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तुलनात्मक संकेत

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  October 13, 2017

मोदी सरकार के प्रदर्शन को लेकर उठ रहे  सवालों में आर्थिक मंदी के बाद नई धार आई है। मोदी ने अपनी सार्वजनिक टिप्पणियों में मंदी के महत्त्व को कम किया है और अपने कार्यकाल की अन्य बातों मसलन भ्रष्टाचार की कमी, प्रभावी योजना क्रियान्वयन आदि पर बल दिया है। इस बीच जो आर्थिक आंकड़े सामने आ रहे हैं वे आर्थिक वृद्घि को लेकर बहस की जमीन तैयार करते हैं। यह बात दीगर है कि इसे लेकर रखी जा रही हर राय का अपना राजनैतिक झुकाव है। शासन व्यवस्था की गुणवत्ता को लेकर उठ रहे सवालों का आकलन करना कहीं अधिक मुश्किल है। उदाहरण के लिए क्या अपराध से जुड़े आंकड़े भय के उस कारक का संकेत हैं जिसका जिक्र आलोचक करते हैं और क्या इस बात को आंका जा सकता है कि मीडिया पर कितना दबाव है? 

 
वैश्विक शासन सूचकांक इनमें से कुछ मुद्दों पर प्रकाश डालता है। यह सूचकांक विश्व बैंक के पास उपलब्ध है। हालांकि बैंक तथा ब्रुकिंग्स जैसे अन्य सहयोगी संगठनों ने यह स्पष्टïीकरण दिया है कि वे इन आंकड़ों के लिए कतई उत्तरदायी नहीं हैं। इसमें छह संकेतक हैं जिनके आधार पर 214 अर्थव्यवस्थाओं का हर वर्ष आकलन किया जाता है। इस दौरान कई तरह के सर्वेक्षण, ओपिनियन पोल, व्यक्तिगत साक्षात्कार, विशेषज्ञों से मशविरा आदि जैसे उपाय अपनाए जाते हैं। परिभाषा के आधार पर देखा जाए तो यह अपूर्ण तरीका है और इसके आलोचकों की कमी नहीं है। इसके बावजूद अन्य किसी संकेतक का अभाव होने के चलते इसके आधार पर ही मोदी सरकार के कार्यकाल का आकलन करना उचित होगा। इस सूचकांक में वर्ष 2016 तक के आंकड़े उपलब्ध हैं।
 
पहला संकेतक है भ्रष्टाचार पर नियंत्रण और इस मामले में भारत को मिलने वाले अंक वर्ष 2013 के 37 से सुधरकर 2016 में 47.1 हो गए हैं। इस सूचकांक में 0 से 100 के पैमाने पर ज्यादा अंक बेहतरी के परिचायक हैं।  हालांकि 47.1 अंक मनमोहन सिंह की सरकार के 2006 के 46.8 के स्तर से थोड़ा ही बेहतर है। हालांकि सिंह के दूसरे कार्यकाल में तो सरकार तमाम घोटालों के आरोपों से घिर गई थी। 
 
सरकार के प्रभाव के आकलन में भी मोदी सरकार का प्रदर्शन बेहतर है। वर्ष 2014 के 45.2 से बढ़कर वर्ष 2016 में उसके अंक 57.2 हो गए हैं। यहां भी यह बात ध्यान देने लायक है कि वर्ष 2007 में मनमोहन सिंह के कार्यकाल में भारत के 57.3 अंक थे। सिंह के दूसरे कार्यकाल में इस मोर्चे पर भी गिरावट देखने को मिली और मोदी के काल में दुबारा सुधार हुआ। तीसरे संकेतक यानी नियामकीय गुणवत्ता के मामले में भी मोदी सरकार का प्रदर्शन बेहतर है। वर्ष 2012 में जहां देश के 35.1 अंक थे, वहीं 2016 में ये 41.3 हैं। हालांकि 2006 में यहां भी मनमोहन सिंह की सरकार 45.1 अंकों के साथ बाजी मार ले गई। 
 
राजनीतिक स्थिरता और ङ्क्षहसा में कमी के संकेतक पर भारत की समग्र रैंकिंग आश्चर्यजनक रूप से खराब है। वर्ष 2005 में भारत को 17.5 अंक मिले थे जो सर्वश्रेष्ठï प्रदर्शन है। कम अंकों के अलावा रुझान बिल्कुल समान है। वर्ष 2014 में 13.8 अंकों पर गिरने के बाद इसमें  सुधार हुआ। मोदी 2015 में इसे वापस 17.1 तक ले आए लेकिन 2016 में यह फिर गिरकर 14.3 पर जा पहुंचा जो 2005 से खराब स्तर था। यह याद रखना होगा कि वर्ष 2016 में कश्मीर में प्रदर्शनों में तेजी आई थी। वहीं आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक माओवादियों के नियंत्रण वाले इलाकों में बम धमाकों में 21 फीसदी की उछाल देखी गई। आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर मोदी सरकार को 2016 में स्पष्टï झटका लगा।
 
परंतु आखिरी दो संकेतकों पर यह रुख पूरी तरह बदल जाता है। विधि के शासन के मानक पर वर्ष 2016 में देश की रैंकिंग 52.4 थी जो 2013 के 53.1 से मामूली कम थी। यह 2006 के 58.4 अंकों से काफी कम थी। वहीं छठे और अंतिम संकेतक यानी बात कहने और जवाबदेही के मामले में आश्चर्य नहीं कि मोदी सरकार का प्रदर्शन बहुत बेहतर नहीं है। इस मोर्चे पर भारत वर्ष 2013 के 61.5 अंक से फिसलकर वर्ष 2016 में 58.6 अंक पर आ गया। कुल मिलाकर वर्ष 2014 के पहले के वर्षों से तुलना की जाए तो मोदी सरकार को तीन संकेतकों पर बढ़त हासिल है, दो जगह वह पीछे है और एक जगह वह लगभग बराबरी पर है। परंतु रुझान यह भी है कि मौजूदा सरकार का प्रदर्शन कमोबेश वैसा ही है जैसा कि पिछली सरकार का अपने पहले कार्यकाल के मध्य में था।
Keyword: narendra modi, development, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,
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