बिजनेस स्टैंडर्ड - उबर और ओला के बीच चल रही प्रतिद्वंद्विता खत्म कर सकती है सॉफ्टबैंक
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उबर और ओला के बीच चल रही प्रतिद्वंद्विता खत्म कर सकती है सॉफ्टबैंक

ओला-उबर की होड़ में सॉफ्टबैंक का नया मोड़
अलनूर पीरमोहम्मद /  10 12, 2017

दबदबा कायम करने की दौड़

जापान की दिग्गज निवेशक कंपनी सॉफ्टबैंक देश में टैक्सी एग्रीगेटर उबर और ओला के बीच चल रही प्रतिद्वंद्विता को खत्म कर सकती है। सॉफ्टबैंक ओला में 1 अरब डॉलर अतिरिक्त निवेश करने जा रही है और साथ ही उसकी उबर के लिए भी 20 अरब डॉलर जुटाने की योजना है। दोनों कंपिनयों में निवेश के चलते सॉफ्टबैक उनका विलय कर सकती है। ओला की सबसे बड़ी निवेशक सॉफ्टबैंकदुनिया के टैक्सी बाजार में अपना दबदबा कायम करना चाहती है और वह उबर को 20 अरब डॉलर का फंड जुटाने की प्रक्रिया में हिस्सा लेने के लिए कह सकती है।

कंपनी के संस्थापक मासायोशी सन का कहना था कि इस निवेश का मकसद दुनिया के सबसे बड़े बाजार अमेरिका में प्रवेश करना है। सन ने अगस्त में निवेशकों से कहा था, 'हम उबर के साथ चर्चा करना चाहते हैं। साथ ही हमारी दिलचस्पी लिफ्ट (अन्य राइड हेलिंग सर्विस) में भी है। लेकिन हमने अभी तक यह फैसला नहीं किया है कि इसका तरीका क्या होगा।' तबसे सॉफ्टबैंक ने उबर के साथ चर्चा को आगे बढ़ाया है और खबरों के मुताबिक दोनों कंपनियां समझौते के करीब पहुंच गई हैं।

इस समझौते के बाद अमेरिकी कंपनी उबर की भारतीय इकाई और भारतीय कंपनी ओला का विलय हो सकता है। भारतीय बाजार में बादशाहत के लिए दोनों कंपनियों में होड़ चल रही है और सॉफ्टबैंक इस लड़ाई में अपने फंड को नहीं झोंकना चाहेगी। इस तरह ओला को चुनौती देने का मौका मिलने से पहले ही उबर के तेवर ढीले हो सकते हैं।

ओला ने बुधवार को घोषणा की कि उसने टेनसेंट और सॉफ्टबैंक से 1.1 अरब डॉलर का फंड जुटाया है। कंपनी का दावा है कि 1 अरब डॉलर अतिरिक्त फंड जुटाने के लिए उसकी अन्य निवेशकों से बात चल रही है। इस तरह इस दौर में कंपनी की योजना 2 अरब डॉलर जुटाने की है।

बिज़नेस स्टैंडर्ड ने पहले खबर दी थी कि सॉफ्टबैंक ने ओला में अतिरिक्त निवेश का वादा किया है, बशर्ते वह अपने लक्ष्यों को पूरा करे। सॉफ्टबैंक की सबसे बड़ी मांग यह है कि ओला इलेक्ट्रिक मोबिलिटी क्षेत्र में भी उतरे। ओला अभी नागपुर में प्रयोग के तौर पर इलेक्ट्रिक वाहनों को चला रही है और उसकी देश के अन्य शहरों में भी इस तरह की सेवा शुरू करने की योजना है।

वर्चस्व की मंशा

उबर के वैश्विक संचालन में निवेश के हिस्से के तौर पर सॉफ्टबैंक ने भारत में उबर और ओला के विलय के लिए कोई शर्त नहीं रखी है लेकिन विशेषज्ञों और जानकारों का कहना है कि यह कदम अपरिहार्य है। इसका परिणाम यह होगा कि भारत के ऑनलाइन टैक्सी बाजार पर सॉफ्टबैंक का दबदबा हो जाएगा और कोई नई कंपनी इस क्षेत्र में आसानी से प्रवेश नहीं कर पाएगी। भारत में उबर और ओला के विलय के बारे में सोचें तो चीन में दीदी चुशिंग और उबर की स्थानीय इकाई का विलय दिमाग में आता है। दीदी में सॉफ्टबैंक का निवेश है और माना जा रहा है कि इस सौदे में उसने अहम भूमिका निभाई थी। इससे उबर को चीन के भारी भरकम टैक्सी बाजार में अच्छा खासा हिस्सा मिल गया। दोनों कंपनियों के विलय से बनी कंपनी में उबर की 30 फीसदी हिस्सेदारी है लेकिन परिचालन नियंत्रण उसके हाथ में नहीं है।

