बिजनेस स्टैंडर्ड - अतीत का नीतिगत शैथिल्य आर्थिक भविष्य पर भारी!
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Tuesday, November 21, 2017 11:05 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|
 
होम विशेष खबर

अतीत का नीतिगत शैथिल्य आर्थिक भविष्य पर भारी!

शंकर आचार्य /  October 17, 2017

जीएसटी की अड़चनों को दूर करना, विनिमय दर का अवमूल्यन करना और राजकोषीय घाटे को नियंत्रित रखना सरकार की शीर्ष प्राथमिकता होनी चाहिए। विश्लेषण कर रहे हैं शंकर आचार्य

 
केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) ने 31 अगस्त को 2017-18 की पहली तिमाही का राष्ट्रीय आय अनुमान जारी किया है, तभी से मीडिया में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर के छह फीसदी से नीचे रहने को लेकर चर्चाओं एवं टिप्पणियों की भरमार नजर आ रही है। आर्थिक सुस्ती के कारणों और उसे दुरुस्त करने के लिए जरूरी कदमों को लेकर राजनीतिक दलों के भीतर और बाहर भी चर्चाओं ने जोर पकड़ा हुआ है। सरकार भी हालात की गंभीरता को देखते हुए आखिरकार तंद्रा से जगती हुई नजर आ रही है। यह काफी रहस्यमय है कि जब चार महीने पहले वर्ष 2016-17 की चौथी तिमाही के आंकड़े सामने आए थे, तब इतनी चर्चाएं और चौतरफा चिंता का माहौल क्यों नहीं बना था? मैं बिज़नेस स्टैंडर्ड में ही अगस्त में प्रकाशित अपने एक लेख में यह कह चुका हूं कि सीएसओ ने 31 मई को कहा था कि पिछले वित्त वर्ष की अंतिम तिमाही में वास्तविक सकल मूल्य वद्र्धन (जीवीए) की वृद्धि दर काफी गिरावट के साथ 5.6 फीसदी पर आ गई है जबकि 2015-16 की समान अवधि में यह 8.7 फीसदी रही थी। जीवीए काफी हद तक 'उत्पादन लागत पर जीडीपीÓ जैसा ही है। जीडीपी की गणना के बारे में 2015 में नई पद्धति अपनाने से पहले 'उत्पादन लागत पर जीडीपीÓ को ही आर्थिक विकास का सामान्य पैमाना माना जाता रहा है। वर्तमान वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भी जीवीए बिना किसी बदलाव के 5.6 फीसदी पर ही टिका रहा। इस तरह वर्ष 2017 के पहले छह महीनों में जीवीए 5.6 फीसदी पर ही बना रहा। वह भी एक अतिशय अनुमान ही लग रहा है क्योंकि सीएसओ की असंगठित एवं अनौपचारिक क्षेत्र तक पर्याप्त पहुंच नहीं होने से राष्ट्रीय आय का अनुमान भी सटीक नहीं होता है। हमें ध्यान रखना होगा कि असंगठित क्षेत्र नोटबंदी से बुरी तरह प्रभावित रहा है।
 
इन परिस्थितियों में आर्थिक वृद्धि को पटरी पर लाने के लिए किए जाने वाले उपायों पर ध्यान देना होगा। लेकिन उसके पहले हमें यह समझना होगा कि इस सुस्ती की वजह और पृष्ठभूमि क्या रही? चलिए, पहले पृष्ठभूमि पर नजर डालते हैं: 
 
वर्ष 2003-04 से लेकर 2007-08 के दरम्यान वार्षिक वृद्धि दर के 8.5 फीसदी के असाधारण स्तर पर रहने की सबसे बड़ी वजह वाजपेयी सरकार के समय (1998-2004) उठाए गए कदम थे। इसके अलावा वर्ष 2002-07 की अवधि की वैश्विक आर्थिक प्रगति का भी इसमें योगदान रहा था। उस तरह की तीव्र वैश्विक वृद्धि के अभाव और मनमोहन सरकार के समय आर्थिक सुधारों में शिथिलता रहने से भारत की आर्थिक प्रगति के सात फीसदी के करीब ही रहने का अनुमान है।
 
यह सच है कि मनमोहन सरकार के समय वित्त मंत्रियों- पी चिदंबरम और प्रणव मुखर्जी ने राजकोषीय अपव्यय कर 2008-09 से लेकर 2010-11 तक तीव्र वृद्धि दर का सिलसिला कायम रखा था लेकिन इसके चलते उपभोक्ता महंगाई दर रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची और भुगतान संतुलन का एक अल्पावधि संकट भी 2013 में देखने को मिला था। नतीजा यह हुआ कि 2012-13 और 2013-14 में विकास दर पांच फीसदी के नीचे आ गई। अगर राष्ट्रीय आय की गणना के नए मानदंड के हिसाब से देखें तब भी यह छह फीसदी से नीचे ही थी।
 
वर्ष 2014-15 में रफ्तार भरते हुए जीवीए वृद्धि 7.2 फीसदी पर पहुंच गई और 2015-16 में भी यह 7.9 फीसदी रही। इसकी सबसे बड़ी वजह वर्ष 2014 और 2015 में कच्चे तेल और अन्य जिंसों के अंतरराष्ट्रीय दाम कम होने से भारत को व्यापक व्यापार लाभ मिलना रही। लोकसभा चुनाव के बाद केंद्र में नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली सरकार बनने से भी कारोबारी भरोसा बहाल हुआ जिससे आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार बढ़ी। हालांकि सकल निर्धारित निवेश के रूप में इसका असर देखने को नहीं मिला जो 2015-16 में 29.3 फीसदी पर आ गई जबकि 2013-14 में यह 31.3 फीसदी पर रही थी।
 
