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मुझे कुछ करना है...

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  October 20, 2017

इस सप्ताह मेरे स्तंभ का शीर्षक राज कपूर की फिल्म 'बॉबी' (1973) से प्रेरित है। इस फिल्म के एक गीत में  डिंपल कपाडिय़ा, लता मंगेशकर की आवाज में ऋषि कपूर से कहती हैं कि मुझे कुछ कहना है। बदले में ऋषि कपूर कहते हैं कि मुझे भी कुछ कहना है। आनंद बख्शी के लिखे इस गीत में रहस्यपूर्ण शब्दों में दोनों किशोर इजहारे मुहब्बत करते हैं और आप के दिलों के तार झंकृत करते हैं। 

 
मैंने यहां कहना की जगह करना शब्द का इस्तेमाल किया है। उत्तर भारत में हवा की खतरनाक गुणवत्ता जैसे गंभीर जोखिम के समय भी हमारी प्रतिक्रिया डिंपल की तरह ही होती है कि मुझे कुछ कहना है। इसके बदले सरकार, न्यायपालिका, मीडिया और राजनेता सब ऋषि कपूर के तर्ज पर कहते हैं कि मुझे भी कुछ करना है। इस तरह हर किसी ने अपनी चेतना को संतुष्टिï करने की व्यवस्था कर रखी है। मीडिया भड़कदार सुर्खियों के जरिये अपनी विजय की घोषणा करता है। आप गूगल करके पता लगा सकते हैं कि दीवाली और सर्दियों के महीनों में  अक्सर नाटकीय एकबारगी सुझाव दिए जाते हैं और कहा जाता है कि ये राजधानी की स्मॉग (धुंध और कोहरा) की समस्या का हल है। व्यापक समस्या के हल या शोध का कोई प्रयास नहीं होता। दरअसल वास्तविक हल तलाशने में वक्त और कड़ी मेहनत लगती है। यही वजह है कि कुछ न करने से कुछ करते दिखना बेहतर माना जाता है। दरअसल कुछ कर लेने के बाद हमारी जिम्मेदारी खत्म जो हो जाती है। इस बीच आप एयर प्यूरीफायर (एसी से भी महंगा) और स्टेरॉयड इनहेलर तलाश कर रखिए। अगर ये आपकी पहुंच के बाहर हैं  तो आप प्रार्थना करते रहिए। 
 
एक नजर डालते हैं उन तमाम सुर्खी बटोरू उपायों पर जो बीते सालों में स्मॉग को लेकर अपनाए गए। किसी ने एक खास अवधि से पुराने वाहनों पर प्रतिबंध लगाया तो किसी ने डीजल के उपयोग पर रोक लगाई। भारी ट्रकों  पर प्रदूषण कर लगाया गया। विनिर्माण स्थलों पर काम रोकने के आदेश दिए गए और आम घरों पर फुटपाथ के आसपास कचरा फेंकने पर 50,000 रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया। अत्यंत धूमधाम से सम-विषम योजना की शुरुआत की गई। इनका टेलीविजन  पर खूब प्रसारण हुआ और इन कार्यक्रमों का प्रायोजन एयर प्यूरीफायर कर रहे थे। अब पटाखों पर प्रतिबंध लगाया गया। यह सवाल जायज है कि इन कदमों से हमारी हवा के स्तर में कितना सुधार हुआ। 
 
इसमें दो राय नहीं कि सामाजिक कार्यकर्ताओं और न्यायपालिका का प्रभाव 1990 के दशक में बढ़ा। उसी दौर में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह और जनहित याचिका लगाने में अग्रणी एम सी मेहता ने पर्यावरण की हालत और जागरूकता सुधारने में अहम योगदान किया। इस दौरान सबसे बड़ी सफलता थी राजधानी के सार्वजनिक और वाणिज्यिक परिवहन को सीएनजी में बदलना। इससे हवा की गुणवत्ता में सुधार हुआ लेकिन इसके लाभ एक दशक बाद सामने आए। 
 
तब से अब तक जो भी कदम उठाए गए वे एक तरह से विचारहीन, दंभपूर्ण, तानाशाही कदम हैं। कमोबेश ऐसे जैसे कि हम सामाजिक कार्यकर्ता, न्यायाधीश, मीडिया के लोग बेहतर जानते हों कि लोगों के लिए क्या ठीक है। न्यायिक अवमानना के डर से कोई सवाल नहीं करता, न ही जवाबदेही तय होती है। इस बीच हालात का बिगडऩा जारी है। दिल्ली की हवा एक विकट समस्या है लेकिन कुछ उपाय तो अत्यंत जल्दबाजी भरे और विचारहीन रहे। मसलन दिल्ली के समूचे कुटीर उद्योग को रातोरात बवाना स्थानांतरित करना ऐसा ही कदम था। उस वक्त भी बुनियादी संरचना या मानव संसाधन को लेकर कोई प्रतिबद्घता नहीं जताई गई। सार्वजनिक परिवहन और आवास विकसित करने के पहले ही उद्योग और रोजगार हटा दिए गए। नतीजा भारी बेरोजगारी के रूप में सामने आया। नई झुग्गियां बनीं और जमीन माफिया तथा अवैध आवासीय व्यवस्था सामने आई। हासिल क्या हुआ? राजधानी का प्रदूषण उसके बाहरी हिस्से में पहुंच गया। दिल्ली में कैसे उद्योग हों इस पर कभी विचार नहीं किया गया, न ही कोई नीति इस सिलसिले में बनाई गई। मजेदार बात यह है कि एक प्रभावशाली समुदाय ने अपना प्रदूषण कम प्रभावशाली समुदाय के माथे पर डाल दिया। आधुनिक पर्यावरण सक्रियता के पितामह लेस्टर ब्राउन कह चुके हैं कि जहरीली हवा किसी सीमा को नहीं मानती। सन 2015 में आम आदमी पार्टी दिल्ली की सत्ता में आई। सामाजिक कार्यकर्ताओं की इस पाटी को भ्रष्टïाचार विरोध से प्रदूषण विरोध की राजनीति अपनाने का अवसर नजर आया। इसने जो कदम उठाए उन्हें मैंने अपने सहकर्मी राजगोपाल सिंह की मदद से एकत्रित किया है। 
 
