बिजनेस स्टैंडर्ड - सक्षम वायुसेना बनाने की दिशा में पांच जरूरी कदम
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सक्षम वायुसेना बनाने की दिशा में पांच जरूरी कदम

दोधारी तलवार
अजय शुक्ला /  October 16, 2017

वायुसेना दिवस (8 अक्टूबर) हमें वायुसेना की सबसे बड़ी चिंता पर नए सिरे से विचार करने का अवसर देता है। वह चिंता है उसकी टुकडिय़ों की तादाद में आ रही कमी और दिए गए बजट में इस संकट से निपटने की चुनौती। सैन्य नीतिकारों का अनुमान है कि वायुसेना को 42 लड़ाकू विमान बेड़ों की जरूरत है ताकि वह पाकिस्तान और चीन के दो मोर्चों पर मिल रही चुनौती से निपट सके। वायुसेना के पास फिलहाल 33 बेड़े हैं जिनमें से 10 मिग 21 और मिग 27 विमानों के हैं जिनकी सेवानिवृत्ति लंबे समय से लंबित है। तेजस और सुखोई-30एमकेआई लड़ाकू विमान जल्द आ रहे हैं लेकिन वे मिग की कमी तत्काल पूरी नहीं कर पाएंगे, बेड़े बढ़ाने की तो बात ही दूर है। 

 
हर लड़ाकू बेड़े में 21 विमान होने चाहिए। इनमें 16 एक सीट वाले विमान, दो सीट वाले दो प्रशिक्षु विमान और तीन रखरखाव वाले आरक्षित विमान शामिल हैं। वायुसेना में 600 लड़ाकू विमान हैं और हर बेड़े में 21 विमानों के हिसाब से देखें तो 29 बेड़े बनते हैं। यानी देश के 33 बेड़ों में से अधिकांश 21 विमानों से कम के साथ काम कर रहे हैं।  वायुसेना को जरूरी धन क्यों नहीं आवंटित किया जा रहा? उसे नए उपकरणों के लिए पूंजीगत बजट का 43 फीसदी दिया जा चुका है। अतिरिक्त पूंजी केवल रक्षा व्यय बढ़ाकर ही मिल सकती है। या फिर सेना और नौसेना के व्यय पर ऐसा हो सकता है। सेना को पहले ही कुल पूंजीगत बजट का एक तिहाई से भी कम मिलता है। इसे कम करना नामुमकिन है। नौसेना की हिंद महासागर में अहम भूमिका है। उसके पास भी युद्धपोत कम हैं और वह अपने बजट को 25 फीसदी से नीचे नहीं आने दे सकती।
 
जाहिर है वायुसेना को अपने खर्च में समझदारी बरतनी होगी। वायुसेना 22 अपाचे लड़ाकू हेलीकॉप्टरों पर 2 अरब डॉलर की राशि व्यय कर चुकी है। उसे संतुलन कायम करना होगा। उसे एक ओर राफेल जैसे उन्नत और महंगे विमान लेने होंगे तो दूसरी ओर कम खर्च वाले विमानों की मदद से देश के वायु क्षेत्र की रक्षा करनी होगी। लड़ाकू पायलट को कमतर विमान में नहीं भेजा जाना चाहिए लेकिन श्रेष्ठता की होड़ देश को पर्याप्त विमानों से महरूम कर देगी। राफेल का सौदा 58,000 करोड़ रुपये का है। यही वजह है कि वायुसेना 126 के बजाय 36 लड़ाकू विमानों पर सीमित हो गई। 
 
बिना गुणवत्ता से समझौता किए तादाद बढ़ाने के लिए वायुसेना को पांच मोर्चों पर काम करना होगा। वायुसेना प्रमुख ने हाल ही में कहा कि 2032 में वायुसेना की शताब्दी पूरी होने तक उसके पास पर्याप्त बेड़े होंगे। यह भविष्य की बात है और फिलहाल बेमानी है। वायुसेना को लक्ष्य प्राप्ति की विस्तृत योजना पेश करनी चाहिए। इसके लिए पांच बिंदुओं का खाका इस प्रकार है।
 