इस पृष्ठभूमि में मौजूदा आर्थिक शिथिलता की प्रमुख वजहें ये रही हैं:
 
जिंस उत्पादों की कीमतें बढऩे से व्यापार लाभ की स्थिति खत्म हो गई है।
 
नवंबर 2016 में गलत समय पर और गलत सलाह के चलते नोटबंदी की गई और उसका क्रियान्वयन भी खराब रहा जिससे नकदी पर आश्रित असंगठित क्षेत्र में उत्पादन और रोजगार बुरी तरह प्रभावित हुआ। वस्तुओं एवं सेवाओं के सभी छोटे कारोबारी भी नोटबंदी की चपेट में आए और संगठित क्षेत्र पर भी इसने विपरीत प्रभाव डाला। अक्टूबर 2016 से लेकर जून 2017 की अवधि में नोटबंदी की वजह से जीवीए वृद्धि पर 1-2 फीसदी का नकारात्मक प्रभाव रहा।
 
पिछले 18 महीनों में डॉलर के मुकाबले रुपये का मूल्य बढऩे से निर्यातकों और आयात-आधारित उत्पादन पर भी विपरीत असर देखा गया।
 
दोहरी बैलेंस शीट समस्या बनी रहने से खासकर सार्वजनिक बैंकों और कर्ज लेने वाली कंपनियों पर ऋण, निवेश एवं वृद्धि संभावनाएं प्रभावित हुईं।
 
वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का डिजाइन और इसका क्रियान्वयन खराब रहने से जून 2017 से कारोबार पर खासा दबाव देखा गया। इन गतिरोधों का खास तौर पर उन छोटे कारोबारियों एवं निर्यातकों पर बेहद गहरा असर रहा है जिन पर पहले नोटबंदी की मार पड़ चुकी थी।
 
ऐसी स्थिति में आर्थिक रफ्तार में तेजी लाने के लिए फौरी तौर पर क्या किया जा सकता है? चुनौतियां बेहद गंभीर हैं और अतीत के असर के चलते संभावनाएं भी काफी कम हैं:
 
आने वाले दिनों में भी व्यापार लाभ के हालात बनने के कोई हालात नहीं दिख रहे हैं। नोटबंदी लागू हो चुकी है और अर्थव्यवस्था को इसकी मार झेलनी ही होगी।
 
रुपये के अधिमूल्यन को उसके संभव स्तर तक दुरुस्त किया जाना चाहिए। ऐसे संकेत हैं कि भारतीय रिजर्व बैंक और सरकार इस दिशा में जागरूक हो रही हैं।
 
दोहरी बैलेंस शीट समस्या के प्रस्ताव पर काम चल रहा है लेकिन इस प्रक्रिया में लंबा समय लगने की आशंका है। ऐसे में बैंकों को यह बताया जाना चाहिए कि अधिक कर्ज देने से कोई फायदा नहीं होगा बल्कि समस्या और बढ़ ही जाएगी।
 
सरकार को जीएसटी के डिजाइन, सॉफ्टवेयर, प्रक्रिया और प्रशासन में मौजूद खामियों को दुरुस्त करने पर खास ध्यान देना होगा। सरकार के शीर्ष पर बैठे लोगों का इस समस्या के प्रति उदासीन नजर आना काफी दुखद है। यह काम आसान नहीं है और आने वाली कई तिमाहियों तक जीएसटी आर्थिक प्रगति को बाधित करती रह सकती है। 
 
आर्थिक गतिविधियों में तेजी लाने के लिए प्रोत्साहन पैकेज को लेकर मचा शोर पूरी तरह नाजायज है। सरकार की वित्तीय स्थिति कमजोर होने, जीएसटी से मिलने वाले राजस्व को लेकर गहरी अनिश्चितता होने और राजकोषीय घाटे के मुश्किल से पटरी पर आने की स्थिति में प्रोत्साहन की मांग अनुचित है। भुगतान संतुलन में चालू खाते का घाटा तेजी से बढऩे से संतुलन के वृहत अवयव अब धूमिल पडऩे लगे हैं। रिजर्व बैंक ने राजकोषीय प्रोत्साहन पैकेज के खिलाफ आपत्ति जताकर बिल्कुल सही किया है। इन सभी बिंदुओं को ध्यान में रखा जाए और उन पर तेजी से कदम उठाया जाए तो 2017-18 के अंत तक जीवीए वृद्धि दर 6-6.5 फीसदी तक पहुंच सकती है। हालांकि रिजर्व बैंक ने 2017-18 की चौथी तिमाही के लिए 7.7 फीसदी विकास दर का जो अनुमान लगाया है वह जमीनी हकीकत के बजाय उम्मीद पर अधिक आधारित लगता है।
 
(लेखक इक्रियर के मानद प्रोफेसर और भारत सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार हैं। लेख में व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं)
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 कर में छूट से बढ़ेंगे ऑनलाइन भुगतान?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS General News   Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.