सबसे पहले पार्टी ने तथाकथित सम-विषम योजना की घोषणा की जिससे हवा की गुणवत्ता में कोई फर्क नहीं आया। इसके बाद वादा किया गया कि पांच बड़े उपकरण लगेंगे जो हवा को शुद्घ करेंगे, धुंध फव्वारा लगेगा और सबसे प्रदूषित इलाके में वर्चुअल चिमनी लगाई जाएगी। अक्टूबर 2016 में इसका परीक्षण किया गया। कई अन्य वादे भी किए गए मसलन मशीन से दिल्ली की सड़कों की सफाई ताकि धूल कम हो सके। 
 
इस बीच ईपीसीए, सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रीय हरित पंचाट ने अपना काम जारी रखा। वाहनों और ईंधनों को लेकर इतने आदेश जारी किए गए जिसकी कोई सीमा नहीं। ईपीसीए ने सर्वोच्च न्यायालय में गत 1 फरवरी को जो रिपोर्ट पेश की उससे कई बातें सामने आती हैं। खासतौर पर उसके आदेशों के क्रियान्वयन की स्थिति से जुड़ा हिस्सा।  अप्रैल में जमा की गई रिपोर्ट और अधिक जानकारीपरक है। इस रिपोर्ट में सर्वोच्च न्यायालय की उस कार्य योजना का जिक्र है जो राजधानी के स्मॉग से संबंधित है। यह एक व्यापक, सुविचारित रिपोर्ट है परंतु इसका क्रियान्वयन करना असंभव है। ऐसा करना किसी क्रांति से कम नहीं। इसमें ऐसे कदम हैं जो दिल्ली के अलावा केंद्र और राज्य की दर्जनों एजेंसियों पर बाध्यकारी होंगे। इनका असर पंजाब और हरियाणा राज्यों के बजट, ईंधन, कर , कृषि, उनके नगर निकाय आदि सब पर होगा। 
 
अगर आप इस योजना के हर बिंदु को ध्यान से पढ़ें तो पाएंगे कि इसके क्रियान्वयन के लिए सर्वोच्च न्यायालय के एक पूर्णकालिक पीठ की आवश्यकता होगी या फिर शायद समूचे सर्वोच्च न्यायालय को रोज बैठना होगा, वह भी दर्जनों अधिकारप्राप्त समितियों के साथ ताकि क्रियान्वयन की निगरानी की जा सके। पूरे सम्मान के साथ हमें यह कहना होगा कि इसे पढऩा बहुत आश्वस्तिकारक है लेकिन ऐसा होने वाला नहीं है। तथ्यों की जांच बताती है कि दिल्ली में वर्ष 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों के बाद से नई बस नहीं खरीदी गईं, मेट्रो का मौजूदा तीसरा चरण पहला ऐसा चरण है जिसमें साल भर से अधिक की देरी हुई। चौथा चरण तो पूरे 2.5 साल देरी से चल रहा है। यह कटु है लेकिन सच न बोलना कायरता होगी और हमारे बच्चों के स्वास्थ्य के साथ बेईमानी भी। इन समितियों का गठन एम सी मेहता की सन 1985 में शुरू हुई जनहित याचिकाओं के बाद किया गया। इन्होंने अच्छा काम किया लेकिन अब इनकी उपयोगिता समाप्त हो चुकी है।  
 
अब वे थक चुकी हैं और इनमें किसी भी अन्य सरकारी नौकरशाही की तरह दोहराव आ गया है। अपने 20वें वर्ष में शायदा ईपीसीए देश की सबसे पुरानी अदालती आदेश से बनी संस्था है। इसके प्रमुख भूरे लाल (यह नाम बोफोर्स के जांचकर्ता के रूप में हाल में चर्चा में रहा) सन 1990 के दशक में सेवानिवृत्त होने के बाद 1998 में इसके अध्यक्ष बने और देश के 17 मुख्य न्यायाधीशों के कार्यकाल के दौरान वह इस पद पर बने रहे। यह सब ठीक था, बशर्ते कि हमारी हवा की गुणवत्ता में सुधार हुआ होता। अब वक्त आ गया है कि केंद्र सरकार चाहे तो प्रधानमंत्री के अधीन एक नया अधिकार प्राप्त राजनीतिक संस्थान गठित करे। इसमें सभी संबंधित मुख्यमंत्रियों को शामिल किया जाए और लक्ष्य और जवाबदेही तय की जाए। मैं पूरी विनम्रता से कहना चाहता हंू कि अदालतों ने अब तक काफी कुछ किया है लेकिन वे कार्यपालिका को ऐसा अवसर क्यों देती हैं कि वह कुछ किए बिना बैठी उनके कदमों का मजाक उड़ाए। 
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