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जन नीति की बेहतरी और बौद्घिक क्षमता

अजय शाह /  October 22, 2017

जन नीति के हर अहम क्षेत्र में हमें बौद्घिक क्षमताओं की आवश्यकता है ताकि गलतियों को समझ सकें और बदलाव की नीति तैयार कर सकें। विस्तार से बता रहे हैं अजय शाह

 
वर्ष 2011 से ही देश में वृद्घि दर धीमेपन की शिकार है और अब इससे निजात पाने के तरीके नए सिरे से तलाशे जा रहे हैं। अर्थव्यवस्था या उससे जुड़ी किसी भी समस्या के कई पहलू होते हैं। नीतिगत उपायों की आवश्यकता तो होती है लेकिन हमेशा ये काम नहीं आएंगे। एक सुझाव जिसे तीन पन्नों के एक साफ-सुथरे नोट के रूप में लिखा जा सकता है, वह समस्या का हल नहीं सुझाता। मंत्री और अधिकारी कार्रवाई को लेकर उत्सुक रहते हैं और वे तेज काम चाहते हैं। परंतु प्रदर्शन के स्तर पर कई बार दिक्कतदेह तत्त्व सामने होते हैं। ऐसे में समस्या की कहीं अधिक गहरी जानकारी की आवश्यकता होती है ताकि संपूर्ण जरूरी बदलावों की योजना बनाई जा सके। इसके अलावा बौद्घिक क्षमता और अधिकार संपन्न टीम तैयार की जा सके। 
 
इसोर्मोफिक मिमिक्री से तात्पर्य है एक ऐसी सोच से जिसमें सरकारी एजेंसी द्वारा आकलित जीडीपी जैसी चीजों को वृहद आर्थिक स्थिति का मानक मान लिया जाता है। देश में वृहद आर्थिक स्थिति का सबसे बेहतर मापक है सूचीबद्घ कंपनियों के राजस्व का तिमाही आंकड़ा और सीमएमआईई कैपेक्स डाटाबेस में परियोजनाओं का आंकड़ा। इनके आधार पर यह आकलन सामने आता है कि वर्ष 2011-12 में देश में वृद्घि में गिरावट आनी शुरू हो गई थी।
 
हाल के महीनों में इस बात को लगभग सभी मानने लगे हैं कि अर्थव्यवस्था की हालत खराब है। इससे हल तलाश करने की जद्दोजहद बढ़ी है। नीतिगत समुदाय में तमाम लोग इस संबंध में लिख रहे हैं या नीतिगत प्रस्तावों का अध्ययन कर रहे हैं। मोटेतौर पर इस संबंध में दो-तीन पन्नों के नोट ही सामने आ रहे हैं जो दरअसल काम नहीं आते। देश की सार्वजनिक और नीतिगत प्रशासन की मशीनरी सही ढंग से काम करती नहीं दिख रही है। हम ऐसी परिपक्व अवस्था में नहीं हैं जहां केवल मामूली रद्दोबदल से काम बन जाए। अर्थव्यवस्था और राज्य अपने आप में जटिल बुनावट रखते हैं। हमें इसके अलग-अलग कलपुर्जों पर नजर रखने के लिए बौद्घिक क्षमता की आवश्यकता होती है। इसके अलावा बदलाव के लिए व्यापक विमर्श की आवश्यकता होती है। 
 
बैंकिंग संकट पर विचार करते हैं। देश की बैंकिंग व्यवस्था में इक्विटी पूंजी की कितनी कमी है? हालात यहां तक कैसे पहुंचे? हम बैंकिंग संकट के कारण हुए नुकसान को कैसे कम कर सकते हैं? आरबीआई के बैंकिंग संबंधी नियमन विफल क्यों हो जाते हैं? क्या सरकारी बैंक नियमन के आगमन के बाद बेहतर ढंग से काम करेंगे या फिर निजीकरण करना अनिवार्य है? इस पूरी तस्वीर की समग्र समझ के बाद ही समस्या को हल किया जा सकता है। ऐसी तमाम चीजें इसमें शामिल हैं। हमें किसी समस्या को हल करने के लिए उसकी जड़ तक पहुंचना होगा। इतना ही नहीं हमें इस समस्या का वह हल तलाशना होगा जिसकी लागत सबसे कम हो।
 
