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सितारों के प्रचार के तिकड़म से फिल्म को कितना दम?

उर्वी मलवाणिया /  October 11, 2017

 

अपनी फिल्मों के प्रचार-प्रसार के लिए करीब एक दशक से अभिनेता-अभिनेत्रियां कई तरह की गतिविधियों में शामिल रहे हैं जिनमें लोगों का सिर मुंडाने से लेकर वेश बदल कर यात्रा करने (आमिर खान) से लेकर पुराने विवादों की आग में घी डालने (कंगना रनौत) और कुछ अभियानों से जुडऩे (कई अभियान) जैसे कदम शामिल हैं। अब फिल्म उद्योग भी इन विकल्पों पर विचार करने लगा है कि अभिनेता-अभिनेत्रियों का इस्तेमाल फिल्म ऐंबेसडर के तौर पर किया जाए। 
 
हाल में हुई कुछ चूक की वजह से स्टूडियो और प्रोडक्शन हाउस इस विकल्प को तलाश रहे हैं कि अभिनेता भी मार्केटिंग टीम का हिस्सा बन सकें। आखिर इनमें कैसी हताशा है? सोशल मीडिया पर कंगना रनौत को लेकर यह चर्चा होने लगी कि उन्होंने अपनी फिल्म 'सिमरन' में लोगों की दिलचस्पी जगाने के लिए पुराने निजी रिश्ते का इस्तेमाल किया। वहीं प्रियंका चोपड़ा की आलोचना भी की गई कि उन्होंने अपनी फिल्म 'पाहुना' के प्रचार के लिए सिक्किम को राजद्रोह से प्रभावित राज्य बताया और उन्हें माफी भी मांगनी पड़ी। हालांकि अभिनेताओं और अभिनेत्रियों के बयान से लोगों में जो गुस्सा होता है उसका फिल्म पर क्या असर होता है इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है और इस वजह से उद्योग में भ्रम की स्थिति बढ़ रही है।
 
अभिनेताओं पर एक दशक पहले ही फिल्म के प्रचार के लिए सक्रिय रहने का दबाव बढऩे लगा था जब हॉलीवुड की तरह बॉलीवुड ने सड़क पर फिल्म के प्रचार अभियान को उतारने का फायदा देखना शुरू कर दिया। इंटरव्यू के जरिये अभिनेताओं को फिल्म का प्रचार करने का मौका देने के साथ ही निर्माता अभिनेताओं का इस्तेमाल फिल्म का संदेश देने के लिए टीवी के रियालिटी शो और टॉक शो में हिस्सा लेने के लिए करते हैं। इसके अलावा दर्शकों को जोडऩे के लिए भी सोशल मीडिया पर कई तरह की चुनौती दी जाती है और साथ ही बच्चियों से लेकर स्वच्छता और खुले में शौच जैसे सामाजिक अभियानों पर चर्चा होती है। ब्रांड विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के हथकंडे संदेश से ज्यादा बड़े लगने लगते हैं।

निजी बनाम पेशेवर
 
मिसाल के तौर पर कंगना रनौत अभिनीत सिमरन को ही लीजिए जो 15 सितंबर को रिलीज हुई। अभिनेत्री ने खुद को एक स्वतंत्र और अकेली रहने वाली महिला के तौर पर पेश किया जो किसी भी विवादास्पद मसले पर बात करने से पीछे नहीं हटती। रनौत ने पर्दे पर भी कुछ ऐसा ही किरदार निभाया है और वह संभवत: अपनी मार्केटिंग टीम के सलाह पर ही ऐसा कर रही थीं ताकि फिल्म के पर्दे पर भी उनकी यही छवि बन सके। 
 
ब्रांड बिल्डिंग के ब्रांड सलाहकार और संस्थापक अंबी परमेश्वरन का कहना है, 'आखिरकार इससे फिल्म को चर्चा मिल जाती है। कंगना और फिल्मकारों को भी यह अंदाजा था कि सिमरन रिलीज होने से पहले ब्रांड कंगना जरूर नजर आनी चाहिए और हुआ भी कुछ ऐसा ही। इस तरह मार्केटिंग की जीत हुई।'  हालांकि कंगना की वास्तविक जिंदगी की शख्सियत और उनके आरोपों की पुष्टि में तथ्यों की कमी की वजह से अभिनेत्री और मार्केटिंग टीम की पटकथा पर से पर्दा हटने लगा। सोशल मीडिया पर उन पर सवालों की झड़ी लगी और उनके अनुभवों की सच्चाई को चुनौती दी गई। क्या इसका असर फिल्म पर पड़ा क्योंकि इस फिल्म ने शुरुआती 10 दिनों में 16 करोड़ रुपये ही कमाए थे। हालांकि किसी के पास इसका स्पष्ट जवाब नहीं है। लेकिन हाइपरकलेक्टिव के संस्थापक के वी श्रीधर का मानना है कि ओछे स्तर के हथकंडे को लोग आसानी से पहचान लेते हैं और इससे फिल्म और अभिनेता-अभिनेत्री की विश्वसनीयता को क्षति पहुंचती है। 
 
