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मध्यावधि उलझन में फंसती नजर आ रही मोदी सरकार

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  October 11, 2017

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी सरकार के आर्थिक प्रबंधन का पूरी शिद्दत से बचाव किया है। उन्होंने पार्टी अध्यक्ष और वित्त मंत्री के साथ एक ऐसी बैठक भी की जो पहले से निर्धारित नहीं थी। प्रधानमंत्री ने कहा कि राजकोषीय घाटा, चालू खाते का घाटा और मुद्रास्फीति तीनों कम हैं। यह बात सही है और यह अच्छी बात है। उन्होंने नोटबंदी और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) दोनों का बचाव किया। उन्होंने कहा कि नोटबंदी ने नकदी और सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात को 12 फीसदी से घटाकर 9 फीसदी कर दिया जबकि जीएसटी को उन्होंने अच्छा और सहज-साधारण कर बताया। यह बात पूरी तरह सच नहीं है लेकिन इसे रहने देते हैं। उन्होंने आंकड़ों की मदद से यह जताने की कोशिश की कि अर्थव्यवस्था में कोई गड़बड़ी नहीं है। उन्होंने यह भी सच ही कहा कि एक तिमाही के कमजोर नतीजे मंदी के परिचायक नहीं होते।

 
परंतु उन्होंने बिक्री में बढ़ोतरी और औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि के बीच कोई भेद नहीं किया। क्योंकि बिक्री में बढ़ोतरी तो जीएसटी के लागू होने के बाद स्टॉक निपटाने की जल्दबाजी की वजह से भी हो सकती है। उन्हें अपनी नई नवेली आर्थिक सलाहकार परिषद से यह पूछना चाहिए कि दरअसल अर्थव्यवस्था किन हालात से दो चार है। उन्होंने घरेलू औद्योगिक निवेश को हो रहे कष्ट के बारे में भी ज्यादा कुछ नहीं कहा। वह यह मानकर चल रहे हैं कि इसमें सुधार आएगा लेकिन सवाल उठता है कि ऐसा कब होगा?
 
उन्होंने कहा कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में होने वाला इजाफा इस बात का स्पष्ट संकेत है कि चीजें एकदम ठीकठाक हैं क्योंकि विदेशी निवेशक देश की अर्थव्यवस्था में भरोसा जता रहे हैं। उन्होंने कहा कि लोग कार जैसी चीजें खरीद रहे हैं यानी खपत की मांग बरकरार है। परंतु वह भी जीएसटी के लागू होने के पहले मिली रियायत की वजह से हो सकता है। हमें अभी आगे और प्रतीक्षा करनी होगी।
 
उन्होंने अपनी सरकार द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में किए गए सुधारों का भी जिक्र किया। यह बात भी सच है कि उनकी सरकार ने तमाम क्षेत्रों में सुधार किए हैं। बैंकों द्वारा ज्यादा मात्रा में ऋण न देने के सवाल पर उन्होंने कहा कि कंपनियां अन्य स्रोतों से धन जुटा रही हैं। मिसाल के तौर पर प्रारंभिक सार्वजनिक पेशकश। परंतु उन्होंने हमें यह नहीं बताया कि उनकी सरकार बैंकों की अंतर्निहित समस्या से निपटने के लिए क्या करेगी। 
 
अगर मुझे सुझाव देने का अवसर मिले तो मैं कहना चाहूंगा कि महोदय, क्या आप आज वह कर सकते हैं जो चीन ने 112 वर्ष पहले किया? उसने बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के लिए 45 अरब डॉलर मूल्य के मुद्रा भंडार का इस्तेमाल किया। मोदी सही हो सकते हैं। अगर जीडीपी के आंकड़ों के हिसाब से देखा जाए तो इसमें बेहतरी आनी तय है। परंतु उसके लिए जरूरी है कि कारोबारी भावनाओं में सुधार हो और यह देखना रोचक होगा कि अगले छह महीनों में यह बदलाव कैसे आता है।
 
ऐसा प्रतीत होता है कि मोदी कार्यकाल के तीसरे साल या मध्यावधि की उस समस्या में उलझ गए हैं जिसका सामना कमोबेश हर सरकार को करना होता है। केवल अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह का पहला कार्यकाल ही इसका अपवाद रहा है।  जवाहरलाल नेहरू सन 1955 में इस संकट के शिकार हुए। उस वक्त कांग्रेस पर यह दबाव था कि अर्थव्यवस्था ठीक ढंग से विकसित नहीं हो रही है। उस वक्त उन्होंने समाजवादी रुख अपनाया। सन 1960 में एक बार फिर वह इस संकट के शिकार हुए। उस वक्त वह दूसरी पंचवर्षीय योजना में एक अत्यंत महत्त्वाकांक्षी निवेश योजना लेकर आए। परंतु घरेलू और विदेशी दोनों ही संसाधनों के मोर्चे पर दिक्कत का सामना करना पड़ा। अगर आज की तारीख में वह होते तो उनको फेकू करार दिया जा सकता था। 
 
नेहरू सन 1962 में पुन: चुनाव जीतने में कामयाब रहे लेकिन सन 1965 में वह प्रधानमंत्री नहीं थे। परंतु कांग्रेस सत्ता में थी और एक बार फिर अर्थव्यवस्था संकट में आई। इसकी वजह बना सूखा और पाकिस्तान के साथ जंग। तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को देश से अपील करनी पड़ी कि कम खाना खाएं ताकि अनाज बचाया जा सके। सन 1969 में इंदिरा गांधी को इस संकट का सामना करना पड़ा क्योंकि वह सन 1966 में प्रधानमंत्री बनी थीं। सन 1971 की जीत के बाद उनको सन 1974 में दोबारा इस संकट का सामना करना पड़ा था। हमेशा की तरह उच्च मुद्रास्फीति और कम वृद्धि दर का समस्या की वजह बनीं। सन 1983 में एक बार फिर ऐसा हुआ लेकिन कमोबेश छोटे पैमाने पर।
 
राजीव गांधी सन 1987 में इस समस्या के शिकार हुए। सूखे और उच्च मुद्रास्फीति के कारण अर्थव्यवस्था की हालत एकदम खस्ता हो गई थी। पीवी नरसिंह राव इस संकट से बच निकलने में कामयाब रहे लेकिन सन 1991 में उनके कार्यकाल की शुरुआत ही एक बड़े संकट से हुई थी। सन 1993 में वह एक बड़े राजनीतिक संकट के शिकार हुए जबकि सन 1994 में हर्षद मेहता कांड ने उनको दिक्कत में डाला। वाजपेयी के कार्यकाल की शुरुआत सन 1998 में हुई। उस वक्त भी हालात ठीक नहीं थे। यही वजह थी कि करगिल जंग के बावजूद आगे हालात बेहतर ही हुए। इस दृष्टि से उनका प्रदर्शन काफी हद तक नरसिंह राव की तरह रहा। मनमोहन सिंह भी अपने पहले कार्यकाल में इस संकट से बच निकलने में कामयाब रहे लेकिन दूसरे कार्यकाल में वह इससे बच नहीं सके। सन 2012 में अर्थव्यवस्था सही मायनों में गहरे संकट की शिकार हो गई थी।
Keyword: narendra modi, development, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आर्थिक प्रबंधन,
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