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इस बार मुश्किल है हिमाचल में वीरभद्र सिंह की मंजिल

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  October 20, 2017

ऐसा प्रतीत होता है कि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व और हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के बीच सुलह हो गई है। हालांकि यह इस बात की गारंटी कतई नहीं है कि राज्य में 9 नवंबर को होने वाले विधानसभा चुनाव में पार्टी जीत हासिल कर सकती है। वीरभद्र सिंह पहली बार सन 1962 में सांसद बने, वह इससे पहले पांच बार राज्य के मुख्यमंत्री और दो बार केंद्र सरकार में मंत्री रह चुके हैं। सन 2014 में भी वह नेहरू-गांधी परिवार की पसंद नहीं थे लेकिन उनके पास सिंह को छठी बार राज्य का मुख्यमंत्री बनाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। 

 
परंतु इसका यह मतलब कतई नहीं है कि वह संकट में नहीं हैं। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का आरोप है कि सिंह ने अपने और अपनी पत्नी प्रतिभा सिंह के नाम चेक के जरिये 1.5 करोड़ रुपये और 2.4 करोड़ रुपये की राशि वेंचर एनजीए ऐंड टेक्रॉलजी प्राइवेट लिमिटेड नामक कंपनी से प्राप्त की। कंपनी को देनदारी में चूक के बावजूद उसकी जलविद्युत परियोजना पर दो बार अवधि विस्तार दिया गया। इसके चलते सांठगांठ वाले पूंजीवाद और रिश्वत के मामले का आधार तैयार हुआ। यह इकलौता मामला नहीं है। जांच एजेंसी का आरोप है कि सिंह के पास 10 करोड़ रुपये से अधिक की ऐसी संपत्ति है जो आय के ज्ञात स्रोतों से कतई ज्यादा है। ये मामले अदालत में चल रहे हैं। इन बातों के बावजूद राहुल गांधी ने कह दिया कि है दिसंबर में चुनाव नतीजे घोषित होने के बाद अगर कांग्रेस को बहुमत मिलता है तो वही प्रदेश के मुख्यमंत्री होंगे। उधर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रदेश में कांग्रेस सरकार को 'जमानती सरकार' की उपमा दे डाली है। 
 
प्रश्न यह है कि ऐसा नेता मुख्यमंत्री कैसे बन रहा है?  वीरभद्र की राज्य में बढिय़ा प्रदर्शन वाले नेता के रूप में प्रतिष्ठïा है। उनके ही कार्यकाल में प्रदेश का पूर्ण विद्युतीकरण हुआ। सन 1988 में ही राज्य के सबसे दूरदराज गांव किब्बर का विद्युतीकरण हुआ था। यह स्पीति में स्थिति है और दुनिया के उन सबसे ऊंचे गांवों में से एक है जहां तक सड़क है। अपने राजनीतिक करियर में सिंह ने उच्च हिमाचल बनाम निचले हिमाचल की राजनीति से खुद को हमेशा दूर रखा। अन्य नेताओं को यह राजनीति इसलिए पसंद है क्योंकि प्रदेश के इन दोनों इलाकों की जरूरतें अलग हैं। कुछ ही ऐसे राजनेता हैं जिनको कांगड़ा (निचले हिमाचल का हृदय स्थल जहां 16 विधानसभा सीटें हैं) और शिमला (ऊपरी हिमाचल जहां 8 विधानसभा सीटें हैं परंतु ताकत ज्यादा) में समान स्वीकार्यता हासिल है। परंतु सिंह ने ऊपरी हिमाचल में अगर 4 लेन वाली सड़क बनवाई तो निचले हिमाचल में भी 6 लेन वाली सड़क का निर्माण कराया। हिमाचल प्रदेश में साक्षरता दर प्राय: देश के अन्य हिस्सों से अधिक रहती है, फिर भी अपने कार्यकाल के दौरान सिंह ने यह सुनिश्चित किया कि प्रदेश में एक भी गांव ऐसा नहीं हो जहां प्राथमिक विद्यालय न हो। 
 
अगर उनकी आलोचना हो रही है तो इसकी वजह है उनकी काम करने की तानाशाही शैली। वह रामपुर-बुशहर रियासत के अंतिम राजा हैं और सन 2008 में जब कांग्रेस विधानसभा चुनाव हारी तब वही मुख्यमंत्री थे। सन 2004 में उन्होंने कांगड़ा के तीन प्रमुख नेताओं विजय सिंह मनकोटिया, चंद्रेश कुमारी और बृज बिहारी बुटैल को मंत्रिमंडल में स्थान नहीं दिया था। उन पर आरोप लगाया गया कि वह इस क्षेत्र के साथ भेदभाव कर रहे हैं। हकीकत तो यह है कि इन तीनों को इसलिए स्थान नहीं दिया गया क्योंकि सिंह को शंका थी कि ये तीनों उनके खिलाफ मिलीभगत कर रहे हैं। शायद वह सही हों क्योंकि जल्दी ही मनकोटिया ने पार्टी छोड़ दी और वह भाजपा की हिमाचल इकाई के अध्यक्ष बन गए। 
 
उनके ही चलते हिमाचल प्रदेश के सबसे चर्चित राजनेता सुखराम ने कांग्रेस छोड़कर अपनी अलग पार्टी बनाई। सन 1998 में भाजपा के प्रेम कुमार धूमल को किसी हालत में सरकार बनाने का अवसर नहीं मिलता, अगर कांग्रेस ने सुखराम की शर्त मान ली होती। सुखराम की शर्त थी कि वीरभद्र सिंह के अलावा किसी भी अन्य नेता को प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया जाए। यह अलग बात है कि सन 2014 में सुखराम के बेटे अनिल शर्मा वीरभद्र सिंह की सरकार में शामिल हुए, हालांकि 2017 में एक बार पुन: पाला बदलकर वह भाजपा में शामिल हो गए। 
 
परंतु रिश्वत के आरोप गंभीर हैं और वे पीछा छोडऩे का नाम ही नहीं ले रहे हैं। जब वह केंद्रीय इस्पात मंत्री थे तो सिंह के खिलाफ एक जनहित याचिका लगाई गई थी जिसमें आयकर के व्यापक उल्लंघन और एक इस्पात कंपनी को कथित लाभ की बात शामिल थी। उच्च न्यायालय ने इसका संज्ञान लिया और सीबीआई से इस संबंध में एक रिपोर्ट देने को कहा। तब सिंह को मंत्रिमंडल से हटा दिया गया था। अब वे पुराने मामले एक बार फिर उनकी परेशानी बढ़ा सकते हैं। इस बारे में अब ज्यादा कुछ किया भी नहीं जा सकता है।
Keyword: himachal pradesh, virbhadra singh, congress,,
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