बिजनेस स्टैंडर्ड - मनमानी और भेदभाव भरी हैं फ्लोटिंग दरें
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मनमानी और भेदभाव भरी हैं फ्लोटिंग दरें

देबाशिष बसु /  October 10, 2017

फ्लोटिंग दरें यानी समय-समय पर घटने-बढऩे वाली दरें शिक्षा ऋण, ऑटो ऋण और छोटे एसएमई ऋण पर भी लागू होती हैं। इस बारे में विस्तार से बता रहे हैं देबाशिष बसु

 
इससे पहले तीन आलेखों की मदद से मैं यह स्पष्टï कर चुका हूं कि कैसे भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मदद से बैंक ब्याज के मामले में आवास ऋण लेने वाले लोगों के साथ सही बरताव नहीं कर रहे हैं। उन आलेखों में मेरा ध्यान यह स्पष्टï करने में थी कि कैसे फ्लोटिंग दर एक दिखावा है। हाल ही में मैं पंजाब नैशनल बैंक के पूर्व चेयरमैन और आरबीआई के पूर्व डिप्टी गवर्नर के सी चक्रवर्ती से चर्चा कर रहा था। उन्होंने मुझसे कहा कि जिस तरह फ्लोटिंग दर की व्यवस्था का क्रियान्वयन किया जा रहा है वह पूरी तरह अपारदर्शी और भेदभावकारी है। वह कहते हैं, 'फ्लोटिंग दर व्यवस्था में बैंक की ब्याज दर, संबंधित दर के साथ बदलती रहती है। यह फ्लोटिंग आंतरिक भी हो सकती है और बाहरी भी। उदाहरण के लिए लाइबोर (लंदन इंटरबैंक ऑफर्ड दर) एक बाहरी कारक है।' 
 
उनके मुताबिक पहली गलती जिसकी कीमत उपभोक्ता चुका रहे हैं वह यह कि बाहरी फ्लोटर मौजूद नहीं है। भारत में प्राथमिक ऋण दर (पीएलआर) का इस्तेमाल किया जाता है, उसके बाद आधार दर और आखिर में सीमांत निधि लागत पर आधारित उधार दर यानी एमसीएलआर का प्रयोग। ये सभी बैंक के आंतरिक फ्लोटर हैं। बैंक अपने दम पर दरों का निर्धारण करते हैं। वे इस दर तक कैसे पहुंचते हैं इसकी निगरानी के लिए कोई नहीं है। यह पूरी तरह अपारदर्शी है।
 
यही वजह है कि जब आरबीआई ब्याज दर में बदलाव करता है तो फ्लोटर में बहुत अधिक बदलाव नहीं होता। डॉ. चक्रवर्ती कहते हैं, 'अगर यह बाहरी फ्लोटर होता तो कोई समस्या नहीं होती। उदाहरण के लिए अमेरिका में हर किसी का आवास ऋण प्राथमिक दर से जुड़ा रहता है। इसलिए वहां के केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व की दरों में बदलाव होते ही तमाम दरें एक साथ बदलती जाती हैं। इसमें कोई विवाद नहीं है। वहीं ब्रिटेन में यह आधार दर से जुड़ा हुआ है। व्यक्तिगत बैंकिंग दर आधार दर से 0.5 फीसदी तक ज्यादा हो सकती है लेकिन सब कुछ फ्लोटर से संबद्घ होता है। जिस दिन फ्लोटर में बदलाव होता है, सबकुछ बदल जाता है। अगर हमने अपनी दरों को बाहरी कारक पर निर्भर किया होता तो हमेशा पारदर्शिता नजर आती। मान लीजिए कि आरबीआई कहता है कि इसे रीपो दर से जोड़ा जाएगा तो हर व्यक्ति यह जानता तो है कि रीपो दर क्या है।'
 
