बिजनेस स्टैंडर्ड - नीतिगत संकट में देश और मोदी का अश्वमेध
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नीतिगत संकट में देश और मोदी का अश्वमेध

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  October 13, 2017

इतिहास हमें बताता है विजेता दो तरह के होते हैं। एक वे जो एक विजय अभियान के बाद अपनी स्थिति मजबूत करते हैं और शासन करते हैं। वे अपनी प्रजा की स्थिति सुधारते हैं और अपने साम्राज्य से संतुष्ट रहते हैं। दूसरी श्रेणी में वे आते हैं जो निरंतर मोर्चे पर रहते हैं। उनके लिए जीत एक जुनून की तरह होती है। इन दिनों मुगल इतिहास से उदाहरण लेना जोखिम भरा हो चुका है। अकबर और औरंगजेब के रूप में दोनों श्रेणियों के दो अहम सम्राटों की विरासत की तुलना यहां पर की जा सकती है लेकिन सम्राट अशोक का उदाहरण लेना अधिक श्रेयस्कर होगा क्योंकि उनकी जिंदगी में दोनों रूप नजर आते हैं। अपने कार्यकाल के पहले चरण में  वह एक जुनूनी और हलचल मचा देने वाले विजेता के रूप में नजर आते हैं। जबकि कलिंग युद्घ के बाद दूसरे चरण में वह सुधारवादी और शांत स्वभाव के शासक के रूप में सामने आते हैं। इस दूसरे चरण का प्रभाव बहुत दूरगामी है यह हम सब जानते हैं। इसमें उन्होंने आधुनिक शासन व्यवस्था के सिद्घांत पेश किए और एक मजबूत भारत की बुनियाद रखी। यह मजबूती एक पूरी सहस्राब्दि तक कायम रही। यह वही अशोक हैं जिनके प्रतीक हमारे राष्ट्रीय प्रतीक चिह्नï और ध्वज पर नजर आते हैं। 

 
सैन्य शक्ति की मदद से जंग जीतने का चलन तो बहुत पहले समाप्त हो चुका है। आज के नेता चुनावों, राजनीतिक गठबंधन आदि के जरिये राजनीतिक शक्ति हासिल करने का अभियान चलाते हैं। वर्ष 2014 की गर्मियों में नरेंद्र मोदी ने जो राजनीतिक जीत हासिल की उसका कोई साम्य भारतीय इतिहास में नहीं मिलता। नेहरू-गांधी परिवार के सदस्यों ने अतीत में उनसे ज्यादा सीटें भले ही जीती हैं लेकिन इससे पहले किसी पूर्व सत्ताधारी दल को इतनी भीषण पराजय का सामना नहीं करना पड़ा था। वह भी एक बाहरी व्यक्ति के हाथों। तब से अब तक उनके शासन का दो तिहाई वक्त बीत चुका है। खुद मोदी के लिए यह अपनी समीक्षा करने का अच्छा वक्त है।
 
ईमानदारी से कहें तो शायद वह इस बात से सहमत होंगे कि उन्होंने और उनके सिपहसालारों ने इस अवधि में कभी आराम नहीं किया। वे निरंतर अभियान चलाते नजर आए। ऐसा भी नहीं है कि सरकार और पार्टी केवल चुनाव जीतने की मशीन बनकर रह गए हैं। वे सरकारी एजेंसियों की मदद से अपने प्रतिद्वंद्वियों पर निशाना साध रहे हैं, दूरदराज स्थित राज्यों में जहां क्षेत्रीय नेताओं का वर्चस्व है वहां पार्टी अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही है। सरकार उस आलंकारिक वाकपटुता से भी पीछे हटने को तैयार नहीं है जिसने उसे चुनावी जीत दिलाई। इन बातों ने उसे शासन करने के धैर्य चाहने वाले बोरिंग काम से विमुख कर दिया है। मौजूदा निराशा इसी की देन है। यह संकट ऐसे समय में आया है जबकि उसके पास न तो सुधार के लिए पर्याप्त वक्त बचा है और न ही वह खोई हुई जमीन दोबारा हासिल कर सकती है। अब हर छह महीने में विधानसभा चुनाव होने हैं। आम चुनाव में 18 महीने बाकी हैं और इसलिए हर विधानसभा चुनाव अहम होगा। कोई भी सफल नेता अतीत की उपलब्धियों से संतुष्टï नहीं रहता। हमारा यह कहना नहीं है कि मोदी को राजनीतिक विस्तार का प्रयास नहीं करना चाहिए। परंतु महान नेता हमेशा यह कौशल और धैर्य रखते हैं कि वे अपनी प्राथमिकताएं तय कर सकें। इससे भी महत्त्वपूर्ण होती है उनकी राजनीतिक पूंजी। हर नेता के शुरुआती दौर में उसकी राजनीतिक पूंजी ऊंचे स्तर पर रहती है और फिर यह धीरे-धीरे कम होने लगती है। सबसे कड़े फैसले तब लेने चाहिए जब जनता का समर्थन अपने चरम पर हो और आपके पास अपने कदमों का नतीजा देखने का वक्त हो। मोदी सरकार ने अपनी धुन में यह अवसर गंवा दिया। उसने अर्थव्यवस्था सहित तमाम कड़े फैसले बाद के लिए छोड़ दिए। नतीजा मौजूदा संकट के रूप में हमारे सामने है। भाजपा और मोदी ने 2014 में जो अभियान चलाया उसमें अच्छे दिन, मजबूत राष्ट्रीय सुरक्षा नीति और भ्रष्टाचार से लड़ाई प्रमुख बिंदु थे। इनमें से तीसरे बिंदु को खूब बढ़ाचढ़ाकर पेश किया गया। कहा गया कि इतना कालाधन वापस आएगा कि हर भारतीय के खाते में 15 लाख रुपये डाले जा सकेंगे, कहा गया कि तमाम भ्रष्टï और ताकतवर लोग जेल जाएंगे और उनको सजा होगी। इसमें रॉबर्ट वाड्रा का नाम शामिल था।
 