ओला के एक अधिकारी ने नाम न आने की शर्त पर कहा कि उबर में सॉफ्टबैंक के निवेश को भारत और दक्षिणपूर्व एशिया में प्रतिस्पद्र्घा कम करने की कोशिश के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। एक निवेशक के तौर पर उसकी कोशिश अपने निवेश के जोखिम को कम करने की है और केवल टैक्सी बाजार में ही ऐसा नहीं हुआ है बल्कि कई उद्योगों में हुआ है। उबर में सॉफ्टबैंक के निवेश से भारत में उबर और ओला का विलय हो सकता है लेकिन इसमें अभी समय लगेगा।

नई जंग

अगर उबर और ओला के बीच बाजार में हिस्सेदारी के लिए होड़ का विकल्प न हो तो फिर उनके बीच नई जंग इस बात को लेकर हो सकती है कि कौन सी कंपनी किसका अधिग्रहण करेगी। ओला को सॉफ्टवेयर की तरफ से पहले ही यह स्पष्टï संदेश मिला है कि उसे अपने प्रदर्शन में कहां सुधार करने की जरूरत है जबकि उबर अपनी तकनीकी विशेषज्ञता के साथ खुद अपना पक्ष मजबूत बनाने की कोशिश करेगी।

उद्योग के अधिकांश जानकारों और दोनों कंपनियों के सूत्रों का कहना है कि सॉफ्टबैंक भारत में ओला को उबर पर तरजीह देगी। वैश्विक कंपनियों के खिलाफ स्थानीय कंपनियों का साथ देना सन का मूलमंत्र रहा है। चीन में ई-कॉमर्स कंपनी अलीबाबा इसका उदाहरण है। 2000 के दशक की शुरुआत में जब एमेजॉन जैसी विदेशी कंपनियां चीन के बाजार में जगह बनाने की कोशिश कर रही थीं तो सॉफ्टबैंक ने अलीबाबा में निवेश किया था। इसी तरह उसने भारत में एमेजॉन को पछाडऩे के लिए पहले स्नैपडील और फिर फ्लिपकार्ट में निवेश किया। उबर और ओला दोनों भारतीय बाजार में अपनी बादशाहत का दावा करती हैं लेकिन स्वतंत्र विश्लेषकों का कहना है कि फिलहाल 60 फीसदी बाजार पर ओला का कब्जा है जबकि हिस्सा उबर के पास है। कई छोटी कंपनियां भी हैं लेकिन उनकी हिस्सेदारी नहीं के बराबर है। ओला और उबर ने इस बारे में कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

अनुमान से पहले एकीकरण

अलबत्ता उद्योग के जानकारों का कहना है कि देश में टैक्सी बाजार में एकीकरण अनुमान से पहले हो रहा है। उबर ने चीन और भारत के बाजारों में एक साथ प्रवेश किया था लेकिन चीन के बाजार के आकार को देखते उसने वहां भारत की तुलना में बहुत ज्यादा पैसा बहाया। दीदी को अपना कामकाज बेचने से पहले कंपनी वहां सालाना एक अरब डॉलर बहा रही थी। आने वाले वर्षों में भारत के टैक्सी बाजार में निवेश बढने की उम्मीद थी लेकिन एकीकरण से इसकी रफ्तार में उल्लेखनीय कमी आ सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि पैसा बहाने के अपने नुकसान हैं क्योंकि इससे तुरंत बाजार बनाने में मदद नहीं मिलती है। चीन में दीदी के उबर की स्थानीय इकाई का अधिग्रहण करने के तुरंत बाद उपभोक्ताओं ने किराया बढऩे की शिकायत की जबकि ड्राइवरों का कहना था कि उनकी कमाई घट रही है। बाजार में अकेली कंपनी होने के कारण दीदी ने अपनी शर्तों थोपीं और कमाई बढ़ाने के लिए किराया बढ़ा दिया। लेकिन कंपनी ऐसा कर सकती है क्योंकि वहां का बाजार पहले ही परिपक्व हो चुका है।

भारत में 1000 लोगों पर महज 5 कारें हैं और टैक्सी बाजार को एक बड़े अवसर के तौर पर देखा जा रहा है। रेडसीर कंसल्टिंग के मुताबिक फिलहाल देश के 2 अरब डॉलर के टैक्सी बाजार में ऑनलाइन टैक्सी बाजार की हिस्सेदारी 15 फीसदी है। अलबत्ता सरकार ने अभी तक इस क्षेत्र के लिए नियम नहीं बनाए हैं जिससे कंपनियों को भविष्य में कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
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