अगर आरबीआई ने बाहरी कारक का इस्तेमाल किया हो तो बैंकों पर निष्पक्ष क्रियान्वयन का दबाव होता। बाहरी कारक की मौजूदगी में एक बार फ्लोटिंग ऋण में बदलाव के बाद बैंक नए ग्राहक और पुराने ग्राहक में भेद नहीं कर पाते या फिर दरें कम करने के लिए बैंक से संपर्क करने या न करने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती।  चक्रवर्ती कहते हैं कि अगर दर में कमी आती है तो यह हर किसी के लिए आएगी। उनके मुताबिक आरबीआई की दूसरी गलती यह है कि उसने फ्लोटर में मनमाना बदलाव किया। वह कहते हैं, 'उदाहरण के लिए आरबीआई ने पीएलआर से आधार दर का रुख क्यों किया? इसलिए क्योंकि बैंक पीएलआर फ्लोटिंग दर प्रणाली का पालन नहीं कर रहे थे। इसे लेकर असंतोष पैदा हो गया था। आरबीआई को उन सभी दरों में बदलाव लाना चाहिए था जो आधार दर से संदर्भित थीं। परंतु आरबीआई ने ऐसा कुछ नहीं किया। अब जबकि आधार दर काम नहीं कर रही है तो आरबीआई ने एमसीएलआर की शुरुआत क्यों की?'
 
सबसे बुरी बात तो यह है कि आरबीआई ने बैंकों को और अधिक भेदभाव करने की इजाजत दे दी। चक्रवर्ती कहते हैं, 'अगर फ्लोटर मनमाना और अस्पष्टï है तो भी व्यवस्था बिना भेदभाव की हो सकती है, बशर्ते कि आरबीआई ने बैंकों से अपनी दरों को उसी अनुपात में ऊपर या नीचे करने के सिद्घांत का पालन करने को कहा हो। आखिर बैंक इस सिद्घांत का पालन क्यों नहीं कर सकते? इसका उत्तर है: क्योंकि सरकार और रिजर्व बैंक दोनों ने निहायत गैरजिम्मेदारी दिखाते हुए उनको यह इजाजत दे दी कि वे ऐसी फ्लोटिंग दरें रखें जो मौजूदा और नए उपभोक्ताओं के लिए अलग-अलग हों। यह अपने आप में सिद्घांत के खिलाफ है।'
 
ये दोनों कारक यानी मनमानी फ्लोटिंग दर और कर्जदारों के बीच का अंतर, छोटे कर्जदारों और छोटे तथा मझोले उद्यमों के लिए काफी नुकसानदेह साबित हुए। चक्रवर्ती कहते हैं, 'कर्जदारों की दो व्यापक श्रेणियां हैं। एक है खुदरा और एसएमई और दूसरा थोक और उच्च मूल्य वाली संपत्ति रखने वाले लोग (एचएनआई)। थोकमूल्य और एचएनआई अपना ध्यान रख सकते हैं। यानी वे बैंकों से दर कम करने को लेकर अपने स्तर पर निपट सकते हैं। नियामक और नीति निर्माताओं की जिम्मेदारी है कि वे इस क्षेत्र को पारदर्शी और गैर विभाजनकारी बनाएं ताकि यह खुदरा और छोटे कर्जदारों के लिए समान हो सके। हमारी व्यवस्था इस मोर्चे पर विफल हो चुकी है।'
 
यह याद रखना होगा कि फ्लोटर दर शिक्षा ऋण, वाहन ऋण और छोटे एसएमई ऋण के लिए भी लागू होती है। ये सारे ऋण लेने वाले लोग बैंकों की कम दरों का स्वत: लाभ लेने से वंचित हैं। इस व्यवस्था में आवास ऋण की अवधि लंबी खिंच जाती है क्योंकि यह 15 से 20 वर्ष तक चलता है। अगर कम ब्याज दर के साथ दरों में गिरावट नहीं आएगी तो बहुत अधिक नुकसान होगा। लंबी अवधि के कारण, ब्याज की लागत भी ज्यादा होगी। अन्य ऋणों की अवधि अपेक्षाकृत कम होती है। यानी 3 से 5 वर्ष तक। इसलिए यहां नुकसान भी कम होता है। जब से फ्लोटिंग दर की व्यवस्था आई है तब से यह अस्पष्टïता और भेदभाव जारी है। अब वक्त आ गया है कि आरबीआई इसे दुरुस्त करे। क्या नई बनी आर्थिक सलाहकार परिषद इस पर काम करेगी? समिति के एक सदस्य सुरजीत भल्ला ब्याज दरों में भारी कटौती के समर्थक हैं। उन्हें पहले यह पता करना चाहिए कि बैंकों ने पिछली कटौती के वक्त क्या किया है। एक बार जब वह ऐसा कर लेंगे तब क्या वह एक वास्तविक बाहरी फ्लोटर की जबरदस्त अनुशंसा करेंगे तो बैंकों द्वारा अलग-अलग ग्राहकों के बीच का भेद समाप्त हो जाएगा।
Keyword: floating rate, loan,,
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