चतुर शासक को मुकाम पर पहुंचने के बाद घोड़े से उतर जाना चाहिए। परंतु मोदी सरकार को उससे प्यार हो गया। नतीजा, बीते 42 महीनों की बैलेंस शीट में दिखाने के लिए कुछ खास नहीं है। कुछ छापे और पराजित प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ पेचदार कार्रवाई, नए तरह का कर आतंक और मामूली बेनामी धन। सरकार विजय माल्या के रूप में उदाहरण प्रस्तुत कर सकती थी लेकिन विजय माल्या फरार हो गया और ब्रिटेन में बैठे भारत को अंगूठा दिखा रहा है। नोटबंदी एक निडर कदम था लेकिन इसे बिना पूरा विचार किए लागू किया गया। यह भी काला धन सामने लाने में नाकाम रहा है। इससे डिजिटल लेनदेन को जरूर थोड़ा बल मिला। इसने असंगठित क्षेत्र को जबरदस्त नुकसान पहुंचाया और आपूर्ति शृंखलाएं ध्वस्त हो गईं। पहले से मंद अर्थव्यवस्था में बड़े पैमाने पर लोगों के रोजगार चले गए। इससे सरकार को जीएसटी की पूरी तैयारी का वक्त नहीं मिला जिसका नतीजा हम सभी देख रहे हैं। 
 
लगातार चुनावी मिजाज के कारण सरकार ने प्रमुख नीतिगत मुद्दों की अनदेखी कर दी। बुलेट ट्रेन इसका उदाहरण है। अगर इसे बनने में पांच साल लगने थे तो सरकार को कार्यकाल के आरंभ में इसे शुरू करना था ताकि कार्यकाल के आखिर तक उसे पता चल जाता कि इसका प्रदर्शन कैसा रहा।  अगले महज 18 महीनों में इसकी प्रगति नहीं आंकी जा सकती। इस बीच विपक्ष को मजाक उड़ाने का मौका मिल गया है।
 
इसी तरह बैंकों के सुदृढ़ीकरण, फंसे हुए कर्ज के निपटान, मुंबई तटवर्ती मार्ग तथा नए हवाई अड्डïे जैसे बुनियादी कामों की अभी आधारशिला तक नहीं रखी गई है। एक ऐसी सरकार जो अपनी परियोजना क्रियान्वयन क्षमता का दम भरती है उसके लिए यह शर्मिंदगी की बात है कि मुंबई में शिवाजी मेमोरियल जैसी उसकी बहुप्रचारित परियोजना की शुरुआत तक नहीं हो सकी है। मेक इन इंडिया अभियान में कोई खास प्रगति नहीं दिखती और राफेल के दो बेड़ों के ऑर्डर को छोड़ दिया जाए तो रक्षा उत्पादन या खरीद में भी कोई अहम पहल नहीं दिखती। चूंकि मौजूदा सरकार ने रक्षा सेनाओं के आधुनिकीकरण की बात कही है इसलिए यह बात ध्यान देने लायक है कि तीन साल की अवधि में इसने जो इकलौती आपूर्ति हासिल की है वह भी संप्रग द्वारा दिए गए ऑर्डर पर आधारित है। सैन्य आपूर्तियों में लंबा समय लगता है। परंतु साढ़े तीन साल की अवधि में असॉल्ट राइफल चुनने जैसा आधारभूत काम तक नहीं हो पाया है। 
 
बैंकिंग सुधार, वित्तीय पुनर्गठन, बुलेट ट्रेन से लेकर नवी मुंबई एयरपोर्ट तक और नए मझोले आकार के लड़ाकू विमान के चयन तक राजग के हाथ से समय फिसलता जा रहा है। नरेंद्र मोदी जैसे ऊर्जावान नेता ने इतना समय हाथ से क्यों निकल जाने दिया? एक परिकल्पना पर बात करें तो सन 2014 और उसके बाद राज्यों में मिली चुनावी जीत ने भाजपा को आश्वस्त कर दिया कि उसे दूसरा कार्यकाल तो मिलना ही है। उसे लगा कि पहले कार्यकाल में उसके पास वक्त है कि वह संपूर्ण भारतवर्ष में चुनावी जीत और समूचे क्षेत्रीय या राष्ट्रीय विपक्ष के पूरे खात्मे पर ध्यान केंद्रित करे। चाहे वह कितना भी छोटा और दूरवर्ती क्यों न हो? मान लिया गया कि एक बार संपूर्ण सत्ता हासिल होने के बाद बचे कार्यकाल में तमाम बड़े काम करने के लिए वक्त ही वक्त रहेगा। वैसे ही जैसे मजबूत टीम पहली पारी को कई बार हल्के में लेती है और अहम काम दूसरी पारी के लिए छोड़ देती है। परंतु, केवल क्रिकेट ही महान अनिश्चितताओं का खेल नहीं है। राजनीति भी बहुत निर्मम होती है और इसमें भी आश्वस्ति के लिए कोई जगह नहीं। मोदी सरकार की मौजूदा स्थिति से इसे समझा जा सकता है।
Keyword: narendra modi, development, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,
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