बैंकिंग संकट देश के समक्ष मौजूद कई समस्याओं में से एक है। निवेश में ठहराव, निजी बुनियादी निवेश में कमी, वित्तीय क्षेत्र सुधार, कर नीति और कर प्रशासन तथा न्यायपालिका सुधार तथा आपराधिक न्याय सुधार आदि। इनमें से प्रत्येक क्षेत्र में जबरदस्त जटिलता है। तीन पन्नों के नोट से ये समस्याएं सुलझने वाली नहीं हैं। एक सवाल यह भी है कि ऐसे नोट समस्या को हल करने में हमेशा नाकाम क्यों रहते हैं? पहली समस्या का संबंध सार्वजनिक नीति की बौद्घिक संपदा से है। टीमों की गुणवत्ता कमजोर हुई है और कमजोर नीतिगत तत्त्वों के कारण बहस और क्रियान्वयन कथित तीन पन्नों के हल में उलझे हुए हैं।
 
दूसरा मसला है गति से जुड़ी सनक। सक्रिय और नतीजों पर आधारित सरकार को लेकर काफी बात होती रही है। रंगमंचीय ढंग से घोषणाएं करना करना भी एक तत्त्व रहा है। मीडिया ने भी इनकी खूब सराहना की है। यह वह मीडिया है जिसे अनुपूरक प्रश्न पूछने तक की सलाहियत नहीं है। दो साल में गंगा सफाई और छह महीने में बैंकिंग संकट का निपटारा आदि ऐसी बातें हैं जो तीन पन्नों के नोट को बढ़ावा देती हैं।
 
इंजीनियरों और आईटी क्षेत्र की विसंगतिपूर्ण भूमिका तीसरा मुद्दा है। कई समस्याओं में हल के रूप में कंप्यूटरीकरण का सुझाव सामने आता है। ऐसे में जब सुझाए गए हल में आईटी टीम को शामिल करने की बात आती है तो कोई आपत्ति नहीं करता। बहरहाल, देश में जन नीति की अधिकांश समस्याएं केवल कंप्यूटर तकनीक की मदद से हल नहीं हो सकतीं। हमें गहरे बदलावों की आवश्यकता है। सन 1991 में एकल खिड़की आईटी व्यवस्था को औद्योगिक लाइसेंसिंग की निगरानी का माध्यम बनाया गया लेकिन यह सही नहीं था। असली उत्तर था औद्योगिक लाइसेंसिंग को पूरी तरह खत्म करना।
 
हम गर्व से कहते हैं कि भारत उभरता बाजार है। हम मान कर चलते हैं कि भारत उभरते बाजारों जैसा है विकासशील देशों जैसा नहीं। बहरहाल, उभरते बाजार से राज्य की क्षमता का सीधा संबंध है। उभरते बाजारों की क्षमताएं अलग होती हैं, उनकी अपनी एक क्रियान्वयन नीति होती है। वर्ष 2001 में जब मैंने वित्त मंत्रालय में काम शुरू किया था तब मुझे पता चला कि हम इस प्रक्रिया में हैं कि जहां उभरते बाजार का राजकोष और उसी दर्जे का केंद्रीय बैंक निर्मित कर सकें। कई मायनों में क्षमता निर्माण का काम उलटी गति को प्राप्त हो गया है। हम खतरनाक दौर से गुजर रहे हैं। अर्थव्यवस्था का आकार 20 खरब डॉलर का है जबकि संस्थागत क्षमता विकासशील मुल्क की है। जैसा कि कुछ वर्ष पूर्व एक विदेशी आगंतुक ने कहा था, वह भारत आया था चीन जैसा कुछ देखने लेकिन उसे नजारा मिला इंडोनेशिया जैसा।
 
आगे की राह क्या है? सार्वजनिक नीति के प्रत्येक अहम क्षेत्र में हमें बौद्घिक क्षमता की आवश्यकता है ताकि गलतियों को सही समझा जा सके और बदलाव की नीति बनाई जा सके। इसकी बदौलत विधायी और कार्यपालिका की व्यवस्था पटरी पर आनी चाहिए। विधायी मोर्चे पर हमें उच्च स्तरीय कानून बनाने की आवश्यकता है और कार्यपालिका के मोर्चे पर हमें संगठनात्मक ढांचा और प्रक्रिया मैनुअल बनाना होगा। इन सब कामों में समय लगता है। इसके लिए ऐसी टीम विकसित करनी होंगी जिसमें बौद्घिक क्षमता, सशक्तीकरण आदि की दिशा में काम करने की कुव्वत हो। सन 1991 के बाद से सुधार की हर कहानी में कुछ लोग अहम रहे हैं जिन्होंने इसमें अपनी भूमिका निभाई है। ऐसी टीमों में समस्याओं को पूरी समझ होनी चाहिए और हालात को लेकर जागरूकता भी होनी चाहिए। केवल तभी वे अहम भूमिका निभा सकेंगे। 
Keyword: growth, india, economy,,
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