कलाकार बनाम ब्रांड
 
अभिनेता-अभिनेत्रियों पर मार्केटिंग करने वालों की निर्भरता बढ़ गई है क्योंकि फिल्मों का कारोबारी मॉडल अब बदल गया है। ज्यादातर सितारे अब किसी फिल्म में सिर्फ अदाकार की ही भूमिका में नहीं रहते हैं। कई दफा वे फिल्म के सह निर्माता या कार्यकारी निर्माताओं में शामिल होते हैं और उनकी फिल्म में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीके से हिस्सेदारी होती है। ऐसे में उन्हें फिल्म रिलीज से पहले कुछ ऐसे कदम उठाने पड़ते हैं जिससे उनकी वास्तविक जीवन की छवि पर नकारात्मक असर के जोखिम की संभावनाएं बनती हैं। श्रीधर का कहना है, 'विवाद भी अपने आप में कोई बुरी चीज नहीं है। 'उड़ता पंजाब' के लिए यह अच्छी साबित हुई। ऐसे में सीबीएफसी और फिल्म प्रमाणन में इसकी भूमिका के अलावा इस फिल्म के जरिये पंजाब और वहां ड्रग की समस्याओं जैसे मसलों पर चर्चा शुरू हो गई। लेकिन निजी आरोपों और विवादों से लंबी अवधि में कोई मदद नहीं मिलती है। लोग भले ही किसी शख्सियत और गॉसिप को याद रखेंगे लेकिन इससे फिल्म के प्रचार की कवायद सफल नहीं हुई।' कुछ कारोबार विश्लेषकों का कहना है कि अभिनेता-अभिनेत्री हमेशा अच्छी मार्केटिंग करने वाले नहीं साबित होते। आमिर खान जैसे अभिनेता विशेषज्ञ हैं जो अपनी मार्केटिंग स्क्रिप्ट पर भी उतना ही ध्यान देते हैं जितना कि अपनी फिल्म की पटकथा पर। लेकिन अच्छे अभिनेता भी अब विवादों का ही दामन थाम रहे हैं भले ही वे उस फिल्म के निर्माता हो या नहीं। हालांकि इस तरह के नकारात्मक प्रचार से भी मदद मिलती है। 
 
खास मकसद से ब्रांडिंग
 
अभिनेता-अभिनेत्री अपनी फिल्म की रिलीज को किसी सामाजिक मुद्दे से जोड़ लेते हैं जो फिल्म का भी विषय हो सकता है। मिसाल के तौर पर अक्षय कुमार अभिनीत 'टॉयलेट-एक प्रेम कथा' के जरिये अभिनेता खुले में शौच अभियान का एक चेहरा बन गए। पिछले साल अमिताभ बच्चन ने अपनी पोती को एक खुला पत्र लिखा जिसमें महिला सशक्तीकरण पर बात की गई। उनका यह पत्र 2016 में रिलीज हुई फिल्म 'पिंक' से पहले लिखा गया जिसका विषय भी महिला सशक्तीकरण पर ही जुड़ा था। 
 
हालांकि सामाजिक अभियान वाले कारक भी दोधारी तलवार हो सकते हैं। अगर फिल्म का विषय ऐसे मुद्दों से मेल नहीं खाता तो मार्केटिंग के तौर पर यह प्रभावी नहीं होगा। दूसरी बात यह है कि अगर दर्शकों को यह अहसास होता है कि अभिनेता के इरादे नेक नहीं हैं तो इससे फिल्म को नुकसान हो सकता है। श्रीधर और अंबी दोनों का यह मानना है कि अगर ये सामाजिक मुद्दे फिल्म की थीम के अनुरूप हैं तो यह एक बेहतर विचार है। अंबी का कहती हैं, 'अगर आप किसी सामाजिक मुद्दे को रोमांटिक कॉमेडी से जोड़ेंगे तो यह कारगर नहीं होगा। दर्शक कुछ हद तक ही अपने भरोसे को बनाए रखते हैं। कुछ वक्त के बाद वे इसकी पहचान कर लेंगे तब यह कारगर नहीं हो पाएगा।'
Keyword: bollywood, hollywood,,
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