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पश्चिम एशिया और खाड़ी पर रखें नजर

श्याम सरन /  October 16, 2017

भारत को अपने आसपास के क्षेत्र में हो रहे राजनीतिक और सामाजिक बदलाव का गहन विश्लेषण करना चाहिए क्योंकि यह उसके अपने समाज को प्रभावित कर सकता है। विस्तार से बता रहे हैं श्याम सरन 

 
भारत के पश्चिमी पड़ोस की बात करें तो यह ईरान से लेकर तुर्की तक विस्तारित है। बीते एक दशक या उससे अधिक समय से यह लगातार उथलपुथल का शिकार रहा है। इस क्षेत्र में जो कुछ हो रहा है वह हमारी विदेश नीति के लिए चिंता का विषय है। खाड़ी में करीब 60 लाख भारतीय रहते और काम करते हैं। वे जो पैसा भेजते हैं वह देश के विदेशी मुद्रा भंडार में अहम हैसियत रखता है। यह इलाका हमारी ऊर्जा आपूर्ति में भी अहम योगदान करता है। उस क्षेत्र से हमारी विविधतापूर्ण आबादी के गहरे धार्मिक और सांस्कृतिक संबंध भी हैं। ऐसे में इस क्षेत्र में होने वाला कोई भी राजनीतिक या आर्थिक घटनाक्रम भारत को कई तरह से प्रभावित करता है। इससे कई तरह के जोखिम भी जुड़े हैं।
 
युद्धग्रस्त इराक अथवा लीबिया में फंसे कुछ हजार भारतीय नागरिकों को निकालने के क्रम में ही हमें अपने इतने संसाधन झोंकने पड़ते हैं। अगर यह तादाद बढ़कर लाखों में हो जाए तो चुनौती कितनी विकराल हो जाएगी इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। क्या इन तमाम लोगों को उन राज्यों में दोबारा बसाया जा सकता है जहां से वे मूलरूप से आते हैं। क्या इन राज्यों में यह क्षमता है कि वे अचानक आने वाली इस आबादी का बोझ संभाल सकें? क्या हमारे पास इन देशों में रहने वाले भारतीय नागरिकों का विस्तृत और सिलसिलेवार डाटा है, क्या हम उनके मूल राज्यों और उनके कौशल आदि से परिचित हैं? क्या हमारे पास इतने संसाधन तैयार हैं कि अचानक जरूरत पडऩे पर इतने बड़े पैमाने पर लोगों को निकाला जा सके? क्या हमारे पास ऐसे साझेदार हैं जो ऐसी ही स्थिति में फंस सकते हों और इस दौरान हमारे साथ सहयोग कर सकते हों? क्या हम इस क्षेत्र में स्थित लेकिन युद्ध क्षेत्र से बाहर के कुछ मित्र राष्ट्रों को कह सकते हैं कि वे हमारे लोगों को अस्थायी शरण दें और उनकी व्यवस्थित निकासी में हमारी मदद करें? 
 
हमने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड की बैठक में इससे संबंधित कवायद शुरू की थी लेकिन इस बारे में आगे और जानकारी नहीं है। इसे प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इस क्षेत्र पर हमारी ऊर्जा निर्भरता और किसी संभावित हलचल पर हमारी प्रतिक्रिया की भी समीक्षा आवश्यक है। परंतु मेरा मानना है कि हमें इस क्षेत्र के राजनीतिक और सामाजिक बदलावों का समयबद्ध विश्लेषण करते रहना चाहिए क्योंकि इस क्षेत्र से हमारे बहुलतावादी समाज के धार्मिक और सांस्कृतिक संबध बहुत गहरे हैं।
 
मैं हाल ही में जॉर्डन की यात्रा पर गया था जो इस पूरे इलाके में शांति और स्थिरता का प्रतीक है। वहां जाकर मुझे अहसास हुआ कि इस पूरे इलाके में किस कदर राजनीतिक बंटवारा हो चुका है। सीमाओं का पुनर्निर्धारण हो रहा है, सांस्कृतिक, पंथ आधारित और सांप्रदायिक विवाद बढ़ रहे हैं और इस क्षेत्र का भविष्य काफी उथलपुथल भरा है। सऊदी अरब और ईरान इस क्षेत्र की दो अहम ताकत हैं और दोनों में टकराव लगातार बढ़ रहा है। इससे अन्य स्थानीय संघर्ष उपज रहे हैं और नए समीकरण बन रहे हैं। इस क्षेत्र में अमेरिकी नौसेना की भी काफी तगड़ी पकड़ है। परंतु वह इस इलाके में अपने स्थानीय साथियों की मदद से अधिक से अधिक सक्रिय बना हुआ है, बजाय प्रत्यक्ष हस्तक्षेप के।
 
इस क्षेत्र की हालिया लड़ाइयों में माना गया कि शिया समुदाय ताकतवर होकर उभरा। सीरिया में असद अभी भी सत्ता में हैं और सरकारी सेनाओं की विद्रोहियों पर मजबूत होती पकड़ के साथ युद्ध सिमट रहा है। वहीं इराक में इस्लामिक स्टेट आखिरकार परास्त हो गया है। इसका मुकाबला करने के लिए अमेरिका ने इराक में कुर्दों को बढ़ावा दिया ताकि शिया बहुल और तेल से समृद्ध ईरान को कमजोर किया जा सके। वह ईरान के परमाणु समझौते को रद्द करना चाहता था ताकि नए प्रतिबंध लगाकर उस पर दबाव बनाया जा सके। 
 
सीरिया में रक्का जैसे विद्रोहियों के कब्जे वाले इलाकों में असद विरोधी सेनाओं के लिए ठिकाना बनाने का प्रयास है। वहीं यमन में घटित हो रही भीषण त्रासदी से सबने आंख मूंद रखी हैं। सऊदी अरब यमन को बमबारी करके दोबारा पत्थर युग में पहुंचाने पर तुला हुआ है। ऐसा केवल इसलिए किया जा रहा है ताकि वहां के शिया ईरान के साथ गठबंधन न करें। पूरे इलाके में पंथ आधारित सीमाएं मुखर हो रही हैं। जो देश कोई पक्षधरता नहीं दिखा रहे हैं उनकी स्थिति भी ठीक नहीं। यह भी स्पष्टï है सऊदी अरब और इजरायल के बीच पहले ही स्वत: गठबंधन होता नजर आ रहा है। 
 
ये दोनों देश ईरान के क्षेत्रीय दबदबे को खत्म करना चाहते हैं। संबंध सुधार की इस प्रक्रिया में सऊदी अरब और मिस्र की काफी अहम भूमिका रही है। ऐसा लगता नहीं कि अब हमास इजरायल के लिए कोई चुनौती पेश करेगा। यह बात इजरायल के लिए बहुत फायदेमंद है। जहां तक अमेरिका की बात है तो यह स्पष्टï है कि फिलहाल उसके हित सुन्नी ताकतों के साथ रहने में सध रहे हैं। हालांकि वह अपने दीर्घावधि के सुरक्षा हितों को देखते हुए स्थानीय स्तर पर कुछ समायोजन कर सकता है।
 
माना तो यही जा रहा है कि यह माहौल बना रहेगा बल्कि आने वाले दिनों में इसमें और अधिक इजाफा हो सकता है। ऐसे हालात में भारत के लिए इस क्षेत्र की अहम ताकतों के साथ संतुलित रिश्ते कायम रखना मुश्किल हो सकता है। यहां तक कि जॉर्डन जैसे सुरक्षित इलाकों पर भी शरणार्थियों का बोझ पड़ रहा है। पहले फिलीस्तीन, उसके बाद इराक युद्घ और सीरिया युद्घ के शरणार्थी। महज एक दशक के भीतर जॉर्डन की आबादी 40 लाख से बढ़कर 1.1 करोड़ के स्तर पर पहुंच गई है। 
 
देखा जाए तो बहुलता और अपेक्षाकृत उदारता भरे मुल्क के रूप में जॉर्डन के लिए ऐसे बंटे हुए क्षेत्र में सुचारु रूप से काम करते रहना अत्यंत अविश्वसनीय माना जा सकता है। इराक और सीरिया दोनों अब धर्मनिरपेक्ष और बहुलतावादी नहीं रह गए हैं। यह दर्जा अब केवल जॉर्डन के पास रह गया है। इस क्षेत्र में जो कुछ हुआ है वह बताता है कि इसकी बहुलता की विरासत कितनी भंगुर है। ये तमाम मुल्क हमारे पश्चिमी पड़ोसी मुल्क हैं। हमें इस पूरे वाकये से सबक लेना होगा। हमारे भविष्य की बेहतरी के लिए यही जरूरी है। 
 
(लेखक पूर्व विदेश सचिव हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।)
Keyword: india, defense,,
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