बिजनेस स्टैंडर्ड - सरकारी बैंकों को लेकर रुख में आए बदलाव
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सरकारी बैंकों को लेकर रुख में आए बदलाव

नीलकंठ मिश्रा /  October 12, 2017

भारतीय बैंकों को 1 अप्रैल, 2018 से आईएफआरएस का अनुपालन करना होगा। माना जा रहा है कि वह भी बैंकों के ऋण से होने वाले नुकसान का असमान वितरण ही करेगा। बता रहे हैं नीलकंठ मिश्रा

 
अभी हाल तक अधिकांश नीति निर्माता इस बात से सहमत नजर आ रहे थे कि सरकारी बैंकों को बहुत अधिक वृद्घि की आवश्यकता नहीं है। उनकी दलील थी कि बैंकिंग क्षेत्र में प्रचुर क्षमता मौजूद थी। बॉन्ड बाजार का विस्तार हो रहा था, गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) और नए लाइसेंस हासिल करने वाले छोटे वित्त बैंक लगातार नवाचार कर रहे थे। इसी तरह पूंजी की पर्याप्तता वाले निजी क्षेत्र के बैंक सालाना 20 फीसदी से अधिक की दर से अपना विस्तार कर रहे थे।
 
इसके अलावा सरकारी बैंकों की धीमी वृद्घि के चलते हाल की तिमाहियों में उनके शेयरों की कीमत में तेजी से गिरावट आई। सरकार की मान्यता रही है कि बैंकों का निजीकरण अत्यंत कम उथलपुथल और राजनीतिक जोखिम के साथ हो सकता है। बशर्ते कि दूरसंचार और विमानन क्षेत्र के अनुभव को दोहराया जा सके। सरकार ने बीएसएनएल या एयर इंडिया में  अपनी हिस्सेदारी कभी नहीं बेची। परंतु दूरसंचार और विमानन क्षेत्रों का निजीकरण हो सका क्योंकि ये कंपनियां अपनी बाजार हिस्सेदारी निजी क्षेत्र की कंपनियों के हाथों गंवा बैठीं। यही वजह है कि सरकार किसी सरकारी बैंक को विफल नहीं होने देना चाहती लेकिन वह इनको जरूरी पूंजी भी मुहैया नहीं करा रही। 
 
बहरहाल, हाल के दिनों में इस बात की स्वीकार्यता नजर आ रही है कि सरकारी बैंक एसएमई को ऋण उपलब्ध कराने की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं। खासतौर पर छोटे शहर-कस्बों में  इनकी अलग उपयोगिता है। इसके अलावा कमजोर सरकारी बैंक संवेदनशील उद्यमों तक पूंजी की पहुंच को बाधित करके आर्थिक मंदी को शायद बढ़ावा भी दे रहे हैं। ये उद्यम इतने छोटे हैं कि बॉन्ड बाजार तक उनकी पहुंच नहीं हैं। वहीं नए बैंकों के सामने इनकी कोई पहचान नहीं है। 
 
ताजातरीन तिमाही नतीजे इस विश्लेषण का पूरी तरह समर्थन नहीं करते हैं। ग्रामीण और अद्र्घशहरी इलाकों में ऋण में सालाना 12 फीसदी की दर से बढ़ोतरी हुई। यह बैंकिंग व्यवस्था की 8 फीसदी की वृद्घि की दर से कहीं तेज था। केवल शहरी इलाकों में ही इसका विकास धीमी गति से हो रहा है। यह गति 6 फीसदी से भी कम है। इस लिहाज से देखा जाए तो इस दलील में दम है कि कुल ऋण के करीब दो तिहाई के लिए जिम्मेदार व्यवस्था के पास कर्जदारों का जो आंकड़ा होगा उसका अनुकरण करना आसान नहीं होगा। हकीकत में सरकारी बैंकों के पास उन कार्यालयों में भी एक औसत हिस्सेदारी होती है जो 5 करोड़ रुपये से 100 करोड़ रुपये के ऋण में होते हैं। यही वजह है कि पूंजी में बढ़ोतरी के प्रावधान पर बहस हो रही है। 
 
