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कठिन डगर

संपादकीय /  October 11, 2017

प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद ने बुधवार को अपनी पहली बैठक में 10 विषय चिह्निïत किए। इनमें ऐसे विषय शामिल हैं जो अगले छह महीनों के दौरान आर्थिक वृद्धि और रोजगार को बढ़ावा देने से ताल्लुक रखते हैं। परिषद की अनुशंसाओं को इन्हीं विषयों के इर्दगिर्द तैयार किया जाएगा। इनमें आर्थिक वृद्धि, रोजगार निर्माण, राजकोषीय ढांचा और मौद्रिक नीति शामिल हैं। परिषद की भूमिका स्पष्ट करते हुए चेयरमैन विवेक देवरॉय ने कहा कि इसका पूरा ध्यान ऐसी अनुशंसाओं पर रहेगा जिनको सहजता से क्रियान्वित किया जा सके। इस प्रकार इसकी भूमिका नीति आयोग से अलग होगी। देवरॉय और परिषद के एक अन्य सदस्य रतन पी वाटल, नीति आयोग के भी सदस्य हैं। आयोग की भूमिका जहां समग्रता से दृष्टि रखने की है, वहीं परिषद अगले कुछ महीनों के दौरान आर्थिक वृद्धि और रोजगार को गति देने के लिए जरूरी हस्तक्षेप करेगी। जैसा कि देवरॉय ने कहा कि नीति आयोग के साथ सहयोग बनाए रखा जाएगा। परिषद ने यह भी स्पष्ट किया कि वह सरकार की इस समझ के साथ है कि राजकोषीय घाटे के लक्ष्य का ध्यान रखा जाए। आर्थिक वृद्धि में गिरावट के बारे में परिषद के सदस्यों ने कहा कि सुधार की प्रक्रिया पहले ही चालू हो चुकी है। हालांकि इस संबंध में कोई आंकड़ा सामने नहीं आया।

 
परिषद की बैठक अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के उस बयान के ठीक एक दिन बाद हुई है जब उसने कहा था कि वर्ष 2017 और 2018 में भारत की आर्थिक वृद्धि शुरुआत में जताए गए अनुमानों से कम होगी। उसने कहा कि ऐसा नोटबंदी और वस्तु एवं सेवा कर के प्रभाव के कारण हो रहा है। मुद्रा कोष ने वर्ष 2017-18 के लिए 6.7 फीसदी और 2018-19 के लिए 7.4 फीसदी की वृद्धि दर का अनुमान जताया जो पिछले अनुमान से क्रमश: 0.5 और 0.3 फीसदी कम है। परिषद ने इसे कुछ खास तवज्जो नहीं दी। एक सदस्य ने तो यह तक कहा कि मुद्रा कोष के 80-90 फीसदी अनुमान गलत ही साबित होते हैं। परंतु मंदी की गंभीरता को कम करके आंकना भी परिषद के लिए सही नहीं होगा। खासतौर पर यह देखते हुए कि उसके गठन का एक उद्देश्य वृद्धि दर को वापस लाना भी है।
 
वास्तविकता यह है कि केवल अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ही भारतीय अर्थव्यवस्था में आगे और गिरावट आने की बात नहीं कह रहा है। इस महीने की शुरुआत में भारतीय रिजर्व बैंक ने भी संपूर्ण वित्त वर्ष के लिए अपना अनुमान घटाकर 6.7 फीसदी कर दिया था। अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों ने भी बिल्कुल ऐसा ही किया। विश्व बैंक ने सोमवार को जारी अपने साउथ एशिया इकनॉमिक फोकस में वर्ष 2017-18 के अनुमानों में 20 आधार अंकों की कटौती की। पहले उसने इसके 7.2 फीसदी रहने का अनुमान जताया था। वहीं वित्त वर्ष 2018-19 के लिए उसने अपने अनुमान अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से भी ज्यादा कम करके 7.3 फीसदी कर दिए। एशियाई विकास बैंक और आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) ने भी भारत की आर्थिक वृद्धि को लेकर अपने-अपने अनुमान कम कर दिए हैं। 
 
फिलहाल जो तस्वीर उभर रही है उसकी सबसे तकलीफदेह बात यह है कि महज कुछ तिमाहियों की अवधि में भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया में वृद्धि के एक चमकदार मॉडल से फिसलकर एक मंद अर्थव्यवस्था में तब्दील हो गई। ऐसा तब है जब दुनिया की अन्य अर्थव्यवस्थाएं अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में हैं। बहरहाल, पहली बैठक में इससे ज्यादा किसी ठोस बात की अपेक्षा करना भी बेमानी है। परिषद का गठन इसलिए किया गया है ताकि वह आर्थिक मसलों पर प्रधानमंत्री को सही सलाह दे सके। जाहिर तौर पर यह काम आसान नहीं है।
Keyword: narendra modi, आर्थिक सलाहकार परिषद,
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