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सहमति याचिका दाखिल करने का समय घटाएगा सेबी

श्रीमी चौधरी / मुंबई 10 15, 2017

बदलाव की योजना बना रहा सेबी

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) सहमति व्यवस्था के ढांचे में बदलाव की योजना बना रहा है, जिसका इस्तेमाल कथित तौर पर गड़बड़ी करने वाले बाजार नियामक के साथ लंबित मामलों के निपटान के लिए करते हैं। सूत्रों ने कहा कि सेबी ऐसे आवेदन दाखिल करने की समयसीमा दो महीने से घटाकर महज दो हफ्ते कर सकता है। मौजूदा नियम के मुताबिक, किसी इकाई को कारण बताओ नोटिस जारी किए जाने के बाद दो महीने से कम अवधि में सहमति याचिका दाखिल करनी होती है।

सहमति की व्यवस्था के तहत (विवाद निपटान का वैकल्पिक तरीका) कथित तौर पर गड़बड़ी करने वाला गलती स्वीकार कर या इसे स्वीकारे बिना दंडात्मक कदम को स्वीकार कर मामले का निपटान कर सकता है। इस प्रावधान का इस्तेमाल कठिन व लंबी कानूनी प्रक्रिया में कटौती के लिए किया जाता है। आवेदन की समयसीमा घटाए जाने का मकसद सहमति निपटान प्रक्रिया में तेजी लाना है। सूत्रों ने कहा कि सेबी 15 दिन की तय समयसीमा के बाद तभी स्वीकार करेगा जब आवेदक देरी के लिए वैध कारण सामने रखेगा। इसके अलावा आवेदक को देरी की अवधि के लिए निपटान की रकम के साथ ब्याज चुकाना पड़ सकता है। एक सूत्र ने कहा, इस बारे में एक परिपत्र इस महीने जारी किया जाएगा।

सूत्रों ने कहा, बाजार नियामक देरी के प्रति चिंतित था और सेबी के अधिकारी उचित व समयबद्ध तरीके से लंबित मामलों के निपटान की खातिर दबाव में थे। मोटे तौर पर पूरी सहमति प्रक्रिया में छह से आठ महीने लगते हैं। जब कोई इकाई सहमति याचिका दाखिल करता है तो आवेदक की तरफ से पेश निपटान की शर्तें सेबी की उच्च अधिकार प्राप्त सलाहकार समिति के सामने रखी जाती है, जिसकी अगुआई उच्च न्यायालय के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश व तीन अन्य विशेषज्ञ करते हैं।

सभी तथ्यों व परिस्थितियों का विश्लेषण करने के बाद उच्च अधिकार प्राप्त सलाहकार समिति यह सिफारिश करती है कि क्या यह आवेदन स्वीकार किया जाना चाहिए। इसके बाद सेबी के दो पूर्णकालिक सदस्यों की समिति इन सिफारिशों पर विचार करती है और अंतिम फैसला लेती है। हालांकि कानूनी विशेषज्ञों ने कहा कि इस ढांचे में और सुधार की गुंजाइश है। साथ ही सेबी के आंकड़ों से पता चलता है कि स्पष्टता के अभाव के चलते इसके जरिए बहुत ज्यादा मामलों का निपटान नहीं हो रहा है।

फिनसेक लॉ एडवाइजर्स के संस्थापक संदीप पारिख ने कहा, यह निश्चित तौर पर सहमति प्रक्रिया में तेजी लाएगा। साथ ही सेबी की सहमति समिति की भी प्रक्रिया में तेजी लानी चाहिए और मामले का निपटान समयबद्ध तरीके से करना चाहिए। साल 2016-17 के दौरान सेबी को 171 आवेदन मिले थे और 103 आवेदनोंं पर इसने आदेश पारित किए। इन मामलों में निपटान की कुल रकम महज 13 करोड़ रुपये थी। वित्त वर्ष 2017 में बाजार नियामक को करीब 177 सहमति आवेदन मिले थे। हालांकि जब सहमति की व्यवस्था लागू की गई थी तब तीन साल में सेबी को 600 सहमति आवेदन मिले थे।
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