सबसे पहले आईएएफ को छह में से चार जगुआर ग्राउंड स्ट्राइक बेड़ों को उन्नत बनाना चाहिए। यह काम काफी समय से टल रहा है। इनमें बेहतर इंजन, नेविगेशन अटैक प्रणाली, बेहतर रडार और हवाई और जमीनी मार करने लायक हथियार लगाना शामिल है। तीन मिराज 2000 और तीन मिग 29 बेड़ों को पहले ही उन्नत किया जा रहा है। इससे 2032 तक कम से कम 10 बेड़ों की लड़ाकू क्षमता बनी रहेगी।
 
दूसरा, वायुसेना को देसी लड़ाकू विमान के विकास की योजना का स्वागत करना चाहिए। खासतौर पर तेजस मार्क 1ए का। इसके बाद एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एएमसीए) के विकास पर ध्यान दिया जाना चाहिए जो पांचवीं पीढ़ी का उन्नत विमान है। वायुसेना ने 84 तेजस मार्क 1ए विमानों की खरीद प्रक्रिया शुरू की है। यह शुरुआती तेजस की तुलना में उन्नत है। बेहतर रडार व्यवस्था, हवा में ईंधन भरने की सुविधा, दुश्मन के रडार से सुरक्षा के लिए जैमर आदि इसमें शामिल हैं। नया विमान पहले वाले की तुलना में जल्दी मैदाने जंग में वापसी करने में सक्षम है। सन 2032 तक तेजस के आठ बेड़े वायुसेना का हिस्सा होंगे।
 
वायुसेना को देसी एएमसीए तैयार करने पर काम करना चाहिए। अगर 2032 तक हम ऐसा कर सके तो वह उन्नत मिग 29 और मिराज 2000 की जगह ले सकता है। अगर एक इंजन वाले लड़ाकू विमान बनाने के लिए विदेशी सहयोग शीघ्र हो सका तो इससे भी 2032 तक छह नए बेड़े तैयार करने में मदद मिलेगी। 
 
तीसरा, वायुसेना को हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड और सुखोई के बीच सहयोग के जरिए पांचवी पीढ़ी के लड़ाकू विमान विकसित करने की दिशा में काम करना। यह विमान आगे चलकर सुखोई 30एमकेआई की जगह ले सकता है। जुलाई में रक्षा मंत्रालय की विशेषज्ञ समिति ने कहा था कि भारतीय इंजीनियरों को रूसी विशेषज्ञों से जो तकनीकी ज्ञान मिलेगा वह एएमसीए परियोजना में मददगार साबित होगा। एचएएल के प्रमुख टी सुवर्ण राजू कहते हैं कि अगर भारत ने तेजी दिखाई तो एचएएल को एफजीएफ कॉम्बैट सिस्टम की साझा डिजाइनिंग करने का अवसर मिलेगा। इसमें नेविगेशन के नए तरीके, रडार और अन्य उपकरण शामिल हैं। इसमें भारत को केवल 3.1 अरब डॉलर की राशि वहन करनी होगी जो काफी कम है। इस परियोजना में देर करना ठीक नहीं।
 
चौथा, वायुसेना को अब राफेल के दो और बेड़े खरीदने पर विचार करना चाहिए क्योंकि केवल दो राफेल बेड़ों के लिए रखरखाव का बुनियादी ढांचा तैयार करना समझदारी  नहीं दिखती। 
 
पांचवीं और अंतिम बात, वायुसेना को हवाई टैंकरों जैसे मैदाने जंग में आपूर्ति पहुंचाने के देसी उपाय विकसित करने चाहिए। इसके अलावा हवाई चेतावनी और मौजूदा लड़ाकू क्षमताओं का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करने के उपाय भी विकसित करने चाहिए। हमें अपने लड़ाकू बेड़े में सैटेलाइट संबंधी डाटा लिंक का इस्तेमाल करना होगा ताकि हवाई जागरूकता और हथियारों का निशाना सुधार जा सके। बड़ा सवाल यही है कि क्या वायुसेना और रक्षा मंत्रालय मिलकर इस दिशा में काम  कर पाएंगे? 
Keyword: india, defense, air force,,
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