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सार्वजनिक धन का व्यय और आवंटन

आनंद पी गुप्ता /  October 18, 2017

जरूरी नहीं कि घाटा हमेशा बुरा ही हो। कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि सार्वजनिक धन का आवंटन और व्यय कैसे किया जा रहा है। वृहद आर्थिक हालात की भी इसमें अहम भूमिका है। बता रहे हैं आनंद पी गुप्ता

 
चालू वित्त वर्ष के लिए भारत सरकार ने कुल 21,46,735 करोड़ रुपये के व्यय का प्रावधान किया। इसके अलावा 12,27,014 करोड़ रुपये के कर राजस्व, 2,88,757 करोड़ रुपये के गैर कर राजस्व, 11,932 करोड़ रुपये की कर्ज वसूली और 72,500 करोड़ रुपये की अन्य पूंजीगत प्राप्तियों की बात कही गई है। इन आंकड़ों के मुताबिक देखें तो वर्ष 2017-18 के दौरान सरकार का राजकोषीय घाटा 5,46,532 करोड़ रुपये होगा। वर्ष 2017-18 के लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 168,47,455 करोड़ रुपये के अनुमान को देखें तो चालू वर्ष का राजकोषीय घाटा जीडीपी के 3.2 फीसदी के बराबर रहने की बात कही गई है। 
 
अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति को देखते हुए क्या सरकार को राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 3.2 फीसदी के बराबर रखने के पुराने लक्ष्य पर कायम रहना चाहिए? या वह इसे कुछ हद तक शिथिल कर सकती है? कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को इस स्तर पर टिके रहना चाहिए क्योंकि 3.2 फीसदी से अधिक का राजकोषीय घाटा मुद्रास्फीति बढ़ाने वाला होगा और सरकार की विश्वसनीयता को भी नुकसान पहुंचाएगा। वहीं कुछ का कहना है कि अर्थव्यवस्था में आई मंदी और राजकोषीय प्रोत्साहन की आवश्यकता को देखते हुए सरकार को अर्थव्यवस्था में अतिरिक्त नकदी डालनी चाहिए। 
 
मेरा मानना है कि राजकोषीय घाटे की जो मौजूदा व्याख्या है वह बहुत मायने नहीं रखती। इसमें केवल सरकार की उधारी संबंधी जरूरतें शामिल हैं। केंद्र सरकार के उद्यमों द्वारा अपने निवेश की पूर्ति की खातिर लिए जाने वाले ऋण का क्या? राज्य सरकारों द्वारा अपने राजकोषीय घाटे को पूरा करने के क्रम में लिए जाने वाले ऋण का क्या? अपना घाटा पूरा करने के लिए कुछ सरकारी कंपनियों द्वारा लिए गए भारी भरकम ऋण का क्या? सरकारी बिजली वितरण कंपनियां इसका उदाहरण हैं? अगर किसी को राजकोषीय घाटे के वाकई वृहद आर्थिक प्रभाव की चिंता है तो उसे इन सारी चीजों पर गौर करना चाहिए।
 
मान लेते हैं कि इन सारे आकलनों के बाद देश का जीडीपी घाटा करीब 10 फीसदी निकलता है। तब क्या ये विशेषज्ञ जो मानते हैं कि सरकार को राजकोषीय घाटे के 3.2 फीसदी के लक्ष्य पर टिके रहना चाहिए, वे कहेंगे कि जीडीपी के 10 फीसदी के बराबर का राजकोषीय घाटा ठीक है लेकिन 11 फीसदी के बराबर घाटा गलत है? घाटा यकीनन बुरा होता है। सार्वजनिक धन के आवंटन पर काफी कुछ निर्भर करता है। साथ ही इस बात पर भी कि उसे कैसे खर्च किया जाता है? सरकारी तथा अन्य संस्थान उसका क्या उपयोग करते हैं और देश की वृहद आर्थिक स्थिति कैसी है?
 
मेरा मानना है कि देश की मौजूदा वृहद आर्थिक स्थिति में हम आसानी से घाटे में एक फीसदी का इजाफा बरदाश्त कर सकते हैं। परंतु केंद्र की मौजूदा सरकार अपने व्यय का समझदारी भरा प्रबंधन कैसे सुनिश्चित करेगी? वह एक के बाद एक सार्वजनिक हस्तक्षेपों की तो घोषणा कर रही है लेकिन क्या उनकी उचित निगरानी और मूल्यांकन हो रहा है? सवाल यह है कि किस चीज की निगरानी? तो इसका जवाब है इनपुट, गतिविधियों, उत्पादन और नतीजों की निगरानी। साथ ही इनके बीच के अंतर्संबंधों की मजबूती की निगरानी।
 
जहां तक मूल्यांकन की बात है तो मुझे लगता है कि एक ऐसी नीति विकसित करना बेहतर होगा जहां नीति निर्माता नियमित रूप से सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों के प्रभाव का आकलन करें। ऐसा इसलिए न किया जाए कि उनको किसी आवश्यकता का अनुपालन करना है बल्कि ऐसा इसलिए होना चाहिए क्योंकि उनको हकीकत में किए गए काम के प्रभाव के आकलन की आवश्यकता होती है। उन्हें पता होना चाहिए काम किस तरह हो रहा है, किसके लिए हो रहा है और दी गई योजना या काम का असर क्या है और इसकी लागत क्या है? अगर यह सब होता है तो वे सही निष्कर्ष निकाल सकेंगे और भविष्य के कार्यक्रमों और योजनाओं को बेहतर बना सकेंगे। 
 
परंतु क्या सरकार के पास ऐसे सार्वजनिक हस्तक्षेप की सार्थक निगरानी और आकलन करने की क्षमता है? मेरा आकलन है कि उसके पास ऐसी क्षमता नहीं है। उसे जल्द से जल्द इसे विकसित करने की जरूरत है। लब्बोलुआब यह है कि सरकार ने वर्ष 2017-18 के लिए जीडीपी के 3.2 फीसदी के बराबर राजकोषीय घाटे का लक्ष्य तय किया लेकिन वह कोई पत्थर की लकीर नहीं है। परंतु अगर सरकार इसमें कोई बदलाव करे तो उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि जो भी पैसा खर्च किया जाए वह केवल सार्वजनिक कार्यों में खर्च हो और उसका किफायती इस्तेमाल किया जाए। 
 
जोर इस बात पर दिया जाना चाहिए कि सार्वजनिक व्यय और वृहद आर्थिक स्थितियों के बीच का रिश्ता समरेखीय नहीं है। काफी कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि सार्वजनिक धन का आवंटन कैसे होता है और उसका इस्तेमाल कितने प्रभावी ढंग से होता है। सरकार व्यय प्रबंधन में सुधार के जो भी उपाय करेगी उनके तमाम लाभ होंगे। उससे देश की वृहद आर्थिक स्थिति में खासा सुधार होगा। 
 
क्या मैं वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग से या नीति आयोग अथवा रिजर्व बैंक से यह गुजारिश कर सकता हूं कि वह देश के सरकारी संस्थानों के घाटे का आकलन रखना शुरू करे और देश के सरकारी क्षेत्र के घाटे का विश्वसनीय आंकड़ा पेश करे। हमारे पास ये आंकड़े नहीं हैं। जबकि ये होने चाहिए। तभी हम इस क्षेत्र के घाटे की सही निगरानी कर सकेंगे। क्या सरकार अतिरिक्त व्यय करने के पहले उपरोक्त व्यवस्था को समयबद्घ ढंग से लागू कर पाएगी? मौजूदा सरकार के अब तक के रिकॉर्ड को देखते हुए मुझे बहुत अधिक उम्मीद नहीं है। परंतु अगर मैं गलत साबित हुआ तो मुझे यकीनन खुशी होगी। 
 
(लेखक आईआईएम, अहमदाबाद में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रहे। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।)
Keyword: india, economy,,
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