहुमत नहीं कहा जा सकता है। इस मोड़ पर भले ही यह विचित्र लगे लेकिन मैं एक नया विचार आपके सामने पेश करना चाहता हूं। लोगों के मन में बहुमत की तस्वीर बदल चुकी है और यह संवैधानिक परिभाषा से एकदम अलग है। नई परिभाषा में बहुमत 272 सीटों पर सीमित नहीं है बल्कि इसका दायरा काफी विस्तारित है। अब यह 180 से 200 सीटों को नव सामान्य कहा जा सकता है। यह राज्यों में होने वाली घटनाओं के एकदम उलट है। राज्यों में लोगों की परिभाषा और संवैधानिक परिभाषा एकदम समान है। इस विषय पर कोई चाहे तो बाकायदा पीएचडी थीसिस लिख सकता है। इस बीच भाजपा यह सुनिश्चित करने का प्रयास कर रही है कि वह न केवल अपनी सीटों की संख्या बरकरार रखे बल्कि उनमें और अधिक इजाफा भी कर ले। यह तरीका सही है, हमें इसके प्रति शुभेच्छा प्रकट करनी चाहिए।  
 
परंतु हमें यह सवाल भी पूछने की आवश्यकता है कि ऐसे निष्कर्ष सुनिश्चित करने के लिए क्या एक सरकार या कोई भी सरकार ऐसा कदम उठाने का साहस जुटा पाएगी जिसकी बड़ी आर्थिक और सामाजिक कीमत चुकानी पड़ सकती हो? अगर उसे गठबंधन साझेदारों से भी निपटना हो तो क्या वह ऐसा करेगी? हमारा हालिया इतिहास तो यही बताता है कि ऐसा नहीं होगा। 
Keyword: NDA, UPA, alliance,,
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