हमारी दृष्टिï में बैंकों के पुनर्पूंजीकरण को 100 अरब रुपये से बढ़ाकर अगर 250 करोड़ रुपये भी किया जाता है तो भी यह आवश्यकता से कम ही रह जाएगा। हकीकत तो यह है कि दिसंबर में दिवालिया प्रक्रिया में शामिल होने की संभावना वाले 40 मामलों से उत्पन्न कमी को पूरा करने के लिए ही इससे कहीं अधिक बड़ी पूंजी की आवश्यकता होगी। 3.5 लाख करोड़ रुपये मूल्य का कर्ज तो अभी हाल में गैर निष्पादित परिसंपत्ति में बदल गया है। भले ही अभी बहुत अधिक नुकसान नजर नहीं आ रहा हो लेकिन एक बार दिवालिया प्रक्रिया में शामिल होने के बाद आरबीआई के दिशानिर्देशों के मुताबिक बैंकों को 50 फीसदी नुकसान की प्रॉविजनिंग करनी होगी। चूंकि फंसे हुए कर्ज का अधिकांश हिस्सा सरकारी बैंकों के खाते में है इसलिए उनको 100,000 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान उठाना पड़ सकता है। आखिर में आईएफआरएस (इंटरनैशनल फाइनैंशियल रिपोर्टिंग स्टैंडर्ड) की ओर बदलाव के कारण भी बैंकों का ऋण नुकसान वितरित होने की उम्मीद है। भारतीय बैंकों को 1 अप्रैल, 2018 से इस नई व्यवस्था का अनुपालन करना होगा।
 
सरकार को शायद पुनर्पूंजीकरण के बारे में अनुमान हो कि उसमें कितना धन लगेगा। जानकारी के मुताबिक सरकार इससे संबंधित बॉन्ड लाने पर भी विचार कर रही है। इस मामले में सरकार, सरकारी बैंकों में इक्विटी पूंजी लगाएगी और बदले में बैंक सरकारी बॉन्ड खरीदेंगे। चूंकि बॉन्ड बाजार को किनारे कर दिया जाएगा इसलिए उम्मीद यह है कि प्रतिफल पर बहुत अधिक असर नहीं होगा। इसके अलावा कुछ लेखा मानकों के अधीन यह पुनर्पूंजीकरण राजकोषीय घाटे में इजाफे की वजह नहीं बनेगा। चूंकि भारत की बैंकिंग व्यवस्था सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में अपेक्षाकृत छोटी है इसलिए किसी तरह का जोखिम नजर नहीं आता। कुल मिलाकर कहा जा रहा है कि ऐसा करके बैंकों में नई जान फूंकी जा सकती है।
 
परंतु सरकार के सामने अपेक्षाकृत बड़ी चुनौती होगी उन गहन मुद्दों को हल करने की जो खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहे। इन बैंकों में से अधिकांश जरूरी आर्थिक प्रतिफल दे पाने में नाकाम हैं। बिना ऋण के कारण हुए नुकसान के भी उनकी हालत बहुत बेहतर नहीं है। सरकार यह कैसे सुनिश्चित कर सकती है कि अतीत में ऋण बांटने की जो गलत शैली रही है उसे दोहराया नहीं जाएगा? अगर कोई प्रवर्तक समूह, कर्ज का बड़ा हिस्सा बट्टïे खाते में डाले जाने के बाद दिवालिया कंपनी में अपना नियंत्रण बरकरार रखता है तो इसके क्या राजनीतिक जोखिम हो सकते हैं। क्योंकि इस प्रक्रिया में कर्ज को बट्टïे खाते में डालने में करदाताओं के धन का ही इस्तेमाल होगा। राजकोषीय बाधाओं को देखते हुए क्या यह पूंजी का सबसे अच्छा इस्तेमाल माना जा सकता है?
 
फिलहाल जबकि देश के फंसे हुए कर्ज की समस्या से अंतिम तौर पर निपटने की बात की जा रही है और सरकार, सरकारी बैंकों को चलते रहने देने की आर्थिक लागत का अनुमान लगाने में लगी है, तो सवाल यह है कि क्या कहीं अधिक बड़े और अहम कदम उठाने की आवश्यकता है। क्या सरकार इस संकट का इस्तेमाल कुछ सरकारी बैंकों के निजीकरण की बहस शुरू करने में कर सकती है। ऐसा करने से उनके मूल्यवान ब्रांच नेटवर्क और ग्राहक संख्या को बरकरार रखा जा सकता है। इसके साथ ही गहन प्रतिस्पर्धात्मक मुद्दों को धीमी गति से हल किया जा सकता है। अर्थव्यवस्था में ढांचागत बदलाव के चलते व्याप्त विसंगति को देखते हुए एक और झटका बहुत अधिक कष्टï नहीं पहुंचाएगा। 
 
(लेखक क्रेडिट सुइस में इंडिया इक्विटी स्ट्रैटजिस्ट हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।) 
Keyword: bank, loan, debt,,
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