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रोहिंग्या संकट से अस्थिर न हो जाए बांग्लादेश

नितिन पई /  October 11, 2017

रोहिंग्या संकट में बांग्लादेश की भूमिका सराहनीय है लेकिन सीमित संसाधनों के चलते आगे चलकर वह स्वयं मुसीबत में पड़ सकता है। ऐसे में भारत को मदद के लिए आगे आना चाहिए। बता रहे हैं नितिन पई

 
दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों का संगठन खुद को एक सफल भूराजनैतिक समूह बताता है। एक ऐसा समूह जिसने अपने सदस्यों की स्थिति बेहतर करने में सफलता पाई जबकि ऐसे अन्य कई संगठन विफल रहे। आसियान के कई समर्थक तो इस क्षेत्रीय संगठन की तुलना यूरोपीय संघ से भी करते हैं। इस दौरान एक बात जिस पर ध्यान नहीं दिया जाता है, वह यह है कि आसियान के संस्थापक सिद्धांतों में से एक यह भी है कि वह अपने सदस्य देशों के घरेलू मामलों में दखलंदाजी नहीं करेगा। यह बात उसे अन्य ऐसे समूहों से अलग करती है। इसका हर सदस्य देश बिना राजनीतिक उलझनों में पड़े केवल अर्थव्यवस्था पर ध्यान दे पाता है।
 
इस सहज, आत्मकेंद्रित नजरिये में इस बात पर ध्यान नहीं दिया जाता है कि चौथाई सदी से अमेरिका ही अपनी सैन्य शक्ति के साथ क्षेत्रीय स्थिरता के लिए काम कर रहा है। इस बीच चीन और भारत ने जबरदस्त आर्थिक अवसर पैदा किए हैं और बांग्लादेश, श्रीलंका और म्यंामार ने ऐसे सस्ते श्रमिक मुहैया कराए हैं जिनकी बदौलत क्षेत्रीय समृद्धि बढ़ी है। अधिकांश आसियान देश और उनकी सरकारें अन्य देशों को इतने हलके में लेती आई हैं कि उनको इस बात का अहसास तक नहीं है कि उनकी समृद्धि की वजह क्या है? आसियान देशों के बुर्जुआ वर्ग के बीच अमेरिका और उसकी विदेश नीति की आलोचना करने का फैशन है, भारत की उसके कमोबेश निष्क्रिय लोकतंत्र के लिए और छोटे उपमहाद्वीपीय देशों की उनके भ्रष्टाचार और उनकी अक्षमता के कारण आलोचना होती है।
 
ऐसे में आश्चर्य नहीं हुआ जब आसियान ने म्यांमार में रोहिंग्या समुदाय के खिलाफ नस्ली संहार से संबंधित अपने हालिया आधिकारिक बयान में एकदम निरर्थक और बेतुकी बात कही। उसने कहा कि मलेशिया खुद को इससे अलग रखने की जरूरत महसूस करता है और वह अपनी मजबूत असहमति दर्ज कराता है। मलेशिया के पास पेशकश के रूप में केवल शब्द थे। वह भी बेतुके बेमानी शब्द।
 
आसियान देशों का कुल जीडीपी 2.5 अरब डॉलर से अधिक है और उसका प्रति व्यक्ति जीडीपी करीब 4,000 डॉलर है। अगर आसियान एक देश होता तो उसकी आबादी 60 करोड़ से ज्यादा होती और अर्थव्यवस्था भारत से बड़ी। सवाल यह है कि एक बड़ी मानवीय त्रासदी जिसमें 5 लाख रोहिंग्या शरणार्थी बांग्लादेश में रहने पर मजबूर हैं, में उसकी भूमिका क्या है? उसकी भूमिका शून्य है यानी कुछ नहीं।
 
हमसे कहा जाएगा कि आसियान कोई देश नहीं है, न ही वह यूरोपीय संघ की तरह कोई राजनीतिक संघ है, कैसे औसत निकालने से आय के स्तर का गहरा अंतर छिप जाता है और कैसे आसियान के सदस्य अपने किसी साथी देश के आंतरिक मामलों में दखलंदाजी नहीं कर सकते। परंतु हमें इस बारे में कुछ भी सुनने को नहीं मिलेगा कि आसियान उस बड़ी मानवीय त्रासदी के संदर्भ में क्या कर रहा है जिससे उसका एक सदस्य देश जूझ रहा है और जो अन्य देशों में भी फैल रही है। 
 
इन बातों ने रोहिंग्या संकट को लेकर आसियान देशों के खोखलेपन को सबके सामने उजागर कर दिया है। इससे  पहले भी दक्षिण चीन सागर पर चीन के आक्रामक दावे के दौरान आसियान के सदस्य देश अपनी एकजुटता बरकरार नहीं रख पाए थे। जब तक आसियान समूह के देश आत्मनिरीक्षण नहीं करते और अपने आप में बदलाव नहीं लाते तब तक दक्षिण पूर्व एशिया तमाम प्रत्याशित-अप्रत्याशित परिस्थितियों से निपटने में नाकाम रहेंगे। 
 
आसियान की इस नाकामी के चलते ही पड़ोसी बांग्लादेश को म्यांमार के रखाइन प्रांत में हो रहे संघर्ष की कीमत चुकानी पड़ रही है। बीते सालों में बड़ी तादाद में रोहिंग्या शरणार्थी बांग्लादेश में आ चुके हैं और अब एक बार फिर यह सिलसिला शुरू हो गया है। फिलहाल करीब 10 लाख रोहिंग्या बांग्लादेश में रह रहे हैं। हाल में आने वाले अन्य शरणार्थियों को म्यांमार से लगी सीमा पर शिविरों में रखा गया है।
 
इन शिविरों में पर्याप्त जगह नहीं है, पंजीयन की समस्या है, लोग निहायत खराब हालात में दिन बिता रहे हैं और लौटने की संभावनाएं बहुत अनिश्चितता भरी हैं। हमें यह समझने की आवश्यकता है कि रोहिंग्या संकट जल्दी ही बांग्लादेश में राजनीतिक संकट का रूप ले सकता है। इससे वहां अस्थिरता पैदा हो सकती है और इस्लामिक सोच वाले दोबारा पैदा हो सकते हैं। जाहिर है बांग्लादेश किसी संकट में पड़े तो यह भारत के हित में नहीं होगा।
 
बांग्लादेश का समाज और वहां की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने वह उदारता और खुली सोच दिखाई है जो इस क्षेत्र के कथित अमीर देश भी नहीं दिखा सके। भारत ने बांग्लादेश में मानवीय सहायता भेजकर अच्छा किया है। वहां पहले ही सीमित संसाधन हैं इसलिए आपात हालात से निपटने में यह सहायता मदद करेगी। भारत को इससे आगे राजनीतिक, कूटनयिक, वित्तीय और सुरक्षा संबंधी मदद मुहैया करानी चाहिए ताकि वहां शरणार्थी संकट से ठीक तरह से निपटा जा सके। इसमें मेजबानों और वहां आए शरणार्थियों दोनों की मदद आवश्यक है। जरूरी नहीं कि हर काम सरकार करे। देश में कई ऐसे गैर सरकारी संगठन भी हैं जो पानी, सफाई, जन स्वास्थ्य, पोषण आदि में दक्षता रखते हैं। सरकार सहयोगी भूमिका अपना सकती है। 
 
वर्ष 2013 में एक आलेख में मैंने कहा था कि भारत को पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों में समर्थक नेताओं का सहयोग करना चाहिए और कोशिश करनी चाहिए कि वे सत्ता में रहें। शेख हसीना ऐसे ही नेताओं में शुमार हैं। वहां अगले साल आम चुनाव होने हैं। भारत को कोशिश करनी चाहिए कि वह राजनीतिक रूप से मजबूत बनी रहें। भारत को न केवल शरणार्थियों के मामले में मदद करनी चाहिए बल्कि शेख हसीना के उत्कृष्ट नेतृत्व की भी सराहना करनी चाहिए। बल्कि वह और उनके देश के लोग तो नोबेल शांति पुरस्कार तक के हकदार हैं। इसमें दो राय नहीं कि इस पूरे वाकये ने आसियान के अमीर देशों को शर्मिंदा करने का काम किया है। वे चाहें तो मसले के हल होने तक कुछ तकनीकी और अन्य सहायता मुहैया कराके अपनी शर्मिंदगी कम कर सकते हैं। 
 
सन 1971 में जब लाखों की तादाद में पूर्वी पाकिस्तान के शरणार्थी भारत आए थे तब भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के साथ जंग लड़कर वहां नरसंहार बंद कराया था। भारत ऐसा पहला देश बना था जिसने किसी अन्य देश में चल रहा नरसंहार रुकवाया हो। जाहिर है बांग्लादेश के पास इतने संसाधन नहीं हैं कि वह एक दूसरे देश में सैन्य कार्रवाई को अंजाम दे सके। भारत में यह क्षमता है लेकिन आशंका इस बात की है कि ऐसा हस्तक्षेप कहीं हर किसी के लिए हालात और कठिन न बना दे। फिलहाल जरूरत यह है कि भारत अपनी सैन्य क्षमता को मजबूत बनाए ताकि भविष्य में उसकी शांति की कूटनीति को इस सैन्य क्षमता का सहयोग मिल सके। पुनश्च: अंतरराष्ट्रीय समुदाय, खासतौर पर संरक्षण की जवाबदेही के सिद्धांत का दम भरने वालों की खामोशी हतप्रभ करने वाली है।
Keyword: Myanmar, रोहिंग्या समुदाय,
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