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ठहरें, सोचें, बढ़ें

संपादकीय /  October 18, 2017

केंद्र सरकार ने वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के रूप में नई अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था को बेहद महत्त्वाकांक्षी ढंग से लागू अवश्य किया लेकिन इसके चलते उसे इतनी अधिक परेशानी उठानी पड़ी कि उसने बाकायदा पांच मंत्रियों की सदस्यता वाला एक समूह गठित कर दिया। इस समूह का काम है व्यवस्था की तमाम तकनीकी खामियों पर नजर रखना और उन्हें  दूर करने के लिए जरूरी सुझाव देना। जीएसटी ने जो अफरातफरी मचाई उसका पूर्वानुमान नहीं था। दरों और रियायतों को लेकर पहले ही बहुत जटिलता है। ऐसे में जीएसटी परिषद का अचल संपत्ति और पेट्रोल-डीजल को इस दायरे में लाने का विचार निहायत अपरिपक्व साबित हो सकता है। फिलहाल दोनों ही कई तरह के स्थानीय करों के अधीन हैं। अगर इन्हें जीएसटी के दायरे में लाया गया तो कई ऐसे विवाद उत्पन्न होंगे जिनसे प्रशासन को जूझना होगा। 

 
मिसाल के तौर पर विधायी एजेंडे को लेकर कोई स्पष्टïता नहीं है। क्या इनको जीएसटी में लाने के लिए आगे और संविधान संशोधन करने होंगे या फिर केवल अधिनियमों में बदलाव करके ऐसा किया जा सकता है? अचल संपत्ति के क्षेत्र में यह मसला खासतौर पर असमंजस वाला है क्योंकि जमीन एक ऐसी परिसंपत्ति है जो अचल है। जबकि जीएसटी वस्तुओं पर लगता है जो चल संपत्ति है। ऐसे में माना जा सकता है कि जमीन पर वस्तु कर लगाने के लिए जीएसटी की परिभाषा में ही बदलाव करना होगा। यह भी स्पष्टï नहीं है कि जीएसटी में जमीन पर स्टांप शुल्क और पंजीयन शुल्क तथा ईंधन पर लगने वाले स्थानीय कर समाहित होंगे अथवा नहीं। हालांकि स्टांप अधिनियम केंद्रीय अधिनियम है लेकिन 3 से 10 फीसदी तक का स्टांप शुल्क और पंजीयन शुल्क राज्यों के राजस्व का हिस्सा है। इसी प्रकार ईंधन पर राज्यों का उत्पाद शुल्क लागू है जो 20 से 48.98 फीसदी तक है। इन शुल्कों का विलय आसान नहीं होगा। यह प्रक्रियागत रूप से भी कठिन होगा और राजनीतिक रूप से भी क्योंकि राज्य अपनी राजस्व बढ़ोतरी की शक्ति में कटौती बरदाश्त नहीं करेंगे। खासतौर पर तब जबकि जीएसटी ने पहले ही उनके कर राजस्व में अनिश्चितता बढ़ा दी है। 
 
इन अवधारणात्मक और राजनीतिक कमियों के अलावा अन्य जटिलताएं भी हैं जिन पर विचार करना होगा, खासतौर पर अचल संपत्ति को लेकर। प्राथमिक बिक्री का बाजार तो बहुत बड़ा मुद्दा नहीं होगा क्योंकि राज्य का मूल्यवर्धित कर पहले ही ऐसे लेनदेन पर लागू है और उसका जीएसटी में विलय किया जा सकता है, लेकिन यहां भी कारोबार में एक तरह का ठहराव देखने को मिल रहा है क्योंकि कार्य अनुबंधों पर लगने वाले जीएसटी के समायोजन को लेकर अनिश्चितता का माहौल है। इसका संबंध जमीन की मानी गई कीमत से है। कर अधिकारी इसकी मनमानी व्याख्या करने को स्वतंत्र हैं। परंतु भारतीय अचल संपत्ति उद्योग अपने द्वितीयक बाजार में विशिष्टï है क्योंकि यह प्राथमिक बाजार की तरह ही जीवंत है। सवाल यह है कि क्या इस लेनदेन पर भी दर लागू होगी? अगर स्टांप शुल्क और पंजीयन शुल्क को जीएसटी दर में शामिल मान लिया जाए तो द्वितीयक बाजार में होने वाली बिक्री पर अंतिम कर इतना अधिक हो सकता है कि खरीदार और विक्रेता औपचारिक अर्थव्यवस्था में पंजीयन तक से घबरा सकते हैं। इससे तो जीएसटी की मूल भावना का ही हनन हो जाएगा। इन दोनों को जीएसटी के दायरे में लाया जाना चाहिए, इसे लेकर कोई बहस नहीं है। परंतु मौजूदा व्यवस्था पर जो दबाव है उसे देखते हुए जीएसटी परिषद को अपना यह विचार तब तक के लिए टाल देना चाहिए जब तक कि उपयोगकर्ता नई व्यवस्था को लेकर सहज नहीं हो जाते।
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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