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जीएसटी में ताजा रियायतें सही मगर क्यों हुई देरी

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  October 10, 2017

सरकार ने गत 6 अक्टूबर को वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के नियमों में कई बदलावों का ऐलान किया। इन बदलावों से निर्यातकों और छोटे-मझोले कारोबारियों एवं विनिर्माताओं को थोड़ी राहत मिली। लेकिन जीएसटी से पैदा हुई अड़चनें दूर करने के लिए ये बदलाव क्या काफी हैं? यह सवाल भी खड़ा होता है कि तीन महीनों तक उद्योग एवं कारोबार जगत के परेशान रहने के बाद ही ये कदम क्यों उठाए गए? जीएसटी से संबंधित नियमों से कारोबार जगत की मुश्किलें बढऩे की बात शुरू से ही कही जा रही थी लेकिन जीएसटी परिषद उन्हें अनसुना करती रही। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने जब दशहरा पर दिए गए अपने संबोधन में छोटे उद्यमियों एवं कारोबारियों के हितों का भी ध्यान रखने की बात कही, तब जाकर कहीं इन नियमों को बदलने का मन तो सरकार ने नहीं बनाया? क्या भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा की जीएसटी की कटु आलोचना का भी इन उपायों में कोई हाथ है?

 
हमें ध्यान रखना होगा कि निर्यातक जीएसटी लागू होने के पहले से ही इसके नकारात्मक असर को लेकर आशंकाएं जता रहे थे। असल में, यह वाणिज्य मंत्रालय की नाकामी है कि निर्यातकों की मांगों को शीर्ष स्तर पर कोई तवज्जो नहीं दी गई। अब निर्यातकों को निर्यात के मकसद से खरीदे जाने वाले उत्पादों एवं कच्चे माल पर जीएसटी नहीं देना होगा। इसी तरह निर्यात के लिए आयात की जाने वाली वस्तुओं पर सीमा-शुल्क की रियायत भी उन्हें मिलती रहेगी। निर्यातकों को चुकाए गए शुल्क की वापसी भी समयबद्ध तरीके से की जाएगी।
 
भले ही जीएसटी परिषद ने निर्यातकों की चिंताओं को दूर करने में देर की है लेकिन अब भी अनिश्चितता का माहौल पूरी तरह खत्म नहीं हो पाया है। निर्यातकों को दी गई राहत केवल अंतरिम है और यह मार्च 2018 तक ही वैध होगी। उसके बाद की स्थिति के बारे में कोई भी अंदाजा लगा सकता है।
 
नीतिगत अनिश्चितता के माहौल में निर्यात में वृद्धि नहीं हो सकती है। अगर निर्यातकों को पांच महीने बाद के शुल्क ढांचा या रिफंड के तरीके के बारे में कोई जानकारी नहीं है तो देश का निर्यात बढ़ाने की राह में आने वाली चुनौतियों का अंदाजा लगाना ज्यादा मुश्किल नहीं है। निर्यात वृद्धि की राह में जीएसटी सुधारों को रोड़ा बनने की इजाजत नहीं दी जा सकती है। वास्तव में, दोनों को एक दूसरे का मददगार होना चाहिए।
 
जहां तक छोटी एवं मझोली इकाइयों (एसएमई) का सवाल है तो उनके लिए लाई गई एकमुश्त योजना का दायरा 75 लाख रुपये सालाना कारोबार से बढ़कर 1 करोड़ रुपये कर दिया गया है। इसका मतलब है कि एकमुश्त योजना के लिए पंजीकरण करा चुकी 15 लाख से अधिक इकाइयों को राहत मिलेगी। अब छह महीनों तक पंजीकरण की छूट मिलने के बाद अधिक संख्या में छोटी इकाइयों को एकमुश्त योजना का हिस्सा बनने की उम्मीद है। इससे उन लोगों को केवल तिमाही रिटर्न भरने के साथ ही कारोबारियों, विनिर्माताओं एवं रेस्टोरेंट उद्यमियों को क्रमश: 1, 2 और 5 फीसदी की दर से कर देना होगा।
 
वित्त वर्ष 2012-13 में 10 लाख से लेकर 1 करोड़ रुपये के सालाना कारोबार वाली करीब 17 लाख छोटी इकाइयां थीं। अब उनकी संख्या बढ़कर 20 लाख होने का अनुमान है। ऐसे में एकमुश्त योजना से करीब 20 लाख इकाइयों को कद दायरे में लाया जा सकेगा। वैसे उन्हें इनपुट टैक्स क्रेडिट (मूलत: सामान एवं कच्चे माल की खरीद के दौरान दिए गए कर का रिफंड) का लाभ नहीं मिल पाएगा लेकिन हर महीने रिटर्न भरने और टैक्स क्रेडिट का दावा करने के लिए रसीदों का मिलान करने की झंझट से उन्हें जो राहत मिली है, उसकी तुलना में यह कोई समस्या नहीं होगी। 
 
सरकार की मंशा है कि कर दायरे का अधिकतम विस्तार किया जाए। शायद यही वजह है कि सरकार ने छोटे कारोबारियों और विनिर्माताओं पर अपने ही आंकड़े को नजरअंदाज किया है। वर्ष 2012-13 के आंकड़े बताते हैं कि 80 फीसदी से अधिक कारोबार 10 करोड़ रुपये से अधिक कारोबार वाली कंपनियों के हिस्से में गया था। अब तस्वीर शायद बदल गई हो लेकिन रुझान कमोबेश बरकरार ही होंगे। इससे पता चलता है कि मोटे तौर पर 80 फीसदी जीएसटी राजस्व 10 करोड़ रुपये से अधिक आकार वाली कंपनियों से ही मिलेगा। लेकिन संख्या के स्तर पर केवल दो फीसदी कंपनियां ही इस दायरे में आती हैं। अगर सरकार ने छोटी कंपनियों पर ध्यान दिया होता तो जीएसटी का राजस्व बढ़ाने में अधिक मदद मिलती।
 
इसके उलट 10 लाख से 1 करोड़ रुपये के बीच कारोबार वाली इकाइयों का राजस्व में योगदान केवल तीन फीसदी था। लेकिन संख्या के मामले में इस आकार वाली कर-योग्य कंपनियों का हिस्सा 18 फीसदी है। एकमुश्त योजना के दायरे में अब 1 करोड़ रुपये तक के कारोबार वाली कंपनियों को शामिल करना सही फैसला है और जीएसटी लागू के पहले ही ऐसा होना चाहिए था। सवाल खड़ा होता है कि क्या एकमुश्त योजना में शामिल होने के लिए कारोबार की सीमा 2 करोड़ रुपये कर दी जानी चाहिए? सालाना 1 करोड़ से 2 करोड़ रुपये के कारोबार वाली इकाइयों की संख्या कर देने वाली इकाइयों का पांच फीसदी है लेकिन कर देनदारी में उनका अंशदान केवल तीन फीसदी है।
 
जीएसटी परिषद को इस पर भी गौर करना चाहिए कि सालाना 1.5 करोड़ रुपये तक कारोबार वाली इकाइयों को भी क्या तिमाही रिटर्न भरने की इजाजत दी जा सकती है? क्या यह छूट सभी करदाताओं को दी जा सकती है? हमें उन जोखिमों और खतरों पर ध्यान देना होगा कि भले ही कर भुगतान हर महीने हो लेकिन रिटर्न दावा तिमाही आधार पर ही किया जा सकता है। अगर इसमें जोखिम कम दिखता है और इससे कारोबारी सुगमता आती है और अनुपालन लागत भी कम होती है तो जीएसटी परिषद को आगे चलकर इस तरह की रियायत देने के बारे में भी सोचना चाहिए।
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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