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विदेश से 2.5 अरब डॉलर पूंजी जुटाएगी रिलायंस

देव चटर्जी / मुंबई October 18, 2017

भारत में निजी क्षेत्र की सबसे बड़ी कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज (आरआईएल) विदेशी बाजार से 2.5 अरब डॉलर जुटाने की योजना बना रही है। इस रकम से कंपनी अपने दूरसंचार उपक्रम जियो के कर्ज का पुनर्भुगतान करेगी। इस साल किसी भी भारतीय कंपनी द्वारा विदेशी बाजार से पूंजी जुटाने की यह अब तक की सबसे बड़ी पहल मानी जा रही है। रिलायंस इंडस्ट्रीज दो चरणों में 81.5 करोड़ डॉलर अमेरिकी मुद्रा में और 15 करोड़ यूरो में जुटाएगी। इसके साथ ही जियो 1.5 अरब डॉलर जुटाएगी जिसके लिए प्रवर्तक कंपनी की ओर से गारंटी दी जाएगी।
 
आरआईएल का शेयर बुधवार को 5 फीसदी चढ़कर 914 रुपये पर बंद हुआ, जिससे इसका कुल बाजार पूंजीकरण 5,78,637 करोड़ रुपये हो गया। इस कर्ज का बंदोबस्त एएनजेड, बार्कले, बैंक ऑफ अमेरिका मेरिल लिंच, बैंक ऑफ नोवा स्कॉटिया, बीएनपी पारिबा, सिटीबैंक के साथ ही अन्य विदेशी बैंकों द्वारा लाइबोर प्लस 56 आधार अंक के मार्जिन पर अमेरिकी डॉलर में किया जाएगा।
 
रिलायंस जियो ने पिछले कुछ वर्षों में भारत का सबसे बड़ा दूरसंचार नेटवर्क स्थापित किया है, जिस पर कंपनी ने 2,50,000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश किया है। एक साल पहले जियो की सेवा को शुरू करने के बाद से कंपनी ने मुफ्त वॉयस कॉल और सस्ती डेटा सेवा से 13 करोड़ ग्राहकों को अपने साथ जोड़ा है। जियो शुरू होने के बाद से ही घरेलू दूरसंचार उद्योग में एकीकरण की हलचल शुरू गई और वोडाफोन तथा आइडिया सेल्युलर ने अपने परिचालन का विलय करने का समझौता किया है, वहीं भारती एयरटेल ने भी छोटी कंपनियों का विलय-अधिग्रहण किया है। 
 
एक बैंकर ने कहा कि पुनर्वित्त से कंपनी को अपनी लागत कम करने में मदद मिलेगी। वैसे भी आरआईएल विदेशी बाजार से पूंजी जुटाने वाली भारत की सबसे बड़ी कंपनी है। इस कवायद से उसके कोष की लागत भी काफी हद तक कम होती है। इस साल जनवरी से अब तक विदेशी बाजारों में पूंजी उगाही पिछले साल की समान अवधि की तुलना में कम रही है। ऐसे में बैंकरों का कहना है कि रिलायंस के अलावा, वेदांत भी अंतरराष्ट्रीय बाजार से फंड जुटा रही है। फार्मा दिग्गज इंटास भी तेवा की ब्रिटेन और आयरलैंड की परिसंपत्ति के अधिग्रहण के लिए 1 अरब डॉलर का फंड जुटाने की संभावना तलाश रही है जबकि म्यू सिग्मा ने पिछले महीने विदेशी बाजार से 39.4 करोड़ डॉलर की पूंजी जुटाई है।
 
एक बैंकर ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया, 'भारतीय कंपनियों द्वारा अधिग्रहण या उपकरणों की खरीद के लिए विदेशी बाजार से पूंजी जुटाने के पीछे तर्क यह है कि विदेश में कर्ज काफी सस्ता है। अगर कंपनी की निर्यात आय अच्छी हो तो वह विदेशी मुद्रा दरों में उतार-चढ़ाव की स्थिति में हेज करने की सहज स्थिति में रहती है।' इसके साथ ही रिलायंस घाटे वाले शेल गैस कारोबार को भी बेच रही है। कंपनी ने अमेरिकी शेल गैस उद्योग में 9 अरब डॉलर का निवेश किया है लेकिन आज की तारीख तक उसे कोई मुनाफ ा नहीं हुआ है। कंपनी ने इस कारोबार से निकलने का निर्णय किया क्योंकि यह कारोबार उसके लिए आकर्षक नहीं रह गया था। कंपनी ने स्पष्टï किया है कि वह अमेरिकी परिसंपत्ति को हड़बड़ाहट में औने-पौने दाम पर नहीं बेचेगी।
Keyword: RIL, reliance, रिलायंस इंडस्ट्रीज,
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