बिजनेस स्टैंडर्ड - पेशेवर प्रबंधक और कारोबारी में अंतर
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पेशेवर प्रबंधक और कारोबारी में अंतर

अजित बालकृष्णन /  October 15, 2017

कारोबारी, उद्यमी और पेशेवर प्रबंधक आदि उपमाओं के पीछे के सच को उजागर करता हुआ विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं अजित बालकृष्णन

 
पिछले दिनों जब एक सम्मेलन में मेरा परिचय एक 'कारोबारी' के तौर पर कराया गया तो मैंने खुद को अजीब दुविधा में पाया। मैं इस परिचय में सुधार के उद्देश्य से करीब-करीब खड़ा ही हो गया था कि तभी कूटनीतिक समझ की भावना ने मुझे रोक लिया। उस वक्त से मैं यह आत्मावलोकन कर रहा हूं कि आखिर 'कारोबारी' शब्द मुझे निंदनीय क्यों प्रतीत होता है? मुझे लगा कि अगर मेरा परिचय किसी 'उद्यमी' के रूप में कराया गया होता तो शायद मुझे इतना बुरा नहीं लगता। क्या इसका संबंध मेरी मध्यमवर्गीय परवरिश से है (मेरे पिता अैर नाना दोनों चिकित्सक थे) जिसने मुझे कारोबारी कहे जाने पर असहज कर दिया? या फिर मेरा आईआईएम स्नातक होना इस बात में आड़े आ रहा है?
 
सन 1960 के दशक में जब भारतीय प्रबंध संस्थानों की स्थापना की गई थी तब उनके देश के उभरते औद्योगिक परिदृश्य में प्रबंधकों की कमी दूर करने के उपाय के रूप में देखा गया। उस वक्त औद्योगिक क्षेत्र का मतलब था भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स, हिंदुस्तान मशीन टूल्स और हिंदुस्तान लीवर जैसी निजी क्षेत्र की चंद कंपनियां।  पारंपरिक परिवार संचालित और परिवारों के स्वामित्व वाले कारोबार और ब्रिटिश औपनिवेशिक युग की कंपनियों ने आईआईएम और आईआईटी पर कोई ध्यान नहीं दिया। उस युग का निर्देशक मंत्र सन 1967 की एक किताब में निहित है जिसका शीर्षक है 'द प्रोफेशनल मैनेजर'। यह किताब स्लोन स्कूल ऑफ मैनेजमेंट के डगलस मैकग्रेगर द्वारा लिखी गई है। प्रोफेसर मैकग्रेगर ने तो थोड़े समय के लिए आईआईएम कलकत्ता में अध्यापन भी किया । स्लोन स्कूल का नाम भी लंबे समय तक जनरल मोटर्स के प्रमुख रहे अल्फ्रेड पी स्लोन के नाम पर रखा गया था। 
 
स्लोन ने खुद भी एक किताब लिखी है जिसका शीर्षक है 'माई इयर्स विद जनरल मोटर्स'। इस किताब में बहुत विस्तार से इस बात का ब्योरा है कि कैसे उन्होंने सन 1920 के दशक में जनरल मोटर्स की तस्वीर बदल दी। कंपनी उस वक्त भारी संकट से गुजर रही थी जो कंपनी के संस्थापक विल ड्यूरंट छोड़ गए थे। जब स्लोन ने सन 1920 के दशक के आरंभ में काम संभाला तो जनरल मोटर्स सही मायनों में गड़बड़ी की शिकार थी। महज 12 साल के समय में कंपनी ने खुद को दुनिया की प्रमुख वाहन निर्माता कंपनी के रूप में स्थापित किया और अमेरिका की सबसे बड़ी नियोक्ता बन गई। स्लोन ने उत्पादों में बेहतरी की मदद से तो ऐसा किया ही बल्कि कारोबार में पेशेवर प्रबंधकों को शामिल करने से भी इस पर असर हुआ। इसके साथ ही यह अवधारणा जन्मी कि पेशेवर प्रबंधक जरूरी हैं। उस युग के औद्योगिक दिग्गजों यानी तेल और वाहन कंपनियों का दौर था जिन्होंने पेशेवर प्रबंधकों को खुले दिल से अपनाया। दुनिया भर में बिज़नेस स्कूल सामने आए। भारत के आईआईएम भी इसका उदाहरण थे। 
 
आईआईएम जैसे इन बिज़नेस स्कूल में मूल विचारधारा थी: पेशेवर प्रबंधकों को कारोबारी प्रबंधन संस्थानों से चुनना जो बड़े उद्यमों को प्रभावी ढंग से चला सकें। प्रबंधन से तात्पर्य था अधिकार सौंपना, निर्णय प्रक्रिया के केंद्रीकरण को अन्य प्रशासनिक तरीकों से बेहतर माना जाता था। ठीक वैसे ही जैसे मशीनीकृत विनिर्माण को हाथ से बने सामान से बेहतर माना जाता था। आईआईएम के पाठ्यक्रम में ऐसे कोर्स थे जो इसी दर्शन को सामने लाते थे। माना जाता था कि इसके छात्र देश को आधुनिक बनाने में मदद करेंगी।
 
परंतु अनचाहे ही सही लेकिन बिज़नेस स्कूल पेशेवर प्रबंधक तैयार करने से दूर हैं। उनके छात्र अब एनालिटिकल टूल्स और कौशल में शिक्षित हैं। इसकी एक वजह तो यह है कि ऐसे विश्लेषकों की मांग तेजी से बढ़ी है। यह मांग अमेरिका और ब्रिटेन के उन विधायी उपायों की वजह से है जिसके तहत जमा लेने वाले बैंकों को निवेश बैंकिंग और शेयर बाजार जैसे जोखिम भरे पेशे में प्रवेश की इजाजत दी गई। यह उस समय हुआ जब पेंशन योजनाओं और एंडोमेंट योजनाओं का पैसा छोटे पैमाने पर ही सही, शेयर बाजार में निवेश के लिए मुक्त किया गया। निवेश बैंकों और प्रबंधन सलाहकार कंपनियों की मांग ने कारोबारी स्कूलों की शक्ल ही बदल दी। आईआईएम भी इससे प्रभावित हुए। सबसे अच्छे वेतन वाले रोजगार वित्तीय सेवाओं और प्रबंधन सलाहकार उद्योगों में ही थे। परंतु आज अगर आप कारोबारी प्रकाशनों को देखें या टेलीविजन चैनलों पर बिज़नेस की खबरें देखें तो कारोबारी मालिक और उनके परिवार ही चर्चा में रहते हैं। यहां तक कि सूचना प्रौद्योगिकी सेवाओं और दवा क्षेत्र में भी, बेटे-बेटियां अपने पिताओं के वारिस बन रहे हैं। पेशेवर प्रबंधक अब परिदृश्य से बाहर हैं। 
 
क्या ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि भारतीय कारोबार मोटे तौर पर संसाधन आधारित कंपनियां हैं जिनमें सफलता की चाबी है जमीन, तेल या स्पेक्ट्रम जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण करना, बजाय कि उत्पाद या कारोबारी नवाचार के। उद्यमी, पेशेवर प्रबंधक, कारोबारी विश्लेषक, कारोबारी, वेंचर कैपिटलिस्ट और निजी इक्विटी मैनेजर आदि सभी कारोबारी क्षेत्र से ताल्लुक रखते हैं। पहले चरण में उद्योग को उत्पाद निर्माण के जोखिम से जूझना होता है, यानी क्या ये उत्पाद अथवा सेवा उपभोक्ताओं की समस्या का निदान कर पाएगा? कोई उद्यमी इसी चरण में उभरता है। एक बार जब इस जोखिम से निजात पा ली जाती है तो उद्यमी को बाजार जोखिम का सामना करना पड़ता है। यानी क्या अधिक तादाद में लोग इस उत्पाद या सेवा को खरीदने के इच्छुक होंगे? इस चरण में उद्यमी के कौशल को पेशेवर प्रबंधकों के साथ की आवश्यकता होती है। किफायती वितरण और आपूर्ति प्रक्रिया में इसकी मदद से समय और लागत की बचत होती है। एक बार उत्पाद जोखिम और बाजार जोखिम से निजात पाने के बाद उत्पादन के दायरे का जोखिम बढ़ जाता है। क्या इसे राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ सकता है? यहां कारोबारी अक्सर इस मोड़ पर दिखता है जहां उसके रिश्ते और पूंजी मददगार साबित हो सकते हैं, लागत नियंत्रण की उसकी पारिवारिक संस्कृति कारोबारी दृष्टिï से अहम साबित होती है। कारोबारी उद्योग के अगले चरण यानी गिरावट के लंबे दौर के लिए तैयार नजर आते हैं। उत्पाद और प्रक्रिया से जुड़ा नवाचार इस चरण में कोई भूमिका नहीं निभाता है। यह वह चरण है जहां कारोबारी अपने परिवार को इसमें शामिल करता है।  मुझे लगता है यही वजह है कि मुझे खुद को कारोबारी कहलाना पसंद नहीं है। 
Keyword: